कजरी तीज त्यौहार कथा और महत्व | Kajli Teej Festival Khata Mahtv

Kajli Teej Festival कजरी तीज जिन्हें हरितालिका तीज सतवा अथवा सातुड़ी तीज भी कहा जाता हैं. ये हिन्दू कैलेंडर के भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की तृतीया के दिन मनाइ जाती हैं. कजरी तीज के एक दिन पहले रतजगा देने का रिवाज भी हैं. इस रात को विवाहित स्त्रियाँ कजरी का गीत गाते हुए नाचती हैं. इस पर्व में कजरी गीत का बड़ा महत्व हैं, जो लोकजीवन पर आधारित होते हैं. मुख्यत इसे मातेश्वरी समाज का पर्व माना जाता हैं. इस दिन किसी धान (गेहू,चावल, चना) और घी व् मेवे के साथ मीठे पकवान बनाए जाते हैं. चन्द्रमा के दर्शन होने पर स्त्रियों द्वारा भोजन ग्रहण किया जाता हैं.

कजरी तीज त्यौहार कथा और महत्व (Kajli Teej Festival Khata Mahtv)

कजरी तीज का महत्व

हमारी संस्कृति में तीज त्यौहार का विशेष महत्व होता हैं. हिन्दू जन-मानस में प्रेम, सोहार्द, सुख-सम्पदा आदि के संदेश देने वाले तीज पर्व का स्वागत किया जाता रहा हैं. यह पर्व मुख्यत विवाहित महिलाओं का हैं, कजरी तीज महिलाओं के इस विशेष त्यौहार को भाद्रपद की कृष्ण तृतीया को मनाया जाता हैं. इस वर्षः यह १० अगस्त को आ रही हैं. माना जाता हैं, इस दिन शिव-गौरी की पूजा करने से सोभाग्यवती स्त्री को अखंड सुहाग की प्राप्ति होती हैं. वैसे इस व्रत को सभी औरते कर सकती हैं, चाहे वे विवाहित हो या विधवा.

पति-पत्नी के अटूट रिश्ते को सालोसाल प्रेममय बनाने में इस तरह के तीज त्योहारों का विशेष महत्व होता हैं. इस दिन सुहागन स्त्री अपने वर की लम्बी आयु के लिए व्रत उपवास रखती हैं.साथ ही कुवारी कन्याएँ अच्छे वर प्राप्ति के लिए भी कजली तीज का व्रत रखती हैं.

कजली तीज को हरतालिका तीज क्यों कहते हैं ? (hartalika teej vrat katha in hindi)

कहते हैं प्राचीन काल में मध्य भारत के क्षेत्र में कजली नामक वन था. जहा के शासक का नाम था दादुरै. इसी क्षेत्र में रहने वाले लोग भाद्रपद महीने में कजली गीत गाते थे, इस लोकगीत के कारण इस कजली क्षेत्र की ख्याति चारो ओर फ़ैल गई. कालान्तर में यहाँ के शासक दादुरै का देहांत होने पर उनकी नागमती जीवित सती हो जाती हैं. इससे वहां की जनता में व्यथा और दुःख की भावना भर गईं और नागमती व् दादुरै के जन्म अवसर पर कजरी गीत गाने की प्रथा की शुरुआत हुई.

कजरी तीज को हरतालिका तीज भी कहा जाता हैं. हरत का अर्थ होता है हरण करना, आलिका शब्द का अर्थ हैं सहेली, सखी. कहते हैं. माता पार्वती की सखी उनका हरण कर उनके पिता के क्षेत्र के अधीन आने वाले जंगल में ले गईं थी. और इसी हरण के कारण इसे हरतलिका/हरतालिका तीज भी कहा जाता हैं. माना जाता हैं, इस तीज का व्रत रखने से स्त्रियाँ शिवलोक को प्राप्त कर लेती हैं. व्रत रखने वाली नारी व्रत का संकल्प लेकर अपने घर की पूर्ण सफाई कर पूजा की सामग्री तैयार रखती हैं. इसके व्रत में पूरी तरफ निर्जला रहना होता हैं. साथ ही स्नानादि करने के पश्चात् स्वेत वस्त्र धारण कर शिव पार्वती की पूजा करने का विधान हैं. अकसर कजरी तीज में सुबह अथवा शाम को पूजा-पाठ घर पर ही किया जाना चाहिए.

