मुहर्रम पर निबंध | Muharram Essay in Hindi

मुहर्रम पर निबंध Muharram Essay in Hindi: जिस तरह हिन्दुओं में दशहरा, रामनवमी, नवरात्र, दिवाली आदि पर्व का माह पवित्र माने जाते हैं. इस्लाम में भी चार पवित्र महीनों में मुहर्रम एक हैं. जो हिजरी वर्ष का प्रथम महीना होता हैं जिसकी दसवीं तारीख को हुसैन अली की कुर्बानी की स्मृति में ताजिया निकाला जाता हैं. स्टूडेंट्स के लिए मुहर्रम निबंध में सरल भाषा में त्यौहार की जानकारी दी गई हैं.

मुहर्रम पर निबंध Muharram Essay in Hindi

मुहर्रम पर निबंध Muharram Essay in Hindi

Muharram in Hindi Short Essay History Story Information 10 Lines About Muharram Festival.

प्रत्येक धर्म मजहब के अपनी मान्यताओं को लेकर पर्व और त्यौहार मनाए जाते हैं. मुहर्रम ताजिया और अशुरा इस्लाम से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व हैं. मुहर्रम हिजरी संवत् का पहला महिना भी हैं यह सबसे पवित्रों महीनों में से एक हैं. इसी माह में मुहम्मद साहब के वारिस इमाम हुसैन ने कर्बला की लड़ाई में अपनी सहादत दी थी. उनकी शहादत में ताजिया निकाला जाता हैं तथा इन शौक के दस दिनों को आशुरा कहा जाता हैं. आज के निबंध, भाषण, अनुच्छेद में हम जानेगे कि मुहर्रम क्या हैं कब व क्यों मनाया जाता हैं इसका इतिहास क्या हैं.

मुहर्रम क्या है? What is Muharram Festival

जिस तरह हिन्दुओं का विक्रम संवत् हैं उसी तरह इस्लाम के कैलेंडर को हिजरी संवत कहा जाता हैं. इसका पहला माह मुहर्रम होता हैं. इस्लाम को मानने वाले इसे वर्ष का सबसे पवित्र माह मानते हैं. मुहर्रम के दसवें दिन ताजिये के जुलुस निकाले जाते हैं, यह शोक पर्व हैं. मुहर्रम का खासकर शिया समुदाय के मुसलमानों में बड़ा महत्व हैं. इस दिन उनके पैगम्बर हुसैन अली की हत्या करी गई थी. इसलिए वे इस दिन को शोक पर्व के रूप में मनाते हैं.

वही इस्लाम को मानने वाले सुन्नी सम्प्रदाय के लोग भी इस दिन को मिस्र के फिरौन में मूसा पर हुई ऐतिहासिक विजय के उपलक्ष्य में इस दिन को मनाते हैं. मुहर्रम के इन दस दिनों में रोजे रखकर हुसैन अली का स्मरण किया जाता हैं. ये मुहम्मद साहब के वारिश थे जिनका कत्ल मुसलमानों द्वारा ही इस पवित्र दिन पर कुरान की आयते पढ़ पढ़कर किया गया था.

मुहर्रम त्यौहार कब है? When is Muharram Festival in 2020?

हर साल अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार अगस्त और सितम्बर माह में मुहर्रम का दिन पड़ता हैं. वर्ष 2020 में 21 अगस्त के दिन से ही मुहर्रम का महिना शुरू हो रहा हैं. दसवीं तारीख को ताजिया हैं तथा इन दस दिनों को आशूरा कहा जाता हैं. यह इस्लामिक कलैंडर का प्रथम महिना हैं. विभिन्न स्थानों के अनुसार इसकी तिथि तथा समय अलग अलग हो सकता हैं. इस्लाम के सबसे चार पवित्र महीनों में मुहर्रम भी एक हैं. इसकी पहली तारीख से नयें इस्लामिक वर्ष (हिजरी सन) की शुरुआत मानी जाती हैं, इस दिन कई स्थानों पर सार्वजनिक अवकाश भी होता हैं.

