लाल किले की सैर पर निबंध | Long Essay on Red Fort in Hindi

प्रिय साथियो आपका स्वागत है Long Essay on Red Fort in Hindi में आज हम आपके साथ लाल किले की सैर पर निबंध साझा कर रहे हैं. कक्षा 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10 तक के बच्चों को ऐतिहासिक स्थल लाल किला पर निबंध कहा जाता हैं, तो आप सरल भाषा में लिखे गये इस हिन्दी निबंध को परीक्षा के लिहाज से याद कर लिख सकते हैं.

Long Essay on Red Fort in Hindi

Long Essay on Red Fort in Hindi

लाल किले की सैर पर निबंध Long Essay on Red Fort in Hindi

देश की राजधानी दिल्ली में स्थित लाल किला एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल हैं. भारत के प्रधानमंत्री हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर यहाँ झंडा फहराने के बाद इसी की प्राचीर से जनता को सम्बोधित करते हैं.

लाल किले को यूनेस्को के विश्व विरासत स्थलों में शामिल किया गया हैं. लाल किले का ऐतिहासिक महत्व हैं. दरअसल 1857 ई में यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रमुख केंद्र था.

पिछली गर्मियों की छुट्टी में मैं अपने मित्रों के साथ दिल्ली की सैर पर गया था. इस सैर की शुरुआत हमने लाल किले की सैर के साथ की.

लाल किले की सैर पर निबंध (lal qila Visit essay in hindi)

लाल किले में प्रवेश के लिए टिकट का प्रावधान हैं. हम चार मित्र थे. टिकट हाथ में होने के बावजूद भी हमें किले के भीतर प्रवेश करने के लिए थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ी.

दरअसल, लाल किला देखने आने वाले लोगों की एक लम्बी कतार लगी थी. हम सब भी उस पंक्ति में खड़े हो गये. यहाँ सुरक्षा के दृष्टिकोण से सबकी जांच की जा रही थी.

हमारी जांच हुई उसके बाद हमें भीतर प्रवेश करने दिया गया.

भीतर प्रवेश करने के साथ ही मेरे मित्र ने इस किले के बारे में बताना शुरू किया. लाल किले का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहाँ ने 1639 ई में करवाया था, जब शाहजहाँ ने शाहजहाँनाबाद नामक नगर का निर्माण करवाया था.

तब इस किले को भी उस नगर ही नहीं पूरे भारत के राजकाज के केंद्र के तौर पर निर्मित किया गया था. 1857 ई में इस किले पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया था. इसके बाद उन्होंने इसका प्रयोग एक छावनी के रूप में किया.

1947 ई में स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ ही अंग्रेजों ने इस किले को भारतीय सेना को सौंप दिया. 2003 ई में इस पर से सेना का नियंत्रण समाप्त कर इसे पर्यटन विभाग को सौंप दिया गया.

किले की दीवारें लाल पत्थर से बनी हुई हैं. इसलिए इसे लाल किला कहा जाता हैं. ये दीवारें ढाई किलोमीटर लम्बी हैं. इनकी ऊँचाई शहर की ओर तैंतीस मीटर तथा अन्य ओर सोलह मीटर हैं.

इस किले के भीतर कई महल हैं. लाल किले में मुगल वास्तुकला का अनुपम उदहारण देखने को मिलते हैं. इसके अतिरिक्त इसमें फारसी एवं भारतीय वास्तु कलाओं का भी प्रयोग किया गया हैं.

लाल किले की दीवारें दो मुख्य द्वारों पर खुली हैं. एक को दिल्ली गेट एवं दूसरे को लाहौर गेट कहा जाता हैं. लाहौर गेट ही किले का मुख्य प्रवेश द्वार हैं.

अपने मित्र से इतनी अच्छी जानकारी प्राप्त करने के बाद हम सभी लाल किले के भीतर आगे की ओर बढ़ गये. मुख्य प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही सबसे पहले हमें एक बाजार मिला, जिसे चट्टा चौक कहा जाता हैं, इसे शाहजहाँ के समय ही बसाया गया था.

इस बाजार में भारत के लगभग सभी क्षेत्रों की कलाकृतियाँ मिल जाती हैं. पत्थर की मूर्तियों से लेकर कश्मीर के शाल मिल जाते हैं. हम बाजार में सजी विभिन्न वस्तुओं को देखते हुए आगे बढ़ गये.

इसके बाद हम बाजार से थोड़ी दूर आगे लगी एक फोटो प्रदर्शनी देखने पहुंचें. इसमें दिल्ली के विभिन्न पर्यटन स्थलों की फोटो प्रदर्शनी लगाई गई थी.

