Labour Court Rules In Hindi | श्रमिकों के अधिकार पर निबंध

Labour Court Rules In Hindi श्रमिक समाज का महत्वपूर्ण अंग है. राष्ट्र के निर्माण, विकास एवं अर्थव्यवस्था में श्रमिकों का महत्वपूर्ण योगदान होता है. देश की विकसित अर्थव्यवस्था श्रमिकों की अच्छी स्थति पर निर्भर करती है. श्रमिकों को बेहतर कार्य एवं उनके कल्याण के लिए कई कानून बनाए गये है. केंद्र व राज्य सरकारों ने श्रमिकों को लाभ पहुचाने के लिए कई योजनाएं आरम्भ की है. श्रमिकों के अधिकार पर निबंध (Labour Court Rules) में आपकों इसी विषय पर विस्तृत जानकारी दी जा रही है.

श्रमिकों के अधिकार पर निबंध (Labour Court Rules In Hindi)

असंगठित श्रमिकों के कल्याण हेतु कानून व योजनाएँ (Laws and Schemes for the Welfare of Unorganized Workers)

श्रमिकों को उचित व न्यूनतम मजदूरी दिलाना सुनिश्चित करने के अतिरिक्त बंधुआ और ठेका मजदुर प्रथा (Contract labor practice) को समाप्त करने हेतु, मजदूर महिलाओं को प्रसूति के दौरान विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध करवाने हेतु न्यूनतम मजदूरी कानून(Minimum wage law) 1948, बंधुआ मजदूर प्रथा उन्मूलन अधिनियम (Bonded labor practice eradication act) 1976, ठेका मजदूर/Contract labor (उन्मूलन व विनियमन) अधिनियम 1970 व मातृत्व अभिलाभ अधिनियम (Maternity gain act) 1961 बनाए गये है.

हमारे देश में मजदूरो का एक बड़ा तबका भवन निर्माण (कमठा मजदूरी) से जुड़ा हुआ है. जिनके कल्याण के लिए भवन व अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम (Building Workers Act) 1996 बनाया गया है. इस अधिनियम में मजदूरों के स्वास्थ्य एवं बीमा के लिए प्रावधान करने के अतिरिक्त उनके बच्चों की शिक्षा हेतु सुविधा दी जा रही है.

श्रमिकों के लिए राजस्थान सरकार की योजनाएँ (Rajasthan government Schemes for workers)

राजस्थान में असंगठित प्रकार के श्रमिकों की संख्या अधिक है. ऐसे श्रमिकों के दुर्घटना, बीमा, स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य के लिए निम्न प्रमुख योजनाएं बनाई गई है.

  • निर्माण श्रमिकों के बच्चों हेतु छात्रावास (Hostel for children of construction workers)-निर्माण श्रमिकों के बच्चों हेतु प्रत्येक जिले में एक एक करोड़ की लागत से छात्रावासों के निर्माण की योजना है
  • दुर्घटना होने पर सहायता राशि में वृद्धि-निर्माण श्रमिक की दुर्घटना में मृत्यु होने पर पहले तक 75 हजार रूपये तक की राशि दी जाती थी, जिन्हें अब बढ़ाकर 5 लाख रूपये कर दिया है.
  • चिकित्सा अनुदान राशि में वृद्धि-चिकित्सा अनुदान की राशि को 50 हजार रूपये से बढ़ाकर एक लाख रूपये कर दिया है.
  • निर्माण श्रमिकों के बच्चों को दोगुनी राशि-निर्माण श्रमिकों के पुत्र-पुत्रियों को वर्तमान में दी जा रही छात्रवृति दर बढ़ाकर दुगुनी कर दी गई है. अब कक्षा 6 से 8 के छात्रों को 1000 रूपयें व छात्राओं को 1500 रूपये, स्नातक स्तर के बच्चों को तीन हजार रूपये छात्राओं को चार हजार रूपये, डिप्लोमा स्तर के बच्चों को 4000 हजार व लड़कियों को 5000 रूपये एवं स्नातकोतर स्तर पर छात्रों को 6 हजार रूपये तथा छात्राओं को 8000 रूपये की वार्षिक छात्रवृति सम्बन्धित परीक्षा उतीर्ण करने पर देय है.
  • प्रसूति सहायता योजना-महिला हिताधिकारी को दो प्रसव के लिए प्रति प्रसव 6000 हजार रूपये प्रसूति सहायता तथा जननी सुरक्षा योजना में नकद हितलाभ प्राप्त न होने पर 1000 रूपये अतिरिक्त सहायता.

