मृत्यु भोज पर कविता | मृत्यु भोज अभिशाप | Mrityubhoj PAR KAVITA

मृत्यु भोज पर कविता | मृत्यु भोज अभिशाप | Mrityubhoj PAR KAVITA

जिस आँगन में पुत्र शोक से
बिलख रही माता,
वहाँ पहुच कर स्वाद जीव का
तुमको कैसे भाता।
पति के चिर वियोग में व्याकुल
युवती विधवा रोती,
बड़े चाव से पंगत खाते तुम्हें
पीर नहीं होती।
मरने वालों के प्रति अपना
सद व्यहार निभाओ,
धर्म यही कहता है बंधुओMrityubhoj PAR KAVITA
मृतक भोज मत खाओ।
चला गया संसार छोड़ कर
जिसका पालन हारा,
पड़ा चेतना हीन जहाँ पर
वज्रपात दे मारा ।
खुद भूखे रह कर भी परिजन
तेरहबी खिलाते,
अंधी परम्परा के पीछे जीते जी
मर जाते।
इस कुरीति के उन्मूलन का
साहस कर दिखलाओ,
धर्म यही कहता है बंधुओ,
मृतक भोज मत खाओ।

पितृपक्ष में मरे हुए बाप के नाम पर पानी गिराने वालों ने अगर अपने जिवित पिता को अपने हाथों सही से पानी पिला दिया होता तो पिता के लिए धरती पर हीं स्वर्ग होता। मेट्रो में रहकर नौकरी करने वाले बेटे के बाप ने गाँव में पानी पानी करके प्राण त्याग दिया और अब बेटा हर साल पितृपक्ष में पानी देता है।

विदेश में काम करने वाले बेटे की मां कम्बल के बिना ठंडी में ठिठुर कर मर गयी ।जब बेटा विदेश से आया तो क्ष्राद्ध के नाम पर रजाई ,तोसक, तकिया पलंग सब दान किया। मां-बाप के प्रति प्यार सिर्फ भाषणों में, शायरी में ,कविता में, कैमरे में या मृत्यु भोज में ही क्यों दिखता है।

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