इस प्रदर्शनी को देखने के बाद हम सामने बनी एक पुरानी ईमारत में पहुंचे. यह दीवान ए आम से ठीक पहले स्थित हैं. इसके दूसरे तल्ले को सैन्य संग्रहालय के रूप में प्रयोग किया जा रहा हैं.

इस सैन्य संग्रहालय में प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध के समय के हथियारों को प्रदर्शन के लिए रखा गया हैं. हथियारों के अतिरिक्त यहाँ उस समय के संचार उपकरणों जैसे टेलीफोन एवं सैनिकों की वर्दी को भी रखा गया है. इन वस्तुओं को देखने से उस समय के युद्ध के बारे में कई जानकारियाँ मिलती हैं.

इस ईमारत के आगे पर दीवान ए आम दिखाई पड़ता हैं. इसे जनसाधारण हेतु बनाया गया था. आम जनता इसके सामने बने मैदान में आकर बादशाह के सामने अपनी बात कहती थी.

बादशाह के बैठने के लिए यहाँ एक भव्य राजसिंहासन बना था. कहा जाता है कि पहले यहाँ पर मयूर सिंहासन था. 1739 ई में नादिरशाह इसे लूटकर ईरान ले गया था.

राजगद्दी के पीछे की ओर शाही निजी कक्ष स्थापित हैं. इस क्षेत्र में पूर्वी छोर पर ऊँचे चबूतरों पर बनी एक गुम्बंददार इमारतों की कतार हैं, जिनसे यमुना नदी का किनारा दिखाई पड़ता हैं.

ये सभी इमारतें एक छोटी नहर से जुडी हुई हैं, जिसे नहर ए बहिश्त कहा जाता हैं. किले को जल की आपूर्ति इसी नहर से होती थी. बीच की गुम्बंददार दो इमारतों को ख़ास महल एवं दीवान ए ख़ास कहा जाता था.

ख़ास महल में शाही कक्ष बने हैं. इनमें शाही शयन कक्ष, प्रार्थना कक्ष, एक बरामदा एवं बुर्ज बने हुए हैं. बुर्ज से बादशाह जनता को दर्शन देते थे. ख़ास महल के पूरब की ओर दीवान ए ख़ास महल हैं. इसे राज काज में सहयोग करने वाले ख़ास लोगों की बैठकों के लिए बनाया गया था.

इसके आगे दो महल हैं जिन्हें जनाना महल कहा जाता हैं. जनाना महल के साथ ही एक हमाम संलग्न हैं. यह शाही स्नानागार था. हमाम के पश्चिम में मोती मस्जिद बनी हैं.

उपरोक्त सभी महलों के पार्श्व की ओर एक वृहत्त उद्यान हैं. जिसे हयात बख्श बाग़ कहते हैं. यह दो भागों में विभाजित हैं. अंग्रेजों ने इस किले को अपने कब्जे में लेने के बाद इसके परिसर में एक चर्च का भी निर्माण कराया था. यह चर्च अभी भी इस किले में मौजूद हैं.

एक महल को संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया हैं. किले के भीतर महलों पर सफेद संगमरमर आच्छादित हैं. इन्हें कीमती पत्थरों एवं रत्नों से सजाया गया था. बाद में अंग्रेजों एवं विदेशी लुटेरों ने इस महलों की दीवारों पर जड़ित रत्नों को लूट लिया.

जिन स्थानों से रत्नों एवं पत्थरों को हटाया गया हैं. वहां खाली स्थान अभी भी दिखाई पड़ते हैं. महलों पर रंगीन पत्थरों एवं रंग रोगन से खूबसूरत एवं भव्य चित्रकारी भी की गई हैं. इसके अतिरिक्त इन पर की गई विभिन्न प्रकार की नक्काशियां बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं.

वैसे तो सैर करने के कई लाभ होते हैं, किन्तु ऐतिहासिक स्थलों की सैर की बात कुछ और ही होती हैं. लाल किले की सैर मेरे लिए अविस्मरणीय रहेगी. सैर करते हुए मुगल काल को याद करना वास्तव में बड़ा रोमांचक था. लाल किले के भीतर स्थित महलों को देखकर हमें मुगलकाल की सम्रद्धि का पता लगा.

लाल किले को देखने हर वर्ष लाखों सैलानी आते हैं. देश के कोने कोने से लोग इसको देखने के लिए आते ही हैं, विदेशी पर्यटकों की भीड़ भी यहाँ देखी जा सकती हैं. मैं अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूँ, कि मुझे लाल किले को देखकर इतिहास में झाँकने का एक सुनहरा अवसर मिला. प्रत्येक भारतीय को इसकी सैर जीवन में एक बार अवश्य करनी चाहिए.

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