महाराणा प्रताप का इतिहास कहानी & जीवनी | Maharana Pratap History In Hindi

Maharana Pratap History In Hindi महाराणा प्रताप का इतिहास, जीवन परिचय, जीवनी, कहानी, फोटो, वीडियो, जयंती, मेवाड़ का इतिहास जानने के लिए हमे यह पूरा लेख पढ़ना पड़ेगा.

अनूठी आन बान और शान वाला या राजस्थान प्रान्त शक्ति, भक्ति और अनुरक्ति की त्रिवेणी माना जाता हैं. यहाँ का इतिहास और शौर्य एवं औदार्य के लिए विश्वविख्यात हैं. ऐसी देशभक्ति और वीरता से कुटकुट भरी मेवाड़ धरा पर स्वतन्त्रता प्रेमी और महान नायक महाराणा प्रताप का जन्म भूमि रही हैं. इस प्रदेश में जान तथा प्राण से बढ़कर प्रण की शाश्वत परम्परा रही हैं. राजस्थान की इसी तपोभूमि कुछ ऐसी विशेषताएं रही हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ हैं. यहाँ के वीरो ने धरती, धर्म, स्त्री और असहायों की रक्षार्थ मरने को मंगल माना, यहाँ की विरागनाओ ने अपनी कंचन जैसी काया का मोह त्यागते हुए अपने हाथों अपना शीश काटकर अपने पतियों का प्रण पालन किया हैं. यहाँ के संतो ने जन जन की जड़ता को दूर करते हुए मानव धर्म की अलख जगाई हैं.

महाराणा प्रताप का इतिहास

Maharana Pratap History Story & Biography In Hindi

यहाँ के साहित्यसेवकों ने राजा से रंक तक सभी को कर्तव्य पथ पर अडिग डंग भरने की सुभट सीख दी हैं. जीवन से अत्यधिक मोह होते हुए भी काम पड़ने पर मरने से मुह न मोड़कर सिन्धुराग पर रीझते उन वीरों की मर्दानगी की मरोड़ देखते ही बनती हैं. दुनियाँ में दूसरी जगह शायद ऐसा कोई उदाहरण हो जहाँ वचन प्रतिपालन हेतु विवाह के काकण डोरड़े खोले बिना ही दुल्हे ने चंवरी से राजकुमारी को छोड़कर भवरी की पीठ पर सवार हो युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया हो.धरती तथा धर्म की रक्षार्थ शूरवीर, शस्त्रों की तीक्ष्ण धार से कटते काटते रक्त से स्नान करते थे.

उसे राजस्थानी साहित्य में र=धारा-स्नान कहा गया हैं. ऐसे अनेक धारा स्नान की साक्षी यह राजस्थान की धोरा धरती धारा-तीर्थ की प्राचीन धाम मानी जाती हैं. इस वीर-वसुधरा की उज्ज्वल रज अपने गौरव मय इतिहास के लिए प्रसिद्ध हैं.

मेवाड़ का इतिहास

यहाँ की रम्य रज जहाँ गर्मी में अत्यधिक तप्त होकर आग उगलती हैं वही चांदनी रात में शीतल कोमल एवं रमणीय हो कर अम्रत रस बरसाती हैं. धरती की मूल तासीर ही उसके सपूतों में आती हैं. और यही तासीर इस भूमि को विश्व विश्रुत बनाती हैं.

यु तो वीरभूमि राजस्थान एक-एक अंग वीरत्व की अनगिनत उदाहरण की साक्षी हैं. पर उसका मेवाड़ क्षेत्र तो अपनी वीरता, धीरता, मातृभूमि प्रेम, शरणागत वात्सल्य एवं अडिगता में अपना कोई सानी नही रखता. बाप्पा रावल, पद्मिनी, मीराबाई, महाराणा हम्मीर, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, महाराणा राजसिंह, हाड़ी रानी तथा पन्नाधाय जैसे अनेक महनीय नाम इस पावन धरा से जुड़े हुए हैं, जिनके तेजस्वी जीवन ने समाज को प्रेरणा दी . महाराणा सांगा के जयेष्ट पुत्र भोजराज का विवाह भक्त शिरोमणि मीरांबाई के साथ हुआ था.

