मछली पालन व्यवसाय | Machli Palan/Fish Farming In Hindi

Machli Palan/Fish Farming In Hindi: बहुत बड़ी जनसंख्या के भोजन में मछली प्रोटीन का मुख्य स्रोत है. मछली पालन (PISCICULTURE) एक तरह की जलीय खेती है. इसके न केवल मछली उत्पादन के जरिये आय प्राप्त होती है, बल्कि कई अन्य समुद्री जीवों का पालन भी किया जाता है. पोषण की दृष्टि से जलीय जीव उत्तम होते है. क्योंकि ये प्रोटीन के सबसे बड़े स्रोत है. समुद्री मछली पालन की दो विधियाँ मुख्यत उपयोग में ली जाती है. जिनमे समुद्री या प्राकृतिक जल स्रोतों से मछली पकड़ना व कृत्रिम जल स्रोत बनाकर मछली का सर्वधन करना शामिल है.

मछली पालन व्यवसाय | Machli Palan/Fish Farming In Hindiमछली पालन व्यवसाय | Machli Palan/Fish Farming In Hindi

मछलियों के जल स्रोत समुद्री जल तथा ताजा जल है. मीठा जल नदियों, झीलों व तालाबों में होता है. इसलिए मछली पकड़ना व मछली संवर्धन समुद्र तथा ताजे जल के पारिस्थतिकी तंत्रों में किया जा सकता है. मछली उद्योग में वृद्धि व उत्पादन खारे जल की अपेक्षा मीठे जल में अधिक होता है.

भारत का समुद्री मछली व्यवसाय (marine fish production in india)

भारत का सामुद्रिक मछली संसाधन क्षेत्र 7500 किलोमीटर समुद्र ट तथा इसके अतिरिक्त समुद्र की गहराई तक है. सर्वाधिक प्रचलित समुद्री मछलियाँ पोमफ्रेट, मैकर्ल, टूना, सारडाइन तथा बांबेडक है. समुद्री मछली पकड़ने के लिए विभिन्न प्रकार के जालों का उपयोग मछली पकड़ने वाली विशेष प्रकार की नावों के साथ किया जाता है.

सबसे अधिक लाभ देने वाली कुछ मछली की प्रजातियों का भी इसी जल में संवर्धन किया जाता है. इनमें प्रमुख है, मुलेट, भेटकी तथा पर्लस्पॉट, कवचीय मछलियाँ जैसे झींगा, मस्सल तथा आएन्टर का संवर्धन मोतियों को प्राप्त करने के लिए किया जाता है. भविष्य में मछलियों का भंडार कम होने की स्थति में मछलियों की पूर्ति संवर्धन के द्वारा की जा सकती है. इस प्रणाली को समुद्री संवर्धन (मरीनकल्चर marine culture) कहते है.

अतःस्थली मछली पालन (indoor fish farming in india)

ताजा जल के स्रोत नाले, तालाब, पोखर तथा नदियाँ है. खारे जल के संसाधन जहाँ समुद्री जल तथा ताजा जल मिश्रित होते है. जैसे कि नदी मुख (एच्युरी) तथा लैगून भी महत्वपूर्ण मत्स्य भंडारण क्षेत्र है.

जब मछलियों का संग्रहण अतः स्थली वाले स्रोतों पर किया जाता है. तो उत्पादन अधिक नही होता है. इन स्रोतों से अधिकाँश मछली उत्पादन जल संवर्धन द्वारा ही होता है. मछली संवर्धन कभी कभी धान की फसल के साथ भी किया जाता है. अधिक मछली संवर्धन मिश्रित मछली संवर्धन तन्त्र से किया जा सकता है. इसी प्रक्रिया मे३ देशी तथा आयतित प्रकार की मछलियों का प्रयोग किया जाता है.

ऐसे तन्त्र में एक ही तालाब में 5 अथवा 6 मछलियों की स्पीशीज का प्रयोग किया जाता था. इनमें ऐसी मछलियों को चुना जाता है. जिनमें आहार के लिए प्रतिस्पर्धा न हो और उनके आहार भिन्न भिन्न हो. इसके परिणामस्वरूप तालाब के प्रत्येक भाग में उपलब्ध आहार का प्रयोग हो जाता है. जैसे कटला मछली जल की सतह से भोजन प्राप्त करती है, रोहू मछली तालाब के मध्य क्षेत्र से अपना भोजन प्राप्त करती है. म्रगल तथा कॉमन कार्प तालाब की तली से भोजन लेती है. ग्रास कार्प खरपतवार खाती है.

