कबीर के दोहे और वाणी अर्थसहित हिंदी में | Kabir Das Ke Dohe

Kabir Ke Dohe in Hindi with meaning दोहा काव्य की एक ऐसी विधा है, जिनमें कवि कुछ ही शब्दों की पक्तियों द्वारा बहुत कुछ कह जाते है. दोहे का अर्थ समझना बेहद जटिल रहता है. हिंदी दोहों में भक्तकालीन काव्यधारा के कबीर का नाम सबसे प्रथम आता है. उन्होंने जीवन, निति, ईश्वर, भक्ति और धर्म पर अनेक दोहे, वाणी लिखी. यहाँ आपकों कुछ Kabir Das Ke Dohe अर्थसहित दिए जा रहे है.

कबीर के दोहे और वाणी अर्थसहित हिंदी में | Kabir Das Ke Dohe

Kabir Das Ke Dohe Part 1

दोहा-

यही कारण तू जग में आया, वो नही तूने कर्म कमाया,
मन मैला था मैला तेरा, काया मल मल धोय ||

दोहा-

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान,
शीश कटे जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ||

दोहा

यह माया की चुह्ड़ी, और चूहड़ा कीजो,
बाप-पूत उरभाय के, संग ना काहो कहे ||

दोहा

यह मन ताको दीजिए, सांचा सेवक होय |
सिर ऊपर आरा सहे, तऊ न दूजा होय ||

दोहा

ये दुनिया है एक तमाशा, कर नही बंदे किसी की आशा,
कहे कबीर सुनों भाई साधों, सांई भजे सुख होय ||

दोहा

बुरा जो देखन मै चला, बुरा न मिलिया कोय,
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय.
अर्थ-जब मै इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला. जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पता चला कि दुनियाँ में मुझसे बुरा कोई अन्य नही है.

दोहा

पोथी पढ़ी पढ़ी जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े से पंडित होय.
अर्थ-इस संसार में लोग बड़ी बड़ी पुस्तके और ग्रन्थ पढ़-पढ़कर मौत की कगार पर चले गये, मगर उनमे से कोई भी ज्ञानी नही बन सका. कबीरदास के अनुसार जो इंसान प्यार के वास्तविक अर्थ को समझ ले वो ही सच्चा ज्ञानी है पंडित है.

दोहा

साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाए.
अर्थ– Kabir Ke Dohe में कबीरदास कहते है कि इस संसार को बुद्धिमान लोगों की आवश्यकता है, जो कार्य एक साधू ही कर सकता है. जिस तरह सूप अनाज को बचाकर बेकार कचरे को उडा देता है.

दोहा

तिनका कबहू ना निन्दिये, जो पावन तर होय,
कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय ||
अर्थ- कबीरदास जी कहते है कि कभी भी किसी छोटे तिनके की भी निंदा मत करो, जब वो तुम्हारे पाँव के नीचे दब जाए. वही तिनका कभी भी उड़कर आपकी आँख में आ गिरे तो भीषण पीड़ा दर्द होता है.

दोहा

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतू आए फल होय ||
अर्थ– मन में धीरज रखा जाए तो सब कुछ संभव है. यदि माली एक ही समय में सारा पानी एक समय सींचे तो भी उन्हें फल की प्राप्ति ऋतू आने पर ही होगी. अर्थात उन्हें फल प्राप्ति में समय लगेगा.

दोहा

 माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर ||
अर्थ-यदि कोई इंसान मनके की माला लेकर निरंतर फेरता है तो इससे उसका मन नही बदलता है अर्थात उस व्यक्ति के मन की हलचल खत्म नही होती है. ऐसे इंसान को मनके की माला छोड़कर मन की माला के मनकों को फेरों.

दोहा

जाति न पूछो साध की, पूछ लीजिए ज्ञान,
मोल करो तरवार का पड़ी रहन दो म्यान ||
अर्थ– सज्जन की जाति न पूछकर हमे उनके ज्ञान (शिक्षा) को समझना चाहिए. कीमत तो तलवार की होती है न कि उसे ढकने वाली म्यान की.

दोहा

दोस पराए देख करी, चला हसन्त हसन्त,
अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ||
अर्थ-इसान की यह प्रवृति होती है कि वह दूसरों की कमियों व् दोषों को देखकर हंसता है, मगर उस समय वह अपने भीतर की कमियों की याद ही नही आती, जिनका कोई आदि है न अंत.