तथा सांग के महारानी कर्मवती के दो छोटे पुत्र कुवर विक्रमादित्य एवं उदयसिंह थे. दासी पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी. अब वह उदयसिंह को मारने का षड्यंत्र करने लगा. धाय माँ पन्ना ने उदयसिंह को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया तथा उसके पलंग पर अपने पन्द्रह वर्षीय पुत्र चन्दन को सुला दिया. बनवीर ने उसे उदयसिंह समझ कर उसकी हत्या कर दी. छाती पर पत्थर रखकर, उस महिमामयी माँ ने अपने कलेजे के टुकड़े चन्दन का दाह संस्कार किया.

मातृभूमि के लिए एक माँ ने अपने पुत्र का बलिदान कर उदयसिंह का जीवन बचाते हुए राष्ट्र धर्म का अनूठा उदाहरण पेश किया.

महाराणा प्रताप का जन्म

उदयसिंह महाराणा सांगा के सबसे छोटे पुत्र थे. कुम्भलगढ़ में उनका विवाह पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री जयवंती देवी के साथ हुआ. इन्ही की पावन कोख से 9 मई 1540 जयेष्ट शुक्ल तृतीया वि.स. 1597 को कुम्भलगढ़ में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ. संयोग से इसी समय उदयसिंह ने बनवीर को हराकर चितोड़ प्राप्त किया. वे मेवाड़ के नये महाराणा बने. प्रताप अपनी माँ जयवंती देवी के पास कुम्भलगढ़ में रहकर शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने लगे.

माँ ने महाराणा प्रताप को बचपन में ही स्वतन्त्रता की घुंटी पिला दी थी. निहत्थे शत्रु पर वार न करने की सलाह देकर, दो तलवारे रखने का आग्रह किया. माँ की शिक्षा से महाराणा प्रताप निरंतर शस्त्र व शास्त्र का ज्ञान प्राप्त कर रहे थे. कुम्भलगढ़ में ही महाराणा प्रताप भील जाति के बालकों के साथ खेलने लगे.

वे उनमें कीका के नाम से प्रसिद्ध हो गये.जन-जाति वर्ग के बालकों के साथ महाराणा प्रताप खेलते थे. यही सम्बन्ध आगे चलकर भीलों के स्वतंत्रता युद्ध में शामिल होने का आधार बना. वर्ष 1952 ने महाराणा प्रताप की माँ के साथ चितोड़ आ गये. यहाँ वे चित्तोड़ के झाली महल में रहने लगे. कृष्णदास रावत की देख-रेख में उनकी शस्त्र विदध्या प्रारम्भ हुई, महाराणा प्रताप शीघ्र ही तलवार, भाला तथा घुड़सवारी कला में पारंगत हो गये.

इसी समय मेड़ता से चित्तोड़ आर जयमल राठौर से महाराणा प्रताप ने युद्ध सम्बन्धी विशेष ज्ञान प्राप्त किया. व्यूह बनाकर शत्रुदल को परास्त करने की अनेक विधियाँ सीखी तथा खासतौर पर महाराणा प्रताप ने छापामार युद्ध कला में निपुणता प्राप्त कर ली.

महाराणा प्रताप के माता-पिता & बचपन

सोलह सत्रह वर्ष की अल्पायु में महाराणा प्रताप सैनिक अभियानों में जाने लगे. वागड़ के सांवलदास व उनके भाई कर्मसी चौहान को सोम नदी के किनारे युद्ध में परास्त किया. छप्पन क्षेत्र के राठौड़ो व गौड़वाड़ क्षेत्र को भी परास्त कर अपने अधीन कर लिया. महाराणा प्रताप की वीरता की सर्वत्र प्रशंशा होने लगी. उसी समय महाराणा प्रताप का विवाह राव मामरख पंवार की पुत्री अजबदे महाराणा प्रताप की पत्नी (वाइफ, जीवनसाथी) बनी.

उसी समय महाराणा प्रताप ने देश की वर्तमान राजनितिक स्थति के बारे में जानकारी प्राप्त करना शुरू कर दिया. भविष्य को ध्यान में रखते हुए महाराणा प्रताप ने अपने मित्रो का चयन कर, उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया. 16 मार्च 1559 में महाराणा प्रताप को अजबदे की कोख से अमरसिंह नामक पुत्र की प्राप्ति हुई.