निर्माण श्रमिकों के लिए गंभीर बीमारियों पर व्यय का पुनर्भरण योजना, 2011-

कैंसर, ट्यूमर, क्षय, ह्रद्य रोग व अन्य चयनित बीमारियों के हिताधिकारी के उपचार पर व्यय की गई राशि का 50 प्रतिशत अथवा 50,000 रूपये तक का पुनर्भरण.

असंगठित क्षेत्रों के श्रमिकों एवं खेतिहर मजदूरों के कल्याण कार्यक्रमों केंद्र सरकार द्वारा असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 बनाया गया. जिस उद्देश्य असंगठित क्षेत्रों के 20 व्यवसायों में कार्यरत कामगारों को सामजिक सुरक्षा प्रदान करना है.राजस्थान विश्वकर्मा गैर संगठित अंशदायी पेंशन योजना असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के जीवन सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण योजना है जिसके तहत श्रमिकों को पेशन लाभ दिया जाता है.

संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण हेतु योजनाएं (Schemes for the welfare of organized sector workers)

संगठित क्षेत्र के श्रमिकों के कल्याण हेतु सामाजिक सुरक्षा को दो श्रेणियों में रखा जा सकता है. 1. सामजिक बीमा 2. सामजिक सहायता. सामजिक बीमा को योजनाओं के लिए प्रायः कर्मचारियों नियोजकों और राज्य सरकार द्वारा अंशदान किया जाता है. इन योजनाओं से मिलने वाले लाभ प्रायः कर्मचारियों जिनका बीमा होता है, उनके योगदान से जुड़ा होता है.

सामाजिक सहायता की योजनाओं के अंतर्गत गरीब और जरुरतमंद लोगों को आर्थिक सहायता दी जा रही है. और इसके लिए किसी तरह के योगदान की शर्ते नही होती है. संगठित क्षेत्र में श्रमिकों से सम्बन्धित प्रमुख कानूनी प्रावधान एवं योजनाएं निम्न है.

कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम,1923 (Employees’ Compensation Act, 1923)

भारत में सामाजिक सुरक्षा की शुरुआत 1923 में हुई जब क्षतिपूर्ति अधिनियम पारित किया गया. इस अधिनियम के अंतर्गत केवल कारखानों और दूसरे उद्योगों में काम करने वाले श्रमिक आते है. और इसमे औद्योगिक दुर्घटना और काम करते हुए व्यवसायिक रोग लग जाने की स्थति में श्रमिकों और उनके परिवार के लोगों को हर्जाने की व्यवस्था है.

श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम में मृत्यु स्थायी और अस्थायी रूप से विकलांग होने की स्थति में अलग अलग दरों पर क्षतिपूर्ति की व्यवस्था है. 23 दिसम्बर 2009 को किये गये संशोधन में ‘ श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम’ का नाम कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम कर दिया गया है.

मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (Maternity Benefit Act, 1961)

मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 महिला श्रमिकों को मातृत्व लाभ की व्यवस्था करता है. इस अधिनियम के अंतर्गत महिला श्रमिकों को बच्चे के जन्म से 6 सप्ताह पहले और 6 सप्ताह तक मजदूरी सहित छुट्टी पाने का अधिकार है. जिन महिला श्रमिकों को कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम 1948 के अंतर्गत सामजिक सुरक्षा मिली हुई है.वे मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के अंतर्गत नही आती है. मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 के तहत लाभ प्राप्त करने के लिए मजदूरी के बारे में कोई प्रतिबन्ध नही है.

कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 (Employee’s State Insurance Act, 1948)

इस अधिनियम के अंतर्गत बिजली से चलने वाले ऐसे गैर मौसमी कारखाने जिसमें 10 या अधिक श्रमिक काम करते हो तथा बिजली से न चलने वाले ऐसे कारखाने जिसमे 20 या अधिक श्रमिक काम करते हो, आते है 1 मार्च 2010 से इस अधिनियम के अंतर्गत उन कर्मचारियों को सामजिक सुरक्षा लाभ प्राप्त है. जिसकी मासिक मजदूरी 15,000 रूपये से कम है.

कर्मचारी भविष्य-निधि तथा विविध प्रावधान अधिनियम, 1952 (Employees Provident Fund and Miscellaneous Provisions Act, 1952)

कर्मचारी भविष्य निधि तथा विविध प्रावधान अधिनियम 1952 के अंतर्गत कर्मचारियों को भविष्य निधि, परिवार पेंशन तथा जमाओं से जुड़ा बीमा के रूप में सेवानिवृत लाभ की व्यवस्था की गई है.

