कठपुतली के बारे में जानकारी | Kathputli/Puppets Information In Hindi

Kathputli/Puppets Information In Hindi प्राचीन समय में कठपुतली के माध्यम से जनता तक कोई भी जानकारी, संदेश पहुचाने का कार्य किया जाता था. यह भारत के राजस्थान प्रदेश की बहुत ही पुरानी व समर्द्ध कला है. भाट जाति के लोगों द्वारा इसका निर्माण व प्रदर्शन किया जाता है. कठपुतली के माध्यम से जनता तक सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का प्रचार प्रचार करने के साथ-साथ चुनाव के समय मतदान के प्रति मतदाता को जागरूक करने का कार्य भी किया जाता है.कठपुतली के बारे में जानकारी | Kathputli/Puppets Information In Hindi

कठपुतली के बारे में जानकारी | Kathputli/Puppets Information In Hindi

कठपुतलियाँ होती तो निर्जीव है, पर उनके द्वारा किया गया प्रदर्शन ऐसा होता है, मानो कोई सजीव कलाकार अपनी प्रस्तुती दे रहा हो. कठपुतली दल गाँव, गाँव में जाकर परिवार का बड़ा आकार, दहेज प्रथा, नशाखोरी, बालिका शिक्षा (Kathputli story) आदि कार्यक्रम प्रस्तुत कर जनता को संदेश पहुचाते है. कठपुतली के खेल के माध्यम से जनता तक संदेश पहुचाने का कार्य सदियों से किया जा रहा है.

नगरों, अशिक्षित एवं शिक्षित जनता में मनोरंजन पूर्ण तरीके से अपनी बात जनता तक पहुचाने के लिए कठपुतली प्रदर्शन को माध्यम बनाया जाता है.

कठपुतली से जुड़ी कहानी (Story of Kathputli In Hindi)

प्राचीन इतिहास से जुड़ी कथाओं के अनुसार 400 ईसा पूर्व संस्कृत के व्याकरण के जनक पाणिनि के प्रसिद्ध ग्रंथ अष्टाध्यायी में कठपुतली (पुतला नाटक) का सर्वप्रथम उल्लेख मिलता है. कहा जाता है, कि एक बार भगवान् शंकर ने रूठी हुई देवी पार्वती को मनाने के लिए लकड़ी की बनी एक आकृति में बैठकर इस कला की शुरुआत की थी. इसके अतिरिक्त उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य की सिंहासन बतीसी कथा में भी 32 पुतलियों का उल्लेख मिलता है. आजकल इस कठपुतली कला का व्यापक प्रचार हो चूका है. भारत के अतिरिक्त कई अन्य एशियाई देशों में भी यह कला प्रसिद्ध है. इनका उपयोग विशेष रूप से शिक्षा कार्यक्रमों, रिसर्च कार्यक्रमों, विज्ञापनों में तेजी बढ़ रहा है.

कठपुतली नाटकों में पौराणिक कथाएँ, किवदंतियों तथा लोक देवी देवताओं से जुड़ी कथाओं तथा प्रेरक प्रसंग की महती भूमिका रही है. राजस्थान में इस कला की प्रमुख कथाओं की बात की जाए तो यहाँ अमर सिंह राठौड़, पृथ्वीराज, हीर-रांझा, लैला-मजनूं और शीरीं-फ़रहाद की कथाएँ काफी चर्चित है, और इन पर कठपुतली के नाटक प्रदर्शित किये जाते है. भारत में यह कला 2 हजार साल पुरानी है. आज लोगों के बिच मनोरंजन के ढेरों इलेक्ट्रोनिक साधन उपलब्ध है. एक समय था जब लोक नाटक या कठपुतलियाँ ही मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करती थी.

कठपुतलियों के प्रकार (types of kathputli in hindi)

उत्तर भारत मुख्यतः उत्तरप्रदेश से जन्मी इस परम्परा के द्वारा प्राचीन जमाने के राजा लोग कथाओं, धार्मिक, पौराणिक आख्यानों और राजनीतिक व्यंग्यों को प्रदर्शित करने के लिए कठपुतली का उपयोग ही किया करते थे. उत्तर भारत में इसके विकास के साथ ही दक्षिणी राज्यों में भी इनका प्रचलन धीरे धीरे शुरू हुआ. तथा देश के सभी भागों तक इसका प्रदर्शन किया जाने लगा.

देश की भौगोलिक भिन्नता के कारण इन्हें अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग नाम व तरीकों से जाना जाता है. तमिलनाडु में ‘बोम्मलट्टम’ का प्रदर्शन इसी का रूप है.  यहाँ पर इन्हें बड़े धागों व डंडों के साथ कठपुतली का खेल खिलाया जाता है. कर्नाटक में इसे गोम्बेयेट्टा आसाम में पुतला नाच, उड़ीसा में साखी कुंदेई तथा महाराष्ट्र में इसे मालासूत्री बहुली के नाम से जाना जाता है.

केरल के ‘तोलपवकूथु में इसे जानवरों की खाल, जिन्हें सूखने के बाद रंग बिरंगे रंगो से रंगा जाता है. जिनमें छोटे छोटे छेद कर कठपुतली का रूप दिया जाता है. तथा इसमें धर्म से जुड़े विषय तथा पौराणिक कथाओं का आख्यान करवाया जाता है.

भारत में कठपुतली (kathputli in india)

’राजस्थान की स्ट्रिंग कठपुतलियां भारत के अतिरिक्त विश्व भर में प्रसिद्ध है. 5-7 महीन धागों से बंधी ये राजस्थानी संगीत के साथ देखने वालों को मोहित कर देती है. इनकी आँखों, भोहों तथा होठों का आकार विशिष्टता प्रदान करता है. जैसा कि हम उपर जान चुके है, भारत के कई अन्य राज्य जैसे केरल, तमिलनाडू तथा कर्नाटक की कठपुतली भी काफी प्रसिद्ध रही है.

बोम्मालत्तम (तमिलनाडु) को एक विशेष तकनीक द्वारा निर्मित किया जाता है. इनके शरीर में छोटी छोटी रॉड के टुकड़े फसाए जाते है. माथे एवं हाथ में ये धागे से बंधी रहती है, जिनके जरिये कलाकार इन्हें नचाते है. इनका वजन 10-12 किलोग्राम तक हो जाता है, तथा आकार में सामान्य इन्सान की उंचाई के बराबर होती है.

 

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