भारत में उस समय अकबर अपने सम्राज्य का विस्तार करने में लगा हुआ था. सम्पूर्ण राजपुताना उसके समक्ष झुक गया था. केवल एक मेवाड़ अडिग था. अकबर का मेवाड़ पर आक्रमण प्रतीक्षित था. भविष्य में सघर्ष की योजना बनने लगी. महाराणा प्रताप अपने विश्वस्त मित्रों भामाशाह, ताराचंद, झाला मानसिंह आदि वीरो के साथ विजय स्तम्भ की तलहटी में सम्पूर्ण परिस्थतियो में विचार करते, मेवाड़ सुरक्षा की योजना बनाते. इसी दौरान आपसी मन मुटाव के कारण महाराणा प्रताप का छोटा भाई शक्तिसिंह नाराज होकर अकबर के पास चला गया.

अकबर के मेवाड़ आक्रमण की योजना पर वह चित्तोड़ लौट आया तथा समाचार दिया, युद्ध परिषद केनिर्णय के कारण महाराणा उदयसिंह सपरिवार उदयपुर चले गये.महाराणा प्रताप को भी मन मसोस कर साथ जाना पड़ा. पीछे कमान जयमल राठौड़ एवं पत्ता चुण्डावत को सौपी गईं. अक्टूबर 1567 में अकबर ने चितोड़ पर आक्रमण कर दिया.

महाराणा प्रताप का इतिहास

चार माह तक घेरा डाले रखा मगर उसे कुछ भी हासिल नही हुआ. सर्वशक्तिमान बादशाह का गर्व मेवाड़ के सामने चूर-चूर हो गया. उसने टोडरमल को भेज जयमल को खरीदने का प्रयास किया. किन्तु जयमल ने प्रस्ताव ठुकरा दिया और युद्ध में मुकाबला करने को कहा. किले में रसद खत्म हो गईं. तब 25 फरवरी 1568 के पावन सतीत्व रक्षार्थ पता चुण्डावत की पत्नी महारानी फुल कुंवर के नेतृत्व में 7000 क्षत्राणीयों ने जौहर किया. उधर वीरो ने केसरिया बाना धारण कर हर हर महादेव के गगनचुंबी उद्घोष के साथ रणभूमि में प्रवेश किया. रणमल राठोड़ के घुटने में चोट लगने के कारण वे अपने भतीजे कल्ला राठोड़ के कंधे पर बैठकर युद्ध करने आए.

इनके चतरुभुज स्वरूप ने मुग़ल सेना पर कहर बरफा दिया. यह देख अकबर भी हतप्रभ रह गया. इन्हे रोकने का प्रयास किया गया,इनका सामना करने की हिम्मत किसी में नही थी. अततः पीछे से वार कर जयमल व कल्ला राठोड़ के मसतक काट दिए. पाडन-पोल के पास जयमल का बलिदान हुआ. साहसी वीर कल्ला का सिर काटने के बाद भी धड़ लड़ता रहा. अनेक मुगल सैनिको के सिर काटने के बाद वे भी रणखेत रहे.

अकबर की सेना ने किले में प्रवेश कर वहां रह रहे तीस हजार निर्दोष स्त्री पुरुष व बच्चों का कत्लेआम कर अपनी जीत का जश्न मनाया. महाराणा उदयसिंह इस हार को सहन न कर सके. इसी दौरान उन्होंने गोगुन्दा को अपनी राजधानी बनाया. अस्वस्थता के कारण 28 फरवरी 1572 में होली के दिन उनका स्वर्गवास हो गया.

महाराणा प्रताप का राजतिलक

शमशान में युवराज महाराणा प्रताप को देखकर सामंतो में कानाफूसी होने लगी. तब मालुम हुआ कि भटियानी रानी के पुत्र जगमाल को उदयसिंह ने अपना उताधिकारी घोषित कर दिया था. मेवाड़ की परम्परा के अनुसार जयेष्ट पुत्र की गद्दी का हकदार होता हैं. लेकिन उदयसिंह ने महारानी की बातों में आकर जगमाल को उतराधिकारी घोषित किया था. इस विपरीत परिस्थिति में कृष्णदास एवं रावत सांगा ने सामन्तो से विचार-विमर्श कर महाराणा प्रताप को गद्दी पर बैठाने का निर्णय लिया.

उन्होंने उदयसिंह का दाहसंस्कार कर शमशान से लौटते समय महादेवजी की बावड़ी पर महाराणा प्रताप का राजतिलक किया. बाद में महलों में आकर जगमाल को गद्दी से उतारकर 32 वर्षीय महाराणा प्रताप का विधिवत राज्यभिषेक किया गया. यह काँटों से भरा ताज था. मेवाड़ क्षेत्रफल, धन धान्य में छोटा हो गया था. महाराणा प्रताप ने सैन्य पुर्नगठन व राज्य व्यवस्था पर ध्यान दिया. जन शक्ति को जाग्रत करने हेतु महाराणा प्रताप ने भीषण प्रतिज्ञा की, ” जब तक मै शत्रुओ से अपनी मातृभूमि को स्वतंत्र नही करा लेता तब तक मै न तो महलों में रहूगा, न सोने चांदी के बर्तनों में भोजन करुगा. घास ही मेरा बिछौना तथा पत्तल दोने ही मेरे भोजन पात्र होंगे.

 महाराणा प्रताप द्वारा ताकत बटोरना

इस भीषण प्रतिज्ञा का व्यापक प्रभाव हुआ. सारे जनजाति क्षेत्र के भील महाराणा प्रताप की सेना में शामिल होने लगे. मेरपुर-पानरवा के भीलू राणा पूंजा अपने दल-बल के साथ महाराणा प्रताप की सेना में शामिल हो गये. उन्ही वीर सैनिको ने वनवास काल में महाराणा प्रताप का साथ दिया.

अफगानों से मेवाड़ का रिश्ता प्राचीन काल से था. बप्पा रावल ने गजनी व गोर प्रदेश की राजकुमारियो से विवाह किया थे. इनसे उन्हें 140 संताने प्राप्त हुई. वे नौशेरा पठान कहलाए. उन्होंने मेवाड़ के पक्ष में काम किया. अब अफगान हकीम खां सूरी भी अपनी सैन्य शक्ति के साथ महाराणा प्रताप के साथ मिल गया. अकबर का सम्राज्य पुरे भारतवर्ष में फ़ैल गया था. सारे राज्य उनके समक्ष झुक गये किन्तु मेवाड़ झुका नही. अकबर ने कुटनीतिक प्रयास प्रारम्भ किये. उसने नवम्बर 1572 में जलाल खां कोरची को संधि वार्ता हेतु भेजा.

महाराणा प्रताप को मालुम था, युद्ध होकर रहेगा. किन्तु तैयारी में कुछ समय चाहिए. इसलिए कुटनीतिक का जवाब कूटनीति से दिया, जलाल खान को मीठी बाते कह कर भेज दिया.

महाराणा प्रताप और अकबर के बीच संधि प्रयास

अब दुसरे संधि कर्ता के रूप में आमेर का राजकुमार कुंवर मानसिंह जून 1573 में वार्ता करने के लिए मेवाड़ आया. प्रताप ने उदयसागर की पाल पर उसका स्वागत किया. किन्तु मानसिंह अपने प्रयासों में सफल नही हो सका, वह असफल होकर लौट गया. महाराणा प्रताप व अकबर के बिच हजारों नर-नारियों के बलिदान व जौहर की लपटों की लकीर थी. हजारो ललनाओं के मांग के सिंदूर को पार कर अकबर से समझौता करना महाराणा प्रताप जैसे स्वाभिमानी और स्वतन्त्रता के उपासक के लिए सम्भव नही था.

अकबर ने फिर भी प्रयास जारी रखे. उसकी ओर से तीसरे राजदूत आमेर के राजा भगवंतदास सितम्बर 1573 को प्रताप के पास आए, उन्हें भी प्रताप ने ससम्मान रवाना किया. इसके बाद अकबर ने अपने नौ रत्नों में से एक टोडरमल को वार्ता के लिए भेजा. दिसम्बर 1573 में प्रताप ने टोडरमल को भी खाली हाथ लौटा दिया.

