कैला देवी का इतिहास मंदिर व मेला | Kaila Devi Story In Hindi

Kaila Devi Story In Hindi mandir Rajasthan Karauli: करौली के यदुवंश (यादव राजवंश) की कुलदेवी कैला देवी पूर्वी राजस्थान की मुख्य आराध्य देवी है. ऐसी मान्यता है. कि द्वापर युग में जब कंस ने वासुदेव-देवकी को मथुरा के कारागृह में बंद किया तो उस समय कंस ने वासुदेव की आठवी संतान (कन्या) का वध करना चाहा. वास्तव में वह कन्या योगमाया का अवतार थी, अतः अंतर्ध्यान हो गई. वही कन्यारुपी देवी करौली में कालिसिल नदी के किनारे त्रिकुट पर्वत पर कैला देवी के रूप में विराजमान है.

कैला देवी का इतिहास मंदिर व मेला (Kaila Devi Story In Hindi)Kaila Devi Story In Hindi

राजस्थान के करौली जिले में कैलादेवी का मुख्य मंदिर है. इस मन्दिर की चौकी चांदी की व इसकें सोने की छतरी के नीचे दो मूर्तियाँ स्थापित है. इन दोनों मूर्तियों में पहली कैला माता की व दूसरी चामुंडा देवी की प्रतिमा है.

आज भुजाओं वाली इस देवी के मुख्य मंदिर को हिन्दू धर्म की मुख्य शक्तिपीठों में गिना जाता है. राजस्थान यूपी सहित उत्तर भारत के मंदिर में कैलादेवी करौली का विशेष महत्व है. इस प्राचीन हिन्दू मंदिर का निर्माण 1600 ईस्वी में शासक भोमपाल ने करवाया था.

कैसे पहुंचे कैलादेवी करौली मंदिर (How to reach Kaila Devi Karauli Temple)

करौली जिले का यह कस्बा पूर्ण रूप से सड़क परिवहन से जुड़ा हुआ है. जयपुर आगरा नेशनल हाइवे पर स्थित महुआ कस्बे से यहाँ की दूरी तक़रीबन 95 किलोमीटर है. महुआ से कैलादेवी के लिए राज्य राजमार्ग 22 सीधा जाता है. राजस्थान रोडवेज अथवा निजी टैक्सी वाहन के जरिये इस मन्दिर तक पंहुचा जा सकता है.

यदि रेलमार्ग की बात करे तो वेस्टर्न रेलवे जोन के दिल्ली मुंबई रेलवे लाइन पर सवाईमाधोपुर की हिंडोन शहर से यह 55 किलोमीटर तथा गंगापुर शहर से 48 किलोमीटर की दूरी पर है. दूर के राज्यों अथवा विदेशी जातरू कैलादेवी आने के लिए हवाई रूठ को चुन सकते है. यहाँ नजदीकी हवाई अड्डा जयपुर है. कैलादेवी की जयपुर से दूरी तक़रीबन 200 किमी है. जिन्हें बस के द्वारा पूरा किया जा सकता है.

कैलादेवी मेला

कैलादेवी मन्दिर करौली में स्थित है. यहाँ पर मार्च अप्रैल महीने में विशाल मेला भरता है. जहाँ लाखों की तादाद में देशी विदेशी यात्री माँ के दर्शन करने के लिए आते है. कैलादेवी के मेले में लिंगुरिया गीत गाये जाते है. त्रिकूट मंदिर की मनोरम पहाड़ियों की तलहटी में स्थित देवी का मुख्य मंदिर संगमरमर के पत्थर पर बनाया गया है. सिंह की सवारी में माता की मुख्य प्रतिमा लगी हुई है. भक्तगण अपनी मन्नते पूरी करवाने के लिए माथा टेकते है.

कथा एवं मान्यताएँ व इतिहास 

  • पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है, कि कंस द्वारा देवकी व वासुदेव को जब कैद किया गया था. उसी काराग्रह में इस कन्या ने जन्म लिया था. एक ऋषि के आग्रह पर वह त्रिकुट पर्वत पर आई और तभी से उनका यहाँ से नाता जुड़ गया.
  • चैत्र माह में उत्तर भारत के बड़े मेलों में से एक कैलादेवी के मेले में कड़ाके की ठंड के बिच भक्त मुरादे लेकर आता है. लोगों का विश्वास है, कि जो भी यहाँ आता है वो खाली हाथ नही लौटता है.
  • सूनी गोद भरने की आस हो या सुहाग की चिरायु होने की कामना, कैलादेवी पूरी करती है. इसी कारण यहाँ हर रोज सैकड़ों दम्पति अपने नवजात का झडूला संस्कार करने के लिए लाते है.  हर सुहागिन स्त्री माँ के दरबार से जाते वक्त अमर चूड़ियाँ अपने साथ ले जाना नही भूलती है.
  • कहा जाता है, कि प्राचीन काल में यह त्रिकुट का इलाका घने वन से घिरा हुआ था, यहाँ एक नरकासुर नाम का राक्षस रहा करता था. उसके अत्याचार से जनता बेहद त्रस्त थी. इस अत्याचारी से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने माँ दुर्गा की उपासना की. तथा कैलादेवी के रूप में माँ दुर्गा ने अवतार लेकर उस अत्याचारी राक्षस का अंत किया.
  • इस मन्दिर के बारे में यह रोचक बात है, कि यहाँ करौली व सवाईमाधोपुर के बड़े खूंखार डाकू माँ की पूजा करने आते है. प्रशासन उनके साथ हरसंभव सख्ती बरतने की व्यवस्था करने के उपरांत भी वे उन्हें नही रोक पाते है. डकैत लोगों भी माँ के आंगन में आकर कुछ समय के लिए ही सही सच्चे इंसान बन जाते है. तथा किसी श्रद्धालु के साथ किसी किस्म का दुर्व्यवहार नही करते है.
  • भगवान् राम के गुरु महर्षि विशिष्ट के वंशज कहे जाने वाले कटारे हिन्दू आबादी यहाँ बहुल है. जिनमें गुप्ता, माथुर, वैश्य मुख्य है. ये नार्थ इंडिया व पाकिस्तान के कुछ क्षेत्रों में रहते है. ये कैलादेवी को अपनी कुलदेवी के रूप में स्वीकार करते है.

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