Kaila Devi Mela In Hindi Maa कैला देवी Fair 2019 Date Pooja Vidhi And History

Kaila Devi Mela In Hindi Maa कैला देवी Fair 2019 Date Pooja Vidhi And History: delhi to karoli mata by road कैलामाता मेले की 2019 में २२ मार्च से ही शुरुआत हो चुकी हैं यह 18 अप्रैल तक भरेगा. उत्तर भारत की मुख्य शक्ति पीठों में कैला देवी के लक्खी मेला करौली की गिनती भी की जाती हैं. यहाँ वैसे तो बारहों महीने भक्तों की भरमार रहती हैं मगर चैत्र मेले में नित्य लाखों श्रद्धालु आकर माँ की धोक लगाते हैं. करौली से २४ किमी तथा कैला गाँव से 2 किमी की दूरी पर कालीसिल नदी के तट पर माँ का धाम हैं. कैला देवी करौली के यादव वंश की कुलदेवी मानी जाती हैं. भक्त लिगुरिया गीत गाकर माँ को प्रसन्न करते हैं.

Kaila Devi Mela In Hindi Maa कैला देवी Fair 2019

Kaila Devi Mela In Hindi Maa कैला देवी Fair 2019

चैत्र माह के नवरात्र में देवी दुर्गा के शक्ति रूपों की पूजा करने की परम्परा हैं. राजस्थान के करौली का कैला मैया का मेला छोटे कुंभ  की तरह बड़ा धार्मिक संगम हैं,  त्रिकुट पहाड़ी पर चंबल नदी के बीहड़ के कैला  माँ के धाम में वर्ष के १२ महीनों भक्तो का ताँता लगा रहता हैं. मगर चैत्र माह का मेले में देशभर से लाखों श्रद्धालु पहुचते हैं.

मां कैलादेवी की मुख्य प्रतिमा के साथ मां चामुण्डा की प्रतिमा कैलादेवी मन्दिर में स्थापित हैं. हजारों वर्ष पुराना इस टेम्पल का इतिहास हैं. बताते है कि स्थानीय शासक रघुदास जी ने लाल पत्थरों से इस मन्दिर का निर्माण करवाया था. बाद के रणथम्भौर के खीची राजपूत शासकों के क्षेत्र में आता था. खींची राजा मुकन्ददास ने सन् 1116 में मंदिर की सेवा, सुरक्षा का दायित्व राज कोष पर लेकर नियमित भोग-प्रसाद और नित्य पूजा अर्चना का प्रबंध किया था इसके बाद यह मन्दिर करौली के यादव राज वंश के अधिकार में आ गया.

कैला देवी माता का मेला कब और कहाँ भरता हैं

हिन्दू कलैंडर के अनुसार चैत्र माह के नवरात्र में कैला मैया का मेला 15 दिनों तक चलता है जो अंग्रेजी माह के अनुसार अप्रैल के महीने में आयोजित होता हैं यहाँ राजस्थान के अलावा यूपी दिल्ली, हरियाणा पंजाब तथा गुजरात से बड़ी मात्रा में सैलानी अपनी मनोकामनाएं लेकर माँ के दरबार में हाजरी लगाते हैं. मेले के पहले पांच दिनों तथा आखिरी के चार दिनों में विशेष रौनक देखने को मिलती हैं.

नवरात्र के दौरान करौली के सभी सड़क मार्गों पर हाथ में ध्वजा लिए लिगुरियां गीत गाते भक्तों के हुजूम हर कोई दिखाई देते हैं. करौली जिला प्रशासन द्वारा मंदिर ट्रस्ट भी कैला देवी मन्दिर के प्रबंध की सम्पूर्ण इंतजाम करते हैं, इस दिन कालीसिल नदी में स्नान करना पुण्यदायक माना जाता हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 35 से 45 तक श्रद्धालु हर वर्ष कैला देवी मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं.

कैला मैया मेला परम्परा इतिहास व कहानी

इस मेले में महिला श्रद्धालु हरे रंग की चूड़ियाँ तथा सिंदूर अवश्य खरीदती हैं हिन्दू मान्यता के अनुसार इसे सुहाग का प्रतीक माना गया हैं. यादव समुदाय में नव दम्पति जोड़े में दर्शन करने के लिए इस मन्दिर आते हैं तथा बालकों का मुंडन भी करवाया जाता हैं. मेले की मुख्य तिथियों पर ढोल नगाड़ों की गूंज तथा लागुरियां गीत के स्वर भक्तों को मंत्र मुग्ध कर देते हैं. मेले की मान्यता के अनुसार यात्राी चरणबद्व रूप से आते है। चैत्रा कृष्ण बारह से पडवा तक मेले में पांच दिन तक पद यात्रियों का हुजूम उमड़ा रहता हैं. यह मेला यह दसमीं से पूर्णिमा तक चलता है.

कैला देवी मेला फेयर 2019

2019 के कैला देवी मेले के अगाज में प्रशासन का पूर्ण सहयोग देखने को मिल रहा हैं एक पखवाड़े तक चलने वाले इस मेले में करीब ६० लाख यात्री आएगे इसके लिए 1500 सुरक्षाकर्मी लगाए गये है. करौली जिला प्रशासन द्वारा ड्रोन कैमरों के साथ सुरक्षा निगरानी की जा रही हैं. यातायात के लिए ५०० से अधिक सरकारी बसे तथा आगरा से गंगापुर तक स्पेशल रेल चलाई जा रही है. यात्रियों की सुविधाओं के लिए खान-पान, चिकित्सा व ठहरने के लिए हिण्डौन और करौली में व्यवस्था की गई है. 300 से अधिक सफाईकर्मी तैनात किए गए है.

जयपुर -आगरा राष्ट्रीय राजमार्ग से राजमार्ग २२ करौली जिला मुख्यालय स्थित हैं. तथा यहाँ से कैलादेवी के लिए सुगम सड़क मार्ग की व्यवस्था हैं. रेल मार्ग के लिए निकट रेलवे स्टेशन हिंडौन सिटी है जो कैलादेवी से ५५ किमी की दूरी पर स्थित हैं इसके अतिरिक्त 50 किमी दूर गंगापुर सिटी से भी मेले में दर्शन के लिए पहुच सकते हैं. जयपुर से कैलादेवी की दूरी लगभग 200 किमी हैं.

कैला देवी मां की पूजा विधि

कैला देवी मेले के दौरान 2 लाख से अधिक तीर्थयात्री इस स्थान पर आते हैं। कैला देवी मेले के वक्त यहां भक्तों के लिए 24 घंटे भंडार और उनके आराम करने की व्यवस्था की जाती है। किन्तु कुछ भक्त ऐसे भी होते हैं जो बिना कुछ खाय-पिए, बिना आराम किए इस कठोर यात्रा को पूरा करते है। मीना समुदाय के लोग आदिवासियों के साथ मिलकर नाचते-गाते इस यात्रा को पूरा करते हैं। भक्त नकद, नारियल, काजल (कोहल), टिककी, मिठाई और चूड़ियां देवी को प्रदान करते हैं यह सब समान भक्त अपने साथ लेकर आते हैं। मंदिर में सुबह-शाम आरती भजन किया जाता है। कहा जाता है कि माता को प्रसन्न करने का एक ही तरीका है लांगूरिया भजन को गाना। भक्त माता की भक्ति में लीन होकर नाचते-गाते हुए उनका आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।

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