पुरुषार्थ का अर्थ व परिभाषा – Meaning Of Purusharth In Hindi

पुरुषार्थ का अर्थ व परिभाषा – Meaning Of Purusharth In Hindi: आज के आर्टिकल में हिन्दुओं के चार पुरुषार्थ के अर्थ क्या हैं तथा इनका आशय इस आर्टिकल में जानेगे. purushartha meaning में हम पुरुषार्थ चतुष्टय pdf, पुरुषार्थ ही जीवन है, चार पुरुषार्थ के नाम के बारे में जानकारी यहाँ पढ़ेगे.

Meaning Of Purusharth In Hindi

Meaning Of Purusharth In Hindi

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पुरुषार्थ का अर्थ- प्राचीन भारतीय विचारकों ने मनुष्य के जीवन को आध्यात्मिक, भौतिक और नैतिक दृष्टि से उन्नत करने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता पर बल दिया था. इन विचारकों के अनुसार जीवन में सुख के दो आधार हैं- एक भौतिक और दूसरा आध्यात्मिक

भौतिक सुख के अंतर्गत सांसारिक आकर्षण और एश्वर्य तथा आध्यात्मिक सुख के अंतर्गत त्याग और तपस्या माने जाते हैं. भौतिक सुख क्षणिक और अस्थिर है, जो असत्य है तथा आध्यात्मिक सुख स्थायी और परमानन्द है, जो सत्य हैं.

हिन्दू शास्त्रकारों की मान्यता है कि मनुष्य के जीवन में भोग और कामना का ही नहीं, बल्कि संयम, नियम, आदर्श तथा आध्यात्मिक विचारों का महत्व भी माना गया हैं. समस्त भौतिक सुख क्षणिक और अस्थायी हैं. सांसारिक मोह माया, भोग विलास आदि मनुष्य को सन्मार्ग पर नहीं ले जाते, बल्कि भ्रमित करते हैं. ऐसी स्थिति में मनुष्य के संयमित आचार तथा आध्यात्मिक विचार ही उसे सन्मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं.

What Is Meaning Of Purusharth Word In Hindi

अतः मनुष्य के जीवन का लक्ष्य भौतिक सुख न होकर आध्यात्मिक सुख होना चाहिए और उसकी कार्य पद्धतियाँ विलासपरक न होकर धर्मपरक होनी चाहिए. मनुष्य को यह समझ लेना चाहिए कि संसारिकता के साथ साथ आध्यात्मिकता भी हैं, भोग के साथ साथ योग भी हैं. तथा कामना के साथ साधना भी हैं.

इस प्रकार हिन्दू दर्शन जीवन के प्रति विविध दृष्टिकोण में समन्वय स्थापित करता हैं. इसके अनुसार न तो मनुष्य को सर्वस्व त्याग कर देना चाहिए. और न सांसारिक सुख भोगों में लिप्त होना चाहिए. इस प्रकार हिन्दू दर्शन के अनुसार मानव जीवन के वास्तविक स्वरूप तथा परम लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भौतिक तथा आध्यात्मिक तत्वों में समन्वय करना आवश्यक हैं.

डॉ जयशंकर मिश्र लिखते हैं कि वस्तुतः जीवन में भौतिक सुख तथा आध्यात्मिक सुख दोनों का महत्व है तथा दोनों का समन्वित रूप जीवन को उन्नत करता हैं. जीवन की सार्थकता भी इसी में हैं कि दोनों का समन्वित और संतुलित रूप ग्रहण किया जाए. अतः भारतीय जीवन दर्शन इन दोनों प्रवृत्तियों का संतुलित तथा समन्वित स्वरूप है, जिसे पुरुषार्थ कहते हैं. भौतिक तथा लौकिक सुख के अंतर्गत अर्थ और काम हैं. तथा आध्यात्मिक अथवा पारलौकिक सुख के अंतर्गत धर्म और मोक्ष हैं.

पुरुषार्थ की अवधारणा

मनुष्य का सर्वांगीण विकास पुरुषार्थ के माध्यम से होता है. पुरुषार्थ मनुष्य का वह आधार है जिसके अनुपालन से वह अपना जीवन जीता हैं. तथा विभिन्न कर्तव्यों का पालन करता हैं. वह भौतिक पदार्थों का भोग करने के बाद जगत की परिधि से बाहर आकर भक्ति का मार्ग अपनाता हैं और मुक्ति की ओर उन्मुख होता हैं.

अतः पुरुषार्थ से मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास तो होता हैं, साथ ही समाज का भी उत्कर्ष होता हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरुषार्थों के बल पर व्यक्ति अपने समस्त कार्य करता हैं. तथा जीवन, जगत तथा परमात्मा के प्रति अपनी कर्मनिष्ठता व्यक्त करता हैं. पुरुषार्थों से ही मनुष्य, बौद्धिक, नैतिक, शारीरिक, भौतिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष करता हैं.

इस प्रकार मनुष्य लौकिक जीवन के प्रति जागरूक होते हुए पारलौकिक जीवन के प्रति भी उत्कंठित रहता हैं. भौतिक और आध्यात्मिक सम्रद्धि के मध्य का संतुलित दृष्टिकोण ही पुरुषार्थ का सही रूप हैं.

चारों पुरुषार्थ के चार उद्देश्य हैं.

धर्म- मनुष्य को सन्मार्ग दिखाता हैं. धर्म के माध्यम से मनुष्य नैतिक सिद्धांतों, उत्तम प्रवृत्तियों तथा न्यायपूर्ण क्रियाओं को सही रूप में समझता है और उनका अनुकरण कर सकने में समर्थ होता हैं.

अर्थ भी मनुष्य का प्रमुख उद्देश्य हैं. जीवन में भौतिक सुखों की पूर्ति अर्थ के उपार्जन और संग्रह से ही सम्भव हैं. सांसारिक और भौतिक सुख अर्थ पर ही निर्भर करता हैं. इस प्रकार भारतीय विचारकों ने मनुष्य के जीवन में धनार्जन करने की प्रवृत्ति को पुरुषार्थ के अंतर्गत रखकर मानव मन की सहज आकांक्षाओं का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया हैं.

काम मानव जीवन की सुखद और सहज अनुभूति से सम्बद्ध है. विवाह और सन्तान की उत्पत्ति इसी के आधार पर सम्भव हैं. यौन भावना के साथ सौंदर्यानुभूति की तुष्टि काम के माध्यम से ही होती हैं. परन्तु मनुष्य में कामोपभोग की भावना को एक निश्चित सीमा तक ही स्वीकार किया गया हैं. काम की अतिरेक निंदनीय हैं.

मोक्ष भारतीयों के जीवन का अंतिम लक्ष्य है, परन्तु मोक्ष की प्राप्ति सरल और आसान नहीं हैं. इसके लिए मन और मस्तिष्क की शुद्धि और पवित्रता अनिवार्य मानी गई हैं. जब मनुष्य पूर्णरूपेण प्रवृत्ति तथा निवृत्ति में समन्वय स्थापित कर लेता हैं, तब यह समस्त बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर अग्रसर होता हैं.

इस दृष्टि से पुरुषार्थ मानव जीवन के सर्वांगीण विकास में सहायक होता हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष से समन्वित पुरुषार्थ व्यक्ति के जीवन की गरिमापूर्ण बनाता हैं.

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