मीराबाई का जीवन परिचय | Meera Bai In Hindi

मीराबाई का जीवन परिचय | Meera Bai In Hindi

Meera Bai Biography Jivani Dohe In Hindi-जब हम राजस्थान से हिंदी साहित्यकारों के नामों पर नजर डालते हैं. तो एक नाम सबसे ऊपर आता हैं, वो हैं मेड़ता की मीरा बाई का. भगवान कृष्ण की दासी स्वय को मानने वाली मीरा भक्ति काल की कवयित्री हैं. प्रेम की महत्ता और उसी के बल-बूते पर विराग्य और आराधक श्री कृष्ण की साधक मीरा के भजन आज भी घर-घर गाए जाते हैं. अपने शुरूआती जीवन में परिवार वालों का विरोध सहने के बाद इन्होने अपना सम्पूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति में गुजार दिया. संतो के साथ भ्रमण और मन्दिर और मठों में रहने वाली मीराबाई का हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान हैं.Meera Bai story history books husband के बारे में विस्तारित जानकारी इस जीवनी में नीचे दी जा रही हैं.

मीराबाई का जीवन परिचय

हिंदी के कृष्ण भक्त कवियों में मीराबाई का महत्वपूर्ण स्थान हैं. उनके जन्मकाल और जीवन परिचय के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं. परन्तु मुख्यत यह माना जाता हैं. कि मीरा मेड़ता के राव रतनसिंह की पुत्री थी. इनका जन्म 1498 ई में कुड़की के पास हुआ था. राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ इनका विवाह 1516 इसवी में हुआ था.

कुछ ही वर्षो में भोजराज मुगलों के साथ युद्ध करते हुए, वीरगति को प्राप्त हो गये और मीरा विधवा हो गईं. बचपन से ही मीरा कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम रखती थी. वे उन्हें अपना प्रिय और पति मानती थी. लौकिक प्रेम में उनकी रूचि और निष्ठा नही थी. भगवान् कृष्ण के प्रेम में दीवानी बनी मीरा ने लोक लाज छोड़कर भक्ति का मार्ग अपनाया. साधू संतो के साथ भक्ति भावना में लीन रहने और उनके साथ उठने बैठने के कारण चितोड़ के राजपरिवार ने उसका विरोध किया. आखिर मीरा राजपरिवार छोड़कर द्वारका चली गईं. वहीं कृष्ण की मूर्ति में विलीन हो गईं.

मीराबाई का काव्य परिचय (Poetic poetry of Mirabai)

मीरा ने विशेषत पदों की रचना की थी. उनके पदों की अनेक टीकाएँ और संकलन बने हैं. उनके चार काव्य ग्रन्थ हैं- 1. नरसी जी का मायरा, 2. गीत गोविंद की टीका, 3. राग गोविंद, 4. राग सोरठ. मीरा के पद राजस्थानी मिश्रित ब्रजभाषा में हैं. कोई चमत्कार दिखाने के लिए उन्होंने कोई काव्य नही रचा. भगवान के प्रति अनन्य अनुराग उनके पदों में सहज रूप से व्यक्त हुआ था.

कवियित्री  मीरा का काव्य माधुर्य भाव जीवंत रूप हैं, वे कृष्ण को ही अपना पति मानकर उपासना करती थी. उनके लिए इस संसार में कृष्ण के अलावा किसी पुरुष का अस्तित्व नही था. कृष्ण के विरह में वे व्याकुल रहती थी. यही व्याकुलता उनके काव्य में दिखाई देती हैं. श्रगार के विप्रलभ पक्ष का चित्रण बहुत मार्मिक हैं. उनकी स्वानुभूति ने अभिव्यक्ति को अत्यधिक अनुपम बना दिया हैं. मीरा में पदों में प्रसाद और माधुर्य गुणों की प्रचुरता हैं. पदों में श्रुतिमधुर वर्णयोजना सीधी-सादी उक्तियाँ और सच्चा आत्मनिवेदन उनके काव्य की ऐसी विशेषता हैं जो मीरा को प्रथम कोटि के भक्त कवियों में निसंदेह स्थान प्रदान करती हैं.

मीराबाई के पद (Meerabai ke Pad)

मीरा बाई के अधिकतर पदों में कृष्ण भक्ति व्यक्त होती हैं. वे अपने आपकों कृष्ण की दासी, प्रियतमा, भक्त एवं उपासिका के रूप में मानती हैं. संसार को नश्वर मानकर कृष्ण को परमात्मा के रूप में भजने से ही जीव का कल्याण हो सकता हैं. जब तक प्रिय से भेट नही होती, जीव व्यतीत रहता हैं. चैन नही पड़ती. सद्गुरु की कृपा से भवसागर पार किया जा सकता हैं. वे कृष्ण की निर्गुण,सगुण, प्रिय जोगी आदि अनेक सम्बोधनों से बुलाती हैं. यही कृष्ण के प्रति अनन्यता प्रकट होती हैं.

देखिये ये मीरा का पद जो उनके इश्वर प्रेम और भक्ति की सच्ची भावना को उजागर करता हैं.

mere to giradhar gopaal doosaro na koee.
jaake sir mor mukut mero pati soee.
taat maat bhraat bandhu aapano na koee.
chhaandi dee kul kee kaani kaha karihai koee.
santan dhing baithi-baithi lok laaj khoee.
chunaree ke kiye took odh leenhee loee.
motee moonge utaar banamaala poee.
ansuvan jal seenchi seenchi prem beli boee.
ab to bel phail gaee aanand phal hoee.
doodh kee mathaniyaan bade prem se biloee.
maakhan jab kaadhi liyo chhaachha piye koee.
bhagat dekh raajee huee jagat dekhi roee.
daasee “meera” laal giridhar taaro ab mohee.

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