मुहर्रम त्यौहार का इतिहास History of Muharram Festival

इस्लाम में चार सबसे पवित्र महीनों का जिक्र आता हैं जिनमें ज़ुलकदाह, जुलीजिज और रजब और मुहर्रम प्रमुख हैं. मुहर्रम शब्द का अंग्रेजी अर्थ होता हैं निषिद्ध. पैगम्बर मुहम्मद के पौत्र इमाम हुसैन के बलिदान की याद में इस महीने में कई उत्सव मनाए जाते हैं. जो शोक से जुड़े होते हैं. मुहर्रम मनाने के पीछे कर्बला की एतिहासिक कहानी जुड़ी हुई हैं, जो इस प्रकार से हैं.

60 हिजरी संवत् (आज से 1350 वर्ष पूर्व) की बात हैं, उस समय आज के सीरिया के क्षेत्र को कर्बला के नाम से जाना जाता था, इस्लाम में आपसी वर्चस्व को लेकर यहाँ का यजीद शंहशाह बनना चाहता हैं. अपने लक्ष्य को पाने के लिए उसने जनता को भय में रखना शुरू किया. वह लोगों में भय फैलाने के लिए अपनी मर्जी के मुताबिक़ लोगों को पकडकर उन्हें यातनाएं देता तथा उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर मार डालता. समूचे अरब पर विजय पाने के ख़्वाब को लेकर उनके अत्याचारों का इमाम हुसैन और इनके भाईयों समेत पूरे परिवार ने विरोध करना शुरू कर दिया. चूँकि ये मुहम्मद साहब के वंशज थे इस कारण उनके विचार का बड़ा असर हुआ करता था.

इमाम हुसैन ने यजीद से युद्ध करने का निश्चय कर लिया तथा बच्चों व महिलाओं को संघर्ष से बचाने के लिए मक्का से ईराक की तरफ ले जा रहे थे. 72 सदस्यों का यह काफिला जब घने मरुस्थल से होकर गुजर रहा था, जहाँ चारो और बंजर भूमि ही थी, पीने के जल के लिए एकमात्र नदी ही थी. उस क्षेत्र में यजीद ने 8 हजार सैनिकों की विशाल फौज के साथ हुसैन के कबीले पर हमला कर दिया.

हमले के जवाब में हुसैन तथा उनके भाइयों ने डटकर मुकाबला किया. मुहर्रम की 2 से 6 तारीख तक चार दिन तक चले इस युद्ध में हुसैन और उनके साथियो ने जो पराक्रम दिखाया, वो सभी को अचम्भित करने वाला था. मात्र 72 लोगों ने 8 हजार की विशाल सेना को दांतों तले चने चबवा दिए. युद्ध के आखिरी दिन से पहले हुसैन के सभी साथी लड़ते लड़ते कुर्बानी दे चुके थे, अकेले बचे हुसैन को खत्म करने का यजीद के पास कोई उपाय नहीं था. जब हुसैन अली मुहर्रम के दसवें दिन नमाज अदा कर रहे थे, तभी यजीद ने पीछे से वार कर इमाम को कुर्बान कर दिया. अपने पराक्रम और बुलंद हौसलों से लड़े इमाम हुसैन भले ही कर्बला की लड़ाई जीत न पाए हो मगर उनके साहस ने हार को भी जीत से बड़ा बना दिया.

इस तरह 680 ई में इमाम हुसैन अली की निर्मम हत्या कर दी गई. आज भी इस्लाम को मानने वाले हसन तथा इमाम हुसैन को याद करते हुए मुहर्रम का जश्न मनाते हैं. इसी माह की पहली तारीख से इस्लामी साल की शुरू होती हैं. मुहर्रम को हरम शब्द से लिया गया हैं, जिसