महाराणा राजसिंह का इतिहास | Maharana Raj Singh History In Hindi

Maharana Raj Singh History In Hindi: महाराणा राजसिंह प्रथम का इतिहास History Maharana Raj Singh 1652 ई में इसकीगद्दीनशीनी के समय शाहजहाँ ने राणा का खिताब, पांच हजारी जात एवं पांच हजारी सवारों का मनसब देकर हाथी एवं घोड़े भेजे. राजसिंह ने शासक बनते ही चित्तौड़ की मरम्मत के कार्य को पूरा करने का निश्चय किया. लेकिन मुगल सम्राट ने इसे 1615 ई की मेवाड़ मुगल संधि की शर्तों के प्रतिकूल मानते हुए इसे ढहाने के लिए तीस हजार सेना के साथ सादुल्ला खां को भेजा.महाराणा राजसिंह का इतिहास | Maharana Raj Singh History In Hindi

महाराणा राजसिंह का इतिहास | Maharana Raj Singh History In Hindi

राजसिंह ने मुगलों से संघर्ष करना उचित न समझकर अपनी सेना को वहां से हटा लिया. मुगल सेना कंगूरे एवं बुर्ज गिराकर लौट गई. 1658 ई में जब मुगल शहजादों में उत्तराधिकारी का युद्ध छिड़ा, तब औरंगजेब एवं दारा ने महाराणा को अपनी अपनी ओर से युद्ध में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया.

मगर महाराणा किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करना चाहता था. क्योंकि यदि विपक्ष विजयी हो जाय तो वह मेवाड़ के लिए समस्या खड़ी कर सकता था. अतः महाराणा टालमटोल करता रहा. यहाँ तक कि अव्यवस्था का फायदा उठाकर टीका दौड़ के बहाने राज्य के तथा बाहरी मुगल थानों को भी लूटा.

महाराणा राजसिंह का जीवन परिचय Maharana Raj Singh History Main

महाराणा ने टोडा, मालपुरा, टोंक, चाकसू, लालसोट को लूटा एवं मेवाड़ के खोये हुए भागों पर पुनः अधिकार कर लिया. किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमति से विवाह कर इसने बादशाह औरंगजेब को भी अप्रसन्न किया. औरंगजेब द्वारा 1679 ई में जजिया कर लगाने का राजसिंह ने विरोध किया.

मुगल मारवाड़ संघर्ष छिड़ने पर महाराणा राजसिंह ने राठौड़ों का साथ दिया. सिसोदिया राठौड़ गुट बनने से सम्राट औरंगजेब बड़ा चिंतित हुआ और उसने राजपूतों को नष्ट करने में अपनी शक्ति लगा दी. युद्ध से मेवाड़ के कई इलाके वीरान हो गये. राजसिंह ने शाहजादे अकबर को अपनी ओर मिलाकर मुगल शक्ति को कमजोर करने का प्रयास किया.

परन्तु औरंगजेब ने छल से राजकुमार अकबर और राजपूतों में फूट डलवा दी. 1680 ई में राजसिंह की मृत्यु हो गई.

महाराणा राजसिंह की जीवनी (Biography of Maharana Raj Singh In Hindi)

राजसिंह के सेनापति और सलूम्बर उदयपुर के रावत रतनसिंह चूंडावत का विवाह बूंदी के संग्रामसिंह की पुत्री सलह कँवर के साथ हुआ था. विवाह के दो दिन बाद ही जब रतनसिंह को युद्ध लड़ने जाना पड़ा तब सलह कँवर ने निशानी के रूप में अपना सिर भिजवा दिया था. यही सलह कँवर इतिहास में हाड़ी रानी के नाम से विख्यात हैं.

राजसिंह अपनी प्रजा में सैनिक एवं नैतिक प्रवृति को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से विजय करकातु की उपाधि धारण की. राजसिंह की पत्नी रामरसदे ने उदयपुर में जयाबावड़ी / त्रिमुखी बावड़ी का निर्माण करवाया था. अकाल प्रबंधन के उद्देश्य से राजसिंह ने गोमती नदी के पानी को रोककर राजसमंद झील का निर्माण करवाया था.

महाराणा राजसिंह के कार्य व उपलब्धियां (Work and achievements of Maharana Raj Singh Hindi)

तथा इस झील के उत्तरी किनारे नौ चौकी नामक स्थान पर राज प्रशस्ति नामक शिलालेख लगवाया. संस्कृत भाषा में लिखित राजप्रशस्ति शिलालेख की रचना रणछोड़ भट्ट द्वारा की गई थी. यह प्रशस्ति 25 काले संगमरमर की शिलाओं पर खुदी हुई हैं. इसी आधार पर इसे संसार का सबसे बड़ा शिलालेख माना गया हैं.

राजप्रशस्ति में मेवाड़ का प्रमाणिक इतिहास और ऐतिहासिक मुगल मेवाड़ संधि 1615 का उल्लेख मिलता है. इस प्रशस्ति में मेवाड़ के शासकों की तकनीकी योग्यता की जानकारी मिलती है. राजसिंह के प्रतिनिधि दाऊजी महाराज / दामोदर जी महाराज में मथुरा से श्रीनाथ जी और द्वारिकानाथ की मूर्ति लायें थे.

राजसिंह ने श्रीनाथ जी को सिहाड़ वर्तमान नाथद्वारा में तथा द्वारकाधीश को कांकरोली राजसमंद में प्रतिष्ठित करवाया था व उसने अम्बिका माता मंदिर उदयपुर को भी प्रतिष्ठित करवाया था.

महाराणा राजसिंह का व्यक्तित्व (Information About Maharana Raj Singh History In Hindi)

24 सितंबर 1629 को जन्में राजा महाराणा राज सिंह मेवाड़ के गुहिल वंश के अन्य शासकों की तरह जन प्रिय शासक थे. इनका जन्म राजनगर में हुआ था. इनके पिता का नाम महाराणा जगत सिंह जी और मां महारानी मेडतणीजी था. मात्र 23 वर्ष की आयु में ही इनका राज्यभिशेक हो गया था. ये जनता के प्रिय, वीर, कला प्रेमी और कुशल प्रशासक थे.

राजसिंह दान के कई कार्य किये अपने जीवनकाल में इन्होने  सोने चांदी, अनमोल धातुएं, रत्नादि दान दिए तथा योग्य व्यक्तियों को अपने दरबार में स्थान देकर उन्हें सम्मानित भी किया. इन्होंने जन कल्याण के कई कार्य किये बाग बगीचे, फव्वारे, मंदिर, बावडियां, राजप्रासाद, द्धार और सरोवर आदि का निर्माण करवाया.

जितने ये प्रजापालक थे उतने ही देव भक्त भी थे. महाराणा राजसिंह का हिन्दू धर्म तथा इनके देवी देवताओं का बड़ा सम्मान था. इन्होने श्रीनाथ जी के मेवाड़ आगमन पर उनको कंधा दिया स्वागत में स्वयं हाजिर हुए और भव्य प्रतिस्थान का आयोजन करवाया. न सिर्फ वे मन्दिरों के निर्माण में अग्रणी रहे बल्कि इन्होंने आक्रान्ताओं से इसकी रक्षा भी की. इन्होने राजपूत राजकुमारी चारूमति के सतीत्व को बचाकर नारी रक्षा का महत्वपूर्ण कार्य भी किया.

राजसिंह के समय दिल्ली की मुगलिया सत्ता पर औरंगजेब का शासन था, इन्होने उसे पत्र लिखा तथा हिन्दुओं के प्रति हो रहे अत्याचार के लिए सम्राट को जिम्मेदार ठहराया. साथ ही उन्होंने हिन्दुओं पर से जजिया कर हटाने का आग्रह भी किया.

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