चारों संधि वार्ताओ का कुटनीतिक उत्तर देकर महाराणा प्रताप ने युद्ध की तैयारी का समय प्राप्त कर लिया. इस बीच भावी समर की पूर्ण तैयारी कर ली. महाराणा प्रताप ने युद्ध परिषद की बैठक बुलाई और विचार विमर्श के बाद यह निर्णय हुआ कि अकबर की विशाल सेना और ताकत के आगे छापामार युद्ध पद्दति से लड़ना उचित होगा.

महाराणा प्रताप की कहानी

उधर अकबर ने अजमेर आकर मानसिंह व आसफ खा के नेतृत्व में 5000 सैनिकों के साथ मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजा. मानसिंह मांडलगढ़ होकर बनास नदी के किनारे मोलेला ग्राम पहुच गया. उधर प्रताप ने भी अपनी सेना लोसिंग में पड़ाव में डाल दिया. पुरे मेवाड़ के मैदानी इलाकों को खाली करवाकर, जनता को सुरक्षित पहाड़ो पर भेज दिया. महाराणा प्रताप की सेना में 36 बिरादरी के लोग शामिल थे. प्रताप की तीन हजारी सेना शत्रुओं पर टूट पड़ने के लिए तैयार थी. 400 भील सैनिक ने मौर्चा बंदी कर रखी थी. 18 जून 1576 का ऐतिहासिक दिन हल्दीघाटी के युद्ध में रूप में अमर हो गया.

इसी दिन महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के एक संकरे दर्रे से निकलकर मुंगलसेना पर आक्रमण किया. राणा की सेना में झाला मान, हकीम खा, ग्वालियर के राजा रामसिंह तंवर आदि वीर थे. इस भीषण आक्रमण को मुगल सेना नही झेल पाई. सिकरी के शहजादे शेख मंजूर, गाजी खान बख्शी हरावत दस्ते में थे.

महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी का युद्ध

प्रताप की सेना ने प्रचंड हमला बोला तो मुगल सेना 8-10 कोस भागती चली गईं. और मोमेला स्थित अपने डेरे तक पहुच गईं. इस पहले आक्रमण के कारण सारी सेना में भयकर डर व्याप्त हो गया. ऐसी स्थति में चंदावल दस्ते के प्रमुख मिह्त्तर खान ने ढोल बजाकर मुगल सेना को रोका और कहा अकबर स्वय सहायता के लिए आ रहा हैं. इससे सेना में ढाढस बधा. बिखरी सेना को संगठित कर खमनोर के मैदान में लाया गया. यहाँ दोनों सेनाओं में घनघोर युद्ध हुआ.

चिरकाल की क्षुधा के बाद मेवाड़ी सैनिक की तलवारे भूखे व्याध सी लाप्ल्पानेल्गी. दोनों सेनाओं में घमासान युद्ध होने लगा. महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर हमला बोला. चेतक ने अगली दोनों टांगे हाथी के मसतक पर दे मारी. महाराणा प्रताप के सवा मण के भाले की मार से महावत मारा गया, हौदा टूट गया, महाराणा प्रताप ने कटार फेकी लेकिन मानसिंह बचकर अपनी जान बचाने में सफल रहा. शत्रु का काम तमाम समझ , महाराणा प्रताप ने चेतक को हटा लिया. चेतक की टांग, हाथी की सूड पर लगी तलवार से कट गईं. फिर भी वह युद्ध भूमि में विचरण करता रहा, महाराणा प्रताप ने तलवार के एक ही वार से जिरह, बख्तर एवं घोड़े सहित बहल्लोत खा के दो फाड़ कर दिए.

मानसिंह का हाथी बिना महावत के मैदान से भाग गया. मुग़ल सेना में भगदड मच गई तो अतिरिक्त तोपखाना लाया गया. इस बदली हुई परिस्थति में महाराणा प्रताप ने पूर्व निर्धारित योजनानुसार अपनी सेना के दोनों भागों को एकत्रित कर पहाड़ो पर मौर्चेबंदी कर दी.पीछे सादड़ी के झाला मानसिंह ने वीरतापूर्वक शत्रु सेना को रोकते हुए अपना बलिदान दे दिया.इस युद्ध में रक्त का तालाब बन गया था.इसलिए यह क्षेत्र रक्त-तलाई कहलाया.