कर्मचारी भविष्यनिधि योजना (Employee preexisting scheme)

कर्मचारी भविष्यनिधि योजना कर्मचारियों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक प्रयास है. इसके अधीन अनिवार्य बचत की व्यवस्था है. कर्मचारी भविष्यनिधि योजना के अधीन एक मृत्यु राहत फंड (Death relief fund) स्थापित किया गया है. इसके अधीन सदस्य की मृत्यु होने पर उनके उतराधिकारी को आर्थिक सहायता देने की व्यवस्था है.

अन्य योजनाओं में कर्मचारी जमा सम्बद्ध योजना तथा ग्रेच्युटी भुगतान योजना है जो ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम 1972 से संचालित होती है. न्यूनतम पारिश्रमिक अधिनियम आजादी के बाद श्रमिक सुधारों की दिशा में पहला महत्वपूर्ण प्रयास था. वही औद्योगिक श्रमिकों के कल्याण के लिए उद्योग अधिनियम 1951 मील का पत्थर है. कार्मिको को अतिरिक्त लाभ में से बोनस दिलाने हेतु बोनस भुगतान अधिनियम 1965 लागू किया गया. इसी प्रकार कर्मचारी पेंशन योजना 1995 भी महत्वपूर्ण है.

इतने सारे कानून व् योजनाओं के बनाये जाने के बावजूद श्रमिकों की दशा में अपेक्षित सुधार नही हुआ है. श्रमिकों को उनके परिश्रम के अनुरूप वेतन नही मिलता है. महिला और पुरुष श्रमिकों के वेतन में असामनता असंतोष का सबसे बड़ा कारण है. कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव है.

श्रमिकों के दिन रात मेहनत करने के बावजूद उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा तथा सही तरीके से परिवार लालन पोषण ठीक से नही हो पाता है. खनन क्षेत्र में श्रमिक सिलिकोसिस, ट्यूबरक्लोसिस व अस्थमा जैसी गंभीर रोजगारजनित बीमारियों से पीड़ित है. जिसकी भयावह परिणिति गाँव की अधिकाँश महिलाओं के असमय विधवा होने के रूप में सामने आ रही है.

संगठित क्षेत्र के श्रमिकों की अपेक्षा असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की स्थति और भी खराब है. जो अधिकाश भवन निर्माण जैसे अस्थायी कार्यो में नियोजित होते है. जिनका कार्यस्थल बदलता रहता है. संगठन के अभाव में वे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की स्थति में नही रहते है. बढ़ते मशीनीकरण के दौर में नियमित कार्य नही मिलने से अधिकाँश श्रमिकों के समक्ष आंशिक बेरोजगारी की स्थति रहती है.

जो उन्हें नियोजकों की शोषणकारी शर्तो पर कार्य करने के लिए विवश करती है. ऐसे हालातों में श्रमिकों के जीवन में उल्लास, उमंग एवं संतुष्टि का बेहद अभाव रहता है. जिससे उनकी कार्यक्षमता निरंतर गिर रही है. जो अर्थव्यवस्था के साथ साथ समाज के सर्वागीण विकास के लिए घातक है. अतः श्रमिकों की स्थति में सुधार किया जाना समय की मांग है.

उक्त कानूनों और योजनाओं का पूरा लाभ पूरी तरह श्रमिकों को नही मिल पाने का प्रमुख कारण अशिक्षा व जानकारी का अभाव है. जिनके चलते श्रमिक इन कानूनों व योजनाओं का लाभ नही उठा पाते है. इसे द्रष्टिगत रखते हुए राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण ने पूरे जिले और तालुका स्तर पर पैनल अधिवक्ता और पैरालीगल वोलेंटियर की टीम बनाई है. जो श्रमिकों को उनके अधिकार तथा उनके कल्याण के लिए सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं की पूरी जानकारी देती है. इन योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में उनकी पूरी सहायता करती है.

श्रमिकों की समस्याओ के समाधान के लिए सभी संस्थाओं को मिलकर चौतरफा एकीकृत प्रयास करने की आवश्यकता है. प्राथमिकता इस बात की है कि श्रमिकों को उनके अधिकारों और कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी दी जाए तथा इन योजनाओं का लाभ उठाने के लिए आवश्यक सहायता प्रदान की जाए. विधिक सेवा संस्थाएँ इस दिशा में प्रयास कर रही है तथा श्रमिकों के हित के लिए प्रतिबद्ध है.

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