इस प्रकार सभी मछलियाँ साथ साथ रहते हुए भी, बिना स्पर्धा के अपना अपना आहार लेती है. इससे तालाब में मछली उत्पादन में भी बढ़ोतरी होती है.

हिंदी में pangasius मछली की खेती

इसे पंगास मछली भी कहा जाता है. दुनिया में पाई जाने वाली सभी मछलियों में यह संख्या की दृष्टि से इसका तीसरा स्थान है. इसकी वृद्धि सबसे तीव्र होती है. 7-8 माह में इस मछली के बच्चें का वजन डेढ़ से दो किलों तक हो जाता है. भारत में आंध्रप्रदेश राज्य में इसका पालन अधिक किया जाता है.

इस पंगास मछली की सबसे बड़ी विशेषता यह है, कि यह जल में घुलित कम ऑक्सीजन की मात्रा पर भी स्वयं को जीवित रख पाने में समर्थ है. इस नस्ल की मछली पालन के झारखंड की जलवायु सबसे उत्तम मानी जाती है. यहाँ के छोटे छोटे तालाबों में भी 5-6 माह की अवधि में पंगास का अच्छा उत्पादन किया जाना संभव है. इन्हें छोटे एक्वेरियम में रखकर भी संवर्धन किया जा सकता है. देखने में यह सार्क मछली की तरह चमकदार होती है.

पंगेसियस मछली पालन का क्या हैं तरीका, देखिए इस विडियो में

भारत में मछली की प्रमुख नस्ल (fish farming in india)

मीठे पानी में मछली पालन के लिए विशेष जाति (नस्ल) की मछलियों का ही चयन किया जाता है. इनमें प्रमुख रूप से कतला, रोहू (लेबियो), म्रगल, आदि देशी मछलियाँ प्रमुख है. इसके अलावा विदेशी मछलियों में जैसे सिल्वर कार्प, कॉमन कार्प, ग्रासकार्प को सम्मिलित किया जाता है.

मछलियों के लिए भोजन सामग्री (fish food india)

जलाशय में मछलियों को दो प्रकार के भोजन की आवश्यकता होती है.

  1. प्राकृतिक भोजन
  2. कृत्रिम भोजन
  • प्राकृतिक भोजन (Natural food)– यह सूक्ष्म पादप एवं सूक्ष्म जन्तु होते है, इनका उत्पादन नियमित होता रहे, इसके लिए कृत्रिम खाद एवं उर्वरक का उपयोग किया जाता है. इसके लिए जैविक खाद और मुर्गियों की बीट डाली जाती है. जल की अम्लीयता को कम करने के लिए चुने की अल्प मात्रा भी मिलाई जाती है. प्राकृतिक भोजन के साथ साथ मछलियों की उपयुक्त एवं तीव्र वृद्धि के लिए कृत्रिम भोजन का अपना महत्व है. इनमें चावल की भूसी, अनाज के टुकड़े, चावल का चापड़, सोयाबीन, खमीर, बादाम की खली आदि प्रमुख है.
  • जीरे का संचय- छोटी मछलियों को जीरा कहते है. जीरे की लम्बाई 1 से 1.5 इंच की होती है. तालाब में जीरे की निश्चित मात्रा ही डाली जानी चाहिए. तालाब में डालने से पूर्व इन्हें कुछ समय के लिए 3 प्रतिशत नमक अथवा पौटेशियम परमैगनेट के घोल में रखना चाहिए जिससे ये परजीवी मुक्त हो सके.

जीरा तीन चार माह के बाद अन्गुलिकाएं बन जाती है. इसकी लम्बाई तीन से चार इंच की होती है. यही अवस्था 6 से 12 माह में वृद्धि कर वयस्क मछली में बदल जाती है.

मछली पालन के लिए सावधानियां (5 safety practices while fishing)

मत्स्य पालकों को मछली पालन करते समय निम्नलिखित सावधानियां रखनी चाहिए.

  • जीरे का संचय जलाशय में प्रातकाल में ही करना चाहिए.
  • तालाब की सफाई नियमित करनी चाहिए. इससे अनुपयोगी व हानि पहुचाने वाली वनस्पतियाँ समय समय पर निकालकर पृथक कर देनी चाहिए.
  • निश्चित अंतराल में परिवर्तित होने वाली मछलियों की जांच करनी चाहिए, जिससे उनसे होने वाली बीमारियों का पता चल सके तथा उनका नियमित उपचार भी करना चाहिए.
  • रोगी मछली को बाहर निकालकर नष्ट कर देना चाहिए.
  • बादल होने पर या बिजली चमकते समय मछली की निकासी नही करनी चाहिए.
  • मछलियों को दिया जाने वाला आहार उनके लिए रुचिकर व पौष्टिक होना चाहिए.

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