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रामदास मेडतिया, हकीम सूरी, रामसिंह तंवर एवं उनके तीनो वीरो का बलिदान हुआ. महाराणा प्रताप के लगभग 150 सैनिक शहीद हुए, मुगल सेना को भारी क्षति हुई, लगभग 500 सैनिक मारे गये. मेवाड़ी सेना के पहाड़ो में घात लगाए, बैठे होने के कारण मुग़ल सेना आगे न बढ़कर अपने डेरे में लौट गईं.

युद्ध से लौटते समय घायल चेतक ने महाराणा प्रताप को लेकर बीस फीट चौड़ा बरसाती नाला एक छलांग में पार कर लिया. लेकिन नाला पार करते ही वह बुरी तरह घायल हो गया, समीप ही इमली के पेड़ के पास जाकर गिर पड़ा तथा यही महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने अपने प्राण त्याग दिए. इस स्वामिभक्त तुरंग के बलिदान से महाराणा प्रताप बहुत दुखी हुए, महाराणा प्रताप ने महादेवजी के मन्दिर के पास चेतक की समाधि बना दी. इसी जगह आज भी चेतक का स्मारक बना हुआ हैं.

जो आज हमे प्रेरणा दे रहा हैं. दो दिन बाद जब प्रताप गोगुन्दा खाली कर कोल्यारी चले गये तो मुगल सेना गोगुंदा पहुची तथा सुरक्षा के लिए मुगल सेना गोगुन्दा के चारों ओर बाड़ एवं खाई खुदवा कर रही. महाराणा प्रताप ने उनकी रसद सामग्री रोक दी फलस्वरूप मुगल सैनिको ने विद्रोह कर अजमेर प्रस्थान कर दिया.

वांछित सफलता प्राप्ति से पूर्व ही मुगल सेना सितम्बर 1576 में अजमेर लौट गईं. जून प्रारम्भ हुआ यह युद्ध सितम्बर में मुगल सेना के अजमेर लौटने पर समाप्त हुआ. इस युद्ध ने अकबर के आज तक के अपराजित रहने के मिथक को तोड़ दिया. अकबर इस अभियान से अत्यंत निराश हुआ. वही महाराणा प्रताप एवं उनके साथियो की ख्याति बढ़ी. अब महाराणा प्रताप भारतभर में प्रसिद्ध हो गये.

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हल्दीघाटी के इस युद्ध ने महाराणा प्रताप के शौर्य और प्रताप को चहु ओर फैला दिया. लगभग चार मास तक हल्दीघाटी का युद्ध चला, जिसमे अकबर जैसे भारत विजेता को मेवाड़ जैसे छोटे से राज्य के सामने वांछित सफलता नही मिल पाई. इससे नाराज होकर अकबर ने सेनापति मानसिंह और आसफ खान का दरबार में प्रवेश पर रोक लगा दी. अब वह स्वय 11 अक्टूबर 1576 को महाराणा प्रताप को परास्त करने अजमेर से निकल पड़ा.

वह खमनोर के बादशाह बाग़ में ठहरा, किन्तु महाराणा प्रताप के पहाड़ो में छिपे होने के कारण अकबर को सफलता नही मिली. दिसम्बर में भी वह असफल होकर लौट आया. अक्टूबर 1577 से नवम्बर 1579 के मध्य सेनापति शाहबाज को प्रताप को जिन्दा या मुर्दा लाने के लिए भेजा, वह तीन बार आक्रमण करने आया किन्तु राणा प्रताप की छापामार युद्ध पद्दति के आगे शाहबाज असफल होकर लौट गया.

