कुंती देवी की जीवनी इतिहास कहानी और जीवन परिचय | Kunti Devi Biography History Story In Hindi

कुंती देवी की जीवनी इतिहास कहानी और जीवन परिचय | Kunti Devi Biography History Story In Hindi: धर्मपरायणता, ईश्वरपरायणता, त्याग, वैराग्य, निर्भयता, व्रतपरायणता, पतिव्रात्यता, सहनशीलता, आत्मविश्वास, परोपकारिता, नम्रता, सेवा भाव, साहस, निर्लिप्तता आदि सद्गुणों की धनी तथा आदर्श पुत्री, आदर्शं पत्नी, आदर्शं माता, आदर्श सेविका, आदर्श भगवदभक्त के रूप में जिनका नाम स्मरण में आता है वे हैं. महारानी कुंती देवी- Kunti Devi.

कुंती देवी की जीवनी | Kunti Devi Biography History Story In Hindi

great womens of indian history kunti life story in hindi: देवी कुंती Kunti Devi का बचपन से लेकर अंतिम समय तक का सम्पूर्ण जीवन चरित्र सभी के लिए अत्यंत पथप्रदर्शक हैं. नारियों के लिए तो यह महान प्रेरणा स्तम्भ हैं.

कुंती
जानकारी
पति  पांडु , गलती से सूर्य से कर्ण को जन्म दिया
बच्चे कर्ण के साथ सूर्य , युधिष्ठिर के साथ यम ,भीम के साथ वायु , अर्जुन के साथ इंद्र और

नाकुल और सहदेव के साथ

अश्विनी कुमारस

रिश्तेदार गांधीारी , भीष्म , कृष्ण , कौरव , पांडव ,विदुर , सत्यवती

great womens of indian history Kunti Devi Biography In Hindi

कुंती यदुवंशी राज शुरसेन की पुत्री थी जिसका नाम पृथा था. वे वासुदेव की बहन और श्री कृष्ण की बुआ थीं. शूरसेन ने अपनी सर्वगुण सपन्न कन्या को अपने फुफेरे भाई कुंतीभोज को दत्तक पुत्रीरूप में दिया था.

इस प्रकार पृथा को कुंती नाम से जाना जाने लगा. कठिनाई सहकर भी पिता के वचनों का पालन हो, इसका कुंती विशेष ध्यान रखती थी. बचपन से ही उनका साधू संतो गुरुजनों व् बड़ो के प्रति पूज्य और आदर भाव था तथा बन्धुओं व सेवक वर्ग के प्रति स्नेह का भाव था.

इससे राजमहल में सभी उससे संतुष्ट रहते थे. एक बार कुंतीभोज के पास भगवदीय संकल्प को पूरा करने हेतु जरा सी बात पर क्रोध करने जीवन्मुक्त महापुरुष महर्षी दुर्वासा पधारे.

दुर्वासाजी की सेवा करना यह कोई आसान कार्य नही था. लेकिन कुन्तिभोज कुंती के सभी सद्गुणों से परिचित थे. अतः उन्होंने कुंती से पूछे बिना ही महर्षि के सत्कार के लिए उन्हें नियुक्त कर दिया.

कुंती ने पिता द्वारा सौपा गया यह दायित्व निभाया और वे पिता के विश्वास पर खरा उतरी. उन्होंने एक वर्ष तक बड़ी सावधानी और सहनशीलता के साथ ऋषि दुर्वासा की सेवा की और उन्हें प्रसन्न कर दिया. दुर्वासाजी ने अपनी दूरद्रष्टि से यह जान लिया कि कुंती को अपने पति से कोई सन्तान नही होगी.

इसलिए उन्होंने कुंती को पुत्र प्राप्ति हेतु दिव्य मन्त्र प्रदान किया. ऋषि प्रदत मन्त्र शक्ति के प्रभाव से कुंती इतिहासप्रसिद्ध दानवीर कर्ण और अतुलित बलशाली पांडवों की माता बनी.

पतिव्रता कुंती देवी

पतिव्रत्य धर्म का पालन कुंती के जीवन में पद पद पर देखा जाता हैं. न केवल राजसुख के समय बल्कि राजा पांडु जब ऋषि से शापित हुए और तपस्या हेतु वन जाने लगे तब भी कुंती व माद्री ने अपने सभी सुखों भोगों को किनारे करते हुए पति के साथ वन में रहने का निर्णय किया.

पांडू के मना करने पर वह कहती हैं. हम दोनों कामसुख का परित्याग करके पतिलोक की प्राप्ति का लक्ष्य ले के ही अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों को संयम में रखती हुई भारी तपस्या करेगी. यदि आप हम दोनों को त्याग देगे तो आज ही हम अपने प्राणों का परित्याग कर देंगी, इसमें संशय नही हैं.

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