Importance Of Kanyadan कन्यादान का महत्व और समाज की घटिया सोच

Importance Of Kanyadan: कन्यादान गृहस्थ जीवन का सबसे बड़ा दान है. हर समाज, हर मजहब, हर जाति, हर क्षेत्र में कन्यादान होता है. ओषधिदान, आहारदान, ज्ञानदान करने का पूण्यशाली अवसर भले ही हर किसी को ना मिल पाए पर यदि घर में कन्या है तो कन्यादान का अवसर जरुर मिल जाता है. कन्यादान की परम्परा में रीती-रिवाज अलग-अलग हो सकते है पर कन्या को किसी भी रिवाज से दूसरों को दान करना ही पड़ता है, अर्थात कन्या का विवाह करना ही पड़ता है.

शास्त्रों में लिखा है की एक कन्यादान करने से एक अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है. जिस पिता के कन्या ज्यादा है वह पिता तो भाग्यशाली है. कन्यादान एक पवित्र परम्परा है, पर यह परम्परा आज लांछित होती जा रही है. कैसे? या तो दहेज़ की आस में जलकर या कन्या स्वंय अपना वर चुनकर, वासना की आग में जलकर.

आज समाज में कन्यादान नहीं कन्या व्यापार होने लगा है. बाप अपनी बेटी को बेचता है, यह पाप इस धरती पर होने लगा है. कन्यादान के बीच में दहेज़ जैसा दानव आने लगा है. आज समाज का पूरा स्वरूप ही बिगड़ चूका है. कन्या कन्या है कोई दहेज़ बाज़ार की वस्तु नहीं की उठाकर किसी मांगने वाले को दे दी जाए.

कन्या कोई कागज का टुकड़ा नहीं है या धातुओं से बने सिक्के नहीं है की दो नंबर की कमाई से अर्जित की और अपार भीड़ में फुल माला पहनकर, विडियोग्राफी करवाकर किसी आयोजन में दान कर दी जाए. कन्या कागज का टुकड़ा नहीं दिल का टुकड़ा है. कन्यादान बहुत बड़ा दान है. जिस घर में कन्या है वह घर भी महान होता है.

पुत्र से ज्यादा पुत्रियाँ होना यह भाग्य की बात है. बेटा क्या है? बेटा तो गेहूं का बीज है. गेहूं जहाँ बोया जाता है वहीँ काट दिया जाता है. और बेटी? बेटी तो अनाज का प्लान्टेशन है जो एक जगह बोया जाए और दूसरी जगह पिरोया जाये. इलसिए बेटा एक ही कुल को तारता है लेकिन पुत्री ससुराल और पीहर दोनों को तारती है.

संसान में सबसे पवित्र सम्बध अगर किसी का है तो वह है पिता और पुत्री का. बाप और बेटे का संबध इतना पवित्र नहीं बताया जिस्ता बाप और बेटी का बताया गया है. पिताजी बाहर से आये हो तो बेटी दोड़ती हुयी आएगी और पिताजी से पूछेगी की कोई तकलीफ तो नहीं हुयी, आप जिस काम के लिए गए है वो काम हुआ या नहीं. पानी पिलाएगी, भोजन कराएगी. यह सिर्फ बेटी ही कर सकती है, बेटा नहीं.

जितना प्रेम बेटी का पिता के प्रति है उतना ही प्रेम पिता का बेटी के प्रति है. इसलिए तो कहते है “बेटियाँ पापा की परी होती है”. इसलिए पिता अपनी बेटी की विदाई में सबसे ज्यादा रोता है. इतना पवित्र संबध है पिता और बेटी का. पिता अपने दिल पर पत्थर रखकर अपने कलेजे के टुकड़े को एक अनजान इंसान को सौंप देता है. वह अपने घर में आई बहु को बेटी की तरह रखता है और यही सच्चा और अच्छा कन्यादान है.

बेटी को जन्म नहीं देने से आप समस्या से बच नहीं गए बल्कि आप समस्या के कीचड़ में और ज्यादा धंस गए है क्योंकि कन्यादान के बराबर कोई पूण्य नहीं है और “भ्रूण-हत्या” के बराबर कोई पाप नहीं है. विज्ञान बढ़ा है तो विकास भी बढ़ा है और हम कहते है की आज आज के युग में विज्ञान वरदान बन गया है, लेकिन कहीं-कहीं विज्ञान अभिशाप भी बन गया है.

“अल्ट्रासाउंड” मशीन का आविष्कार. जिस मशीन से भ्रूण की जांच कर ली जाती है की गर्भ में पल रहा जीव लड़का है या लड़की. जब यह पता चलता है की गर्भ में पल रहा जीव लड़की है तो पति-पत्नी डॉक्टर को कहते है की हमें लड़की को जन्म नहीं देना है तो डॉक्टर उसे गर्भ में ही मार देता है. डॉक्टर के साथ-साथ पति-पत्नी भी बड़े पाप के भागी बनते है.

अगर लड़कियों को जन्म नहीं दिया तो लडकियां हो जाएँगी कम और लड़के हो जायेंगे ज्यादा और फिर लड़के कुंवारे मर जायेंगे. इसलिए समाज में आने वाली कली को खिलने दीजिये और समाज में फ़ैल रही दहेज़ की आग को बुझा दीजिये.

अगर कोई लड़का शादी के वक्त दहेज़ की मांग करता है तो लड़की को उसके मुहं पर कहना चाहिए की “ऐ भिखारी अगर तुझे भीख ही मांगनी है तो बाहर रोड पे जाकर मांग”. अब समय आ गया है आवाज उठाने का. इसलिए जागिये और कन्यादान के महत्व को समझिये.

“सब दानो में दान, कन्यादान महादान”

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