स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय | Maharshi Dayanand Saraswati Biography in Hindi

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय Maharshi Dayanand Saraswati Biography in Hindi: स्वामी दयानन्द सरस्वती 20 वीं शताब्दी के जगमगाते हुए सितारे थे, जिनके सभी आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य था भारत में सामाजिक व धार्मिक कार्यों में सुधार लाना. वास्तव में 20 वीं शताब्दी के शुरू होते ही उनके इस उद्देश्य का परिवर्तित रूप भारतीय समाज के सामने आने लगा.

Maharshi Dayanand Saraswati Biography in Hindi

Maharshi Dayanand Saraswati Biography in Hindi

दयानन्द का बचपन का नाम मूलशंकर था, दयानन्द सरस्वती का जन्म 1824 में गुजरात प्रान्त के टंकारा मोरबी नामक स्थान में हुआ था. उनके परिवार की पृष्टभूमि धार्मिक गुणों से भरी हुई थी. जीवन के प्रारम्भिक कुछ वर्षों के अनुभव से प्रेरित होकर 1846 में सन्यासी बनने के लिए उन्होंने घर छोड़ दिया और दयानन्द नाम ग्रहण कर लिया.

स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन परिचय- swami dayanand saraswati in hindi

dayanand saraswati in hindi:दयानन्द सरस्वती ने स्वामी विरजानंद के संरक्षण में शिक्षा दीक्षा ग्रहण की व मार्गदर्शन पाया. उन्होंने अपने विचारों और सिद्धांतों को व्यक्त करने के लिए तथा समाज को पुनर्स्थापित करने हेतु बहुत सी  पुस्तकें लिखीं जो निम्नवत हैं- सत्यार्थ प्रकाश, भारतीनिर्वाण, संस्कार विधि, वेदाभ्यास, संध्या, भागवत खंड नाम, रत्नमाला तथा वेदांत प्रकाश आदि.

दयानन्द सरस्वती ने हिन्दू धर्म में व्याप्त अन्धविश्वास व बुराइयों को दूर करने के लिए उन्होंने सतत प्रयास किया जैसे मूर्तिपूजा, अवतारवाद, बहुदेव पूजा, पशुता व्यवहार व विचार, अंधविश्वासी धार्मिक कृत्य आदि. उन्होंने एकेश्वरवाद का प्रचार किया और अपना विचार व्यक्त किया ईश्वर सर्वज्ञ, सर्वत्र व्याप्त, अनंत, निर्विकार, रूप रहित, आकाररहित , दयालु व न्यायी हैं.

वे विश्वास करते थे कि ईश्वर को समझा व जाना जा सकता हैं. वह ईश्वर सर्वोच्च गुणों से युक्त हैं. तथा भ्रान्तिरहित ईश्वर की पूजा से ही लोगों में नैतिकता आ सकती हैं. दयानन्द की प्रेरणा वेद थे. यह विश्वास करते हुए कि ईश्वर अनंत हैं. उन्होंने पुनः वेदों की तरफ लोगों को लौटने की प्रेरणा देना शुरू किया. दयानन्द सरस्वती का उद्देश्य भारत के अतीत को गौरवान्वित करना तथा लोगों की चेतना को अंतर्मन से जगाना था.

धर्म व जाति पर आधारित बहुत सी बुराइयों व अन्धविश्वास पर चोट करते हुए तथा उनके शुद्धिकरण के लिए उन्होंने कहा कि जो अपने कार्य व व्यवहार से ब्राह्मण तुल्य व्यवहार करता हैं वही श्रेष्ट हैं न कि जन्म व जाति के आधार पर. उन्होंने जन समूह को सच्चाई से अवगत कराया और बताया कि छुआछूत की भावना या व्यवहार एक अपराध हैं जो कि वेदों के सिद्धांत के विपरीत हैं.

बाल विवाह का विरोध करते हुए नर व नारी दोनों की शादी क्रमशः 25 व 16 की निश्चित की. उन्होंने विधवा विवाह के लिए भी लोगों में उत्साह भरा. चरित्र विकास के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण वरदान हैं, यह कहते हुए उन्होंने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूकता पैदा करने का कार्य किया.

दयानन्द सरस्वती ने 1875 में बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की ताकि उसके सामाजिक व धार्मिक सिद्धांतों को साक्षात रूप में वर्णित किया जा सके. दयानन्द के ये सिद्धांत व विचार बहुत प्रसिद्ध व विख्यात हुए. यदपि दयानन्द ने 28 पथ प्रदर्शित सिद्धांत समाज के लिए निर्धारित किये, वे सभी 1877 में आर्य समाज के 10 सूत्र के रूप में जाने गये.

इन सिद्धांतों में यह निहित हैं कि ईश्वर एक है तथा वह सर्वत्र व्याप्त, जानने योग्य, सत्य, ज्ञानयुक्त, अनन्त, नित्य, न्यायी, भ्रान्तिरहित तथा सार्वभौमिक हैं.

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