साहित्य समाज का दर्पण है | Literature And Society Essay

Literature And Society Essay:किसी भी राष्ट्र या समाज के सांस्कृतिक स्तर का अनुमान उसके साहित्य के स्तर से लगाया जा सकता हैं. साहित्य न केवल समाज का दर्पण होता हैं. बल्कि वह दीपक भी होता हैं. जो समाज का उसकी बुराइयों की ओर ध्यान दिलाता हैं. तथा एक आदर्श समाज का रूप प्रस्तुत करता हैं. विद्वानों ने किसी देश को बिना साहित्य के मृतक के समान माना हैं.

साहित्य समाज का दर्पण है/ Sahitya Samaj Ka Darpan Hai Essay In Hindi

Literature And Society Essay Hindi

अंधकार हैं वहाँ जहाँ आदित्य नही हैं
मुर्दा हैं वह देश जहाँ साहित्य नही हैं |

यह माना जाता हैं कि किसी देश की सभ्यता तथा संस्कृति के इतिहास को पढ़ने के लिए उसके साहित्य को ही पढना पर्याप्त होता है |इसीलिए साहित्य किसी देश ,समाज तथा उसकी सभ्यता या संस्कृति का दर्पण होता हैं. भारतीय साहित्य की महान परम्पराओं के कारण ही इस देश का गौरव विश्व के मानचित्र पर अक्षुण्ण बना रहा हैं. जिसमे साहित्यकारों ने अपनी लेखनी से विश्व समाज का सदैव मार्गदर्शन किया हैं. कालिदास, पाणिनी याज्ञवल्क्य, तुलसी, कबीर सूर मीरा आदि ने प्राचीन तथा मध्यकालीन कवियों द्वारा फैलाए गये प्रकाश से भारतीय समाज सदैव आलोकित होता रहा हैं.

साहित्य ही वह क्षेत्र हैं जो मनुष्य को परमार्थ, समाज सेवा, करुणा, मानवीयता, सदाचरण तथा विश्व बन्धुत्व जैसे उद्दात मानवीय मूल्यों का अनुसरण करना सिखाता हैं.

संस्कारवान व्यक्ति वही हैं जो ह्रदय से उदार हो,

निष्कपट व्यवहार करने वाला हो तथा अपने लिए किसी प्रकार के लोभ लालच की अपेक्षा ना करता हो.

साहित्य सदैव ऐसे ही महान मानवीय मूल्यों की रचना करता है

जो प्राणिमात्र के सुखद जीवन की कल्पना करते हों |

तुलसी ने अपनी प्रसिद्ध रचना रामचरितमानस में ऐसी अनेक सूक्ति परक चौपाइयों  की रचना की है जो व्यक्ति तथा समाज को सीधे -सीधे  निर्देश करती हैं ,जैसे  -का वर्षा  जब कृषि सुखाने   कर्म प्रधान विश्व करि राखा आदि |भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, मुंशी प्रेमचन्द ,निराला ,मुक्तिबोध जैसे अनेक साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज में सदाचार के संस्कार,श्रम साधना के संस्कार , राष्ट्रभक्ति के संस्कार, निस्वार्थ समाज सेवा के संस्कार, आचरण की सभ्यता के संस्कार तथा विश्व मानवता के संस्कार, सामाजिक समरसता के संस्कार आदि की स्थापना की हैं.

अत: कहा जा सकता हैं कि साहित्य ही वह उपकरण हैं  जो व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र को संस्कारवान बनाता हैं.

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