अब अकबर ने अब्दुल रहीम खानखाना को प्रताप पर आक्रमण करने के लिए भेजा. यह छठा आक्रमण था, महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह ने खानखाना के शेरपुर डेरे पर आक्रमण कर सारी सामग्री सहित उनकी बेगम आलिखान सहित पुरे परिवार को उठाकर अपने कब्जे में कर दिया. तब अमरसिंह द्वारा बेगम और औरतों को बंदी बनाने का समाचार महाराणा प्रताप को मिला तो उन्होंने तत्काल अपने पुत्र को समझाया कि पराई स्त्री हमारे लिए माँ के समान हैं. तुमने गलती की हैं, अब तुम्ही इन्हें ससम्मान लौटा आओ.

अमरसिंह ने क्षमा मागकर बेगम तथा अन्य औरतो को उनके डेरे पंहुचा दिया. महाराणा प्रताप के इस मानवीय और वीरोचित व्यवहार का अब्दुल रहीम खानखाना पर गहरा प्रभाव पड़ा.बेगम ने जब खान-खाना को पूरा घटनाक्रम बताया तो महाराणा प्रताप के चरित्र की महानता से प्रभावित होकर खानखाना बिना युद्ध किये ही मेवाड़ से लौट गया.

हिस्ट्री ऑफ महाराणा प्रताप

1576 ई से 1584 तक लगभग आठ वर्ष मेवाड़-मुगल सघर्ष चलता रहा. इस दौरान प्रताप जंगलो में रह-रहकर छापामार पद्दति से शत्रुओ को नुकसान पहुचाते रहे. आबूपर्वत, सिरोही, इडर, पानरवा, कुम्भलगढ़, और आवरगढ़ उनके प्रमुख केंद्र थे. आवारगढ़ को संघर्षकालीन राजधानी बनाया गया. झाड़ोल के पास कमलनाथ महादेव के उपर की ओर यह दुर्ग महाराणा कुम्भा ने बनवाया था.

हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराणा प्रताप के अभिन्न मित्र भामाशाह (जन्म 28 जून 1547) व उनके भाई ताराचंद मालवा क्षेत्र को लूट कर अपने पूर्वजो का संचित धन लेकर सितम्बर 1578 में आवरगढ़ में महाराणा प्रताप के समक्ष उपस्थित हुए. यह धन 25 लाख रूपये व 20,000 स्वर्ण मुद्राए थी. माना जाता हैं कि इस धन से 25,000 की सेना का 12 वर्ष तक निर्वाह हो सकता था. महाराणा प्रताप अपार धन पाकर बहुत प्रसन्न हुए, अब तक छापामार युद्ध करते आए राणा प्रताप ने सेना का गठन कर दिवेर थाने पर आक्रमण कर दिया. यहाँ अकबर का चाचा सुल्तान खां थानेदार था.

भामाशाह व कुवर अमरसिंह के नेतृत्व में यह आक्रमण किया गया. महाराणा प्रताप स्वय भी साथ में थे. सुलतान खान के हाथी के पैर काट दिए तो वह घोड़े पर चढ़कर युद्ध करने लगा. अमरसिंह ने उससे मुकाबला किया. अमरसिंह के भाले के वार ने सुलतान खान को घोड़े सहित जमीन में गाड़ दिया. भाले की तीव्रता के कारण सुलतान खा तड़पड़ने लगा, भाला निकलवाने का यत्न किया गया. परन्तु कोई भी वीर भाला निकाल नही सका. तब अमरसिंह ने एक ही झटके में भाला उसके सीने से निकाल दिया.

सुलतान खान ने कुवर अमरसिंह को प्रशंसा की द्रष्टि से देखा, फिर सुल्तान खान के पानी मागने पर महाराणा प्रताप ने सैनिक सम्मान से स्वर्ण कलश में जल मंगवाकर सुलतान खान को पिलाया. जल पीकर उसने प्राण त्याग दिए.

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अब अकबर ने महाराणा प्रताप को पकड़ने के लिए सातवाँ आक्रमण जगन्नाथ कच्छवाहा के नेतृत्व में किया, लेकिन प्रताप की रणनीति के आगे वह भी असफल होकर लौट गया. महाराणा प्रताप ने लगातार मुगलों के थानों पर आक्रमण करके मुगल सेना को मेवाड़ से खदेड़ दिया. अपनी प्रतिज्ञा पूरी करते हुए मेवाड़ के सभी ठिकानों को स्वतंत्र करा लिया. चित्तोड़ और मांडलगढ़ पर महाराणा प्रताप के छोटे भाई समर का राज्य होने के कारण उसे छोड़ दिया. समय पाकर महाराणा प्रताप ने चावंड को अपनी राजधानी बनाया.