कजरी कजली तीज कथा (hartalika teej katha )

हरतालिका अर्थात कजली तीज के पीछे कई कथाएँ जुड़ी हुई हैं, जिनमे शिव पार्वती की कथा मुख्य रूप से सर्वमान्य हैं. कहते हैं जब माता पार्वती ने भगवान् शंकर से शादी करने की इच्छा जताई तो शिवजी ने एक शर्त रखते हुए कहा अपने प्रेम और समपर्ण को सिद्ध कर दिखाओ. इस पर पार्वती ने एक सौ आठ वर्षः तक की कठिन तपस्या की. कजली तीज के दिन भी उनकी यह तपस्या पूर्ण हुई और भोले शंकर पार्वती से विवाह करने के लिए तैयार हो गये थे. माना जाता हैं इसके बाद देवलोक के सभी देवी-देवताओं ने इस दिन पार्वती की पूजा की.

एक गाँव में एक निर्धन ब्राह्मण का परिवार रहा करता था. भादों की तीज यानि कजली तीज को ब्राह्मणी ने व्रत धारण किया. गरीबी के कारण उनके घर पर अनाज नही था. इसलिए ब्राह्मणी ने अपने पति से कहा- कही से चने लेकर आओ, परन्तु निर्धन ब्राह्मण ने कहा लाऊ तो कहा से. हमारे पास पैसे भी नही हैं.

इस पर ब्राह्मणी ने कहा-चाहे चोरी करके ही लाओ. इस पर वो घने रात के अँधेरे में घर से निकला और एक बनिये की दूकान में डाका डाला, दूकान में घुसते ही पत्नी के कथानुसार उन्होंने सभी आवश्यक सामान थैले में पैक किये और चलने की लगा कि सेठ जग गया,
जब सेठ और उनके नौकरों ने उन्हें पकड़ा तो वह बोला- सेठजी मै कोई चोर नही हु, इसी गाँव का निर्धन ब्राह्मण हु मेरी पत्नी ने आज कजली तीज का व्रत रखा था. मैंने कोई चोरी नही की, बस सवा किलो चने का सातु लिया हैं, सेठ ने जब उन्के सामान की तलाशी ली तो सवा किलो सातु के अतिरिक्त कुछ नही मिला. चाँद निकलने ही वाला था. सेठ ने कहा ब्राह्मण मै तेरि पत्नी को मेरी धर्म बहिन मानुगा साथ ही उन्हें बहुत सारा धन देकर ससम्मान विदा किया.

कजली तीज मनाने का तरीका (Kajari Kajli Teej Pooja Vidhi)

  • इस कजरी तीज के एक दिन पहले स्त्रियाँ रात भर कजरी के गीत गाती हैं.
  • जौ, गेहूँ, चावल, सत्तू ,घी, गुड़ और मेवा के बने खाद्यान चन्द्र दर्शन के बाद ग्रहण कर उपवास खोलती हैं.
  • इस दिन शिव पार्वती की मिटटी की बनी मूर्ति की विधि-विधान से पूजा की जाती हैं.
  • इस दिन गाय माता की पूजा करने के साथ ही उन्हें चने की बनी रोटियाँ सहित गुड़ भी खिलाया जाता हैं.
  • कुवारी, विवाहित और विधवा सभी स्त्रियाँ कजरी तीज के दिन व्रत रखती हैं.
  • बेसन का लड्डू,नारियल का लड्डू,घेवर,खीर पूरी जैसे पकवान कजरी तीज पर बनाए जाते हैं.

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