कोनेरू हम्पी का जीवन परिचय | Koneru Humpy Biography In Hindi Language

कोनेरू हम्पी का जीवन परिचय | Koneru Humpy Biography In Hindi Language: जन्म: 31 मार्च 1987 को  गुडीवाड़ा (आंध्र प्रदेश) में जन्मी कोनेरू हम्पी ने मात्र 9 साल की आयु में ही नेशनल शतरंज टूर्नामेंट का गोल्ड मेडल जीतकर अपने करियर की शुरुआत की थी. महिला ग्रैंड मास्टर का खिताब जितने वाली हम्पी पहली भारतीय महिला हैं. इन्होने 1996 में 9 वर्ष से कम आयु वर्ग के खेल में भी गोल्ड मेडल जीतकर इतिहास रचा था. वर्ष 1997 में इन्होने नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीतने की तिगड़ी लगाकर स्वयं के देश के शतरंज के होनहार खिलाड़ी के रूप में प्रतिस्थापित किया.

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जीवन परिचय / जीवनी

चलपथी रेजीडेशिंयल स्कूल, गुंटूर में हम्पी ने अपनी आरम्भिक शिक्षा पूरी की. इनके पिता का नाम अशोक माता का नाम कोनेरू लता जबकि बहिन का नाम कोनेरू चन्द्र हासा हैं, बताया जाता हैं कि इन्होने अपनी पुत्री का नाम हम्पी इसलिए रखा था क्योकि इसका अर्थ होता है विजेता.

इस नाम के पीछे अशोक जी का यह सपना था कि उनकी बेटी बड़ी होकर विश्व चैंपियन बने, जब हम्पी पांच वर्ष की हुई तो उनके पिताजी उन्हें शतरंज की ट्रेनिंग देने लगे. उनकी बचपन से ही शतरंज में गहरी लग्न थी. वो बताती है कि जब वे मात्र 6 वर्ष की थी तो उनके पिताजी शतरंज गेम खेल रहे थे तथा अगली चाल के बारे में विचार कर रहे थे तो हम्पी ने उन्हें अगली चाल बताई, वह वाकई में सटीक थी. वह मात्र छः सात वर्ष की आयु में ही इस खेल में इतनी हस्तसिद्ध थी कि उन्होंने अपने मोहल्ले के लडकों को शतरंज की ट्रेनिंग देनी शुरू कर दी.

प्रशिक्षक

कोनेरू हम्पी के कोई कोच नही रखा गया था बल्कि उनके पिता अशोक ही खेल का प्रशिक्षण दिया करते थे. वे केमेस्ट्री के शिक्षक थे. मगर जब 1995 में हम्पी चौथे पायदान पर रही तो उन्होंने शिक्षक पद से इस्तीफा देकर पूर्णकालिक रूप से हम्पी को प्रशिक्षण देने का निश्चय किया.

अशोक दो बार स्टेट लेवल के शतरंज विजेता था. वे अपनी बेटी के साथ गुरु शिष्या का सम्बन्ध बताते हैं. उन्होंने अपनी बेटी को शतरंज के ऐसे गुर सिखाए कि आंध्रा सरकार ने उन्हें राज्य कोच बना दिया तथा पांच लाख रूपये का इनाम भी दिया था. हम्पी के उत्कृष्ट स्तर के अंतर्राष्ट्रीय शतरंज खिलाड़ी बनने में उनके पिता का बहुत बड़ा योगदान रहा.

खेल उपलब्धियां

इंटरनेशनल लेवल पर हम्पी के खेल को निखारने में बैंक ऑफ़ बड़ौदा का विशेष योगदान रहा. उन्होंने ऐसे समय में इनकी स्पांसरशिप ली जब इसके लिए कोई भी तैयार नहीं था. इन्होने अपने खेल जीवन में विश्वभर में भारत के गौरव को बढाया. 1998 में हम्पी ने तीन टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता.

वर्ष 2000 में इन्होने 14 आयुवर्ग में अहमदाबाद में गोल्ड मेडल जीता, 2002 में हैदराबाद में आयोजित वर्ल्ड शतरंज टूर्नामेंट में भी इन्होने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर देश का मान बढाया. बेहद छोटी सी आयु में ही हम्पी ने बहुत कुछ हासिल किया तथा उनके लिए पाने के लिए सम्पूर्ण संसार आगे थे. वे विश्वनाथ आनन्द को अपना आदर्श मानती हैं.

पुरुषों का ग्रैंडमास्टर जीतने वाली देश की प्रथम शतरंज खिलाड़ी को कई बार आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा. चूँकि शतरंज एक महंगा खेल है इसमें विदेशी यात्राओं के लिए काफी पैसा व्यय करना पड़ता हैं. उन्हें कोई स्पोंसर नही मिलने के कारण उन्हें वर्ष 2006 में ओ एन. जी. सी. में पर्सनल एडमिनिस्ट्रेटर की नौकरी करनी पड़ी. वह पैसे के अभाव में किसी उच्च स्तरीय कोच से प्रशिक्षण भी नहीं प्राप्त कर सकी, उनके लिए उनके द्रोणाचार्य अशोक कोनेरू ही रहे.

वर्ष 2006 में हम्पी ने दोहा एशियाई खेलों में भारत के नाम गोल्ड मेडल जीता.  15 वर्ष 1 माह 27 की आयु में पुरुषों का ग्रैंड मास्टर खिताब पाने वाली यह पहली भारतीय शतरंज खिलाड़ी बनी. विश्व की टॉप 50 महिलाओं की सूची में 16 वां स्थान इन्होने पाया है यह इनकी सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग थी.

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