और 1585 से पुननिर्माण का नया अध्याय शुरू किया. कृषि, सिचाई, सड़क, सुरक्षा, सैन्य पुनर्गठन शुरू किया गया. 1585 से 1597 तक 12 वर्षो के कालखंड मेवाड़ में वैभवकाल के रूप में स्मरण किया जाना चाहिए. इस अनेक मन्दिरों, राजभवनों, किलों आदि का निर्माण करवाया गया. महाराणा प्रताप युद्धकाल और शांतिकाल दोनों में ही महानायक के रूप में सिद्ध हुए. अब अपने जीवन के संध्याकाल में मेवाड़ के भविष्य को लेकर चिंतित थे. सभी सामन्तो व कुवर युवराज अमरसिंह एकलिंग जी व दीप ज्योति को साक्षी मान, मेवाड़ की रक्षा का सकल्प करवाया.

इस प्रकार महाराणा प्रताप ने अपने जीवन के 57 बंसत पूर्ण कर माघ शुक्ल एकदशी तदनुसार 19 जनवरी 1597 को चावंड में अपनी इहलौकिक लीला पूर्ण की. महाराणा प्रताप के देहवसान (मृत्यु) की खबर सुनकर सवर्त्र शोक की लहर फ़ैल गईं. सम्पूर्ण मेवाड़ में सामान्य जन से लेकर प्रमुख लोग चावंड में एकत्रित हो गये. युवराज अमरसिंह ने विधि विधान के साथ चावंड से तीन किमी दूर बड़ोली के तालाब पर महाराणा प्रताप का दाह संस्कार किया.

महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद

उपस्थित जन मैदिनी की आँखों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी. समवेत स्वर में एकलिंग नाथ जी की जय के उद्घोष से आकाश गुजायमान हो उठा. महाराणा प्रताप की मुर्त्यु का समाचार अकबर तक पंहुचा . अकबर के चेहरे की उदासी एवं निश्वास को देखकर वही सभा में उपस्थित कवि दुरसा आढ़ा ने अकबर के भावों को अपनी कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया.

अस लेगो अणदाग, पाण लेगो अणनामी|

गो आडा गड्काय, जीको बहतो धुर वामी|

नवरोजे नहं गयो, न को अतसा नवल्ली|

न गो झरोखे हेठ, जेठ दुनियाण दहल्ली |

गहलोत राण जीतीं गयो, दसण मूंद रसना डसी|

निसास मूक भरिया नयन, तो म्रत साह प्रतापसी |

हे  प्रताप तूने अपने घोड़े पर अकबर की अधीनता का चिह्न नही लगवाया और अपने चेतक को बेदाग़ ले गया. अपनी मेवाड़ी पगड़ी अकबर के सामने कभी तुमने झुकने नही दी. वरन अनमि पाग लेकर चला गया. हमेशा मुगल सत्ता के विपरीत चलकर तूने अपनी वीरता के गीत गवाएं. जिस मुगलिया झरोखे के निचे आज सारी दुनिया हैं तू कभी न तो उस झरोखे के निचे आया, न अकबर के नवरोज कार्यक्रम में उपस्थित हुआ.

हे महान वीर तू जीत गया. तेरी मृत्यु पर बादशाह ने आँखे मूदकर, दातों के बिच जीभ दबाई, निश्वासे छोड़ी और आँखों में आसू भर आएं. गहलोत राणा प्रताप तेरी ही विजय हुई.

दुरसा की छप्पय सुनकर सभासदों ने सोचा, महाराज दुरसा से नाराज होंगे, लेकिन अपने मन की व्यथा को कविवाणी में साक्षात हुई देख बादशाह ने दुरसा को सम्मानित किया. ऐसे प्राणवीर महाराणा प्रताप धन्य थे आप. हे स्वतंत्र्य वीर ! तेरी यह गाथा हमे युगों-युगों तक प्रेरणा देती रहेगी.

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