दोहा

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मै बापुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ||
अर्थ-जो इंसान मेहनत करता है कुछ न कुछ अवश्य ही प्राप्त कर लेता है, जिस प्रकार एक गौताखोर बिना भय से गहरे पानी में उतरकर मोती निकाल ले आता है, दूसरी तरफ कायर लोग मौत के भय से किनारे पर बैठे ही रह जाते है.

दोहा

बोलि एक अनमोल है, जो कोई बोले जानि,
हिये तराजू तौली के, तब मुख बाहर आनी ||
अर्थ– जो इंसान बोली यानि सही बोलने के महत्व को समझता है वह कुछ बोलने से पूर्व अपने ह्रद्य रूपी तराजू से उन्हें तौलकर मुख से बाहर निकालता है.

दोहा

अति का भला न बोलना, अति की भलि न चुप,
अति का भला न बरसना, अति की भलि न धूप ||
अर्थ– व्यक्ति को न तो अधिक बोलना अच्छा है और न ही अधिक चुप रहना. कबीर कहते है यह उसी प्रकार पीड़ादायक है जिस प्रकार अधिक मात्रा में बरसात और धूप.

दोहा

निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय,
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ||
अर्थ-यदि कोई व्यक्ति आपकी निंदा करता है तो उसे रोकिये मत, क्युकि वो तो साबुन और जल के बिना भी आपके स्वभाव को साफ़ कर देता है.

दोहा

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,
तरुवर ज्यों पता झड़े, बहुरि न लागे डार |
अर्थ- इस संसार में मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है, यह जीवन उसी प्रकार है, जिस प्रकार एक पेड़ से टुटा पत्ता दुबारा नही जुड़ सकता.

दोहा

कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर ||
अर्थ-कबीरदास जी इस संसार में आकर बस यही चाहते है कि सबका भला हो. यदि किसी से दोस्ती हो न हो मगर दुश्मनी तो बिलकुल न हो.

दोहा

हिन्दू कहे मोहे राम प्यारा, तुर्क कहे रहमाना,
आपस में दोनों लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना ||
अर्थ– हिन्दू श्रीराम को अपना भगवान मानते है वही मुस्लिम रहिमन को. मेरा धर्म श्रेष्ट है इसी को लेकर आपस में लड़-लड़कर मर जाते है मगर सत्य को कोई नही जानता है.

दोहा

कहत सुनत सब दिन गये, उरझी न सुरझ्या मन,
कही कबीर चेत्या नही, अजहूँ सो पहला दिन ||
अर्थ- कहते सुनते कई दिन निकल गये, मगर यह उलझा हुआ मन अभी तक सुलझ नही पाया. कबीर कहते है कि अब भी यह मन होश में नही आया आज भी यह पूर्व स्थति में बना हुआ है.

दोहा

कबीर लहरी समद की, मोती बिखरे आई,
बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी चुनी खाई ||
अर्थ-जब झील में मोती बिखर गये है, बगुला मोती और पत्थर में भेद नही कर पा रहा है. वही मोती का पारखी हंस उन्हें चुन चुनकर खा रहा है.

Kabir Das Ke Dohe Part 2

जब गुण को ग्राहक मिले, तब गुण की लाख बिकाई,
जब गुण को ग्राहक नही, तब कौड़ी के बदले जाई ||
अर्थ- कबीरदास जी कहते है, कि जब गुण का पारखी मिले तो उसकी कीमत लाखों होती है, मगर गुण को ग्राहक नही मिलने पर वह कोड़ियो के भाव बिकता है.

दोहा

कबीर कहा गरबियो, काल गहे पर केस,
न जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेश ||
अर्थ- कबीर मानव के नश्वर जीवन के बारे में कहते है, हे इन्सान तुझे अपने जीवन पर इतना गर्व क्यों है. तेरे बाल तो काल के हाथों में फसे हुए है. क्या पता घर या प्रदेश कब तेरि मृत्यु हो सकती है.

Kabir Das Ke Dohe

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुष की जात,
एक दिन छिप जाएगा, ज्यो तारा प्रभात ||

अर्थ-हे मनुष्य ये मानव जीवन पानी के बुलबुले की भांति क्षणभंगुर है. जिस तरह सूर्योदय के साथ ही सारे तारे छिप जाते है उसी प्रकार तेरा जीवन कभी भी समाप्त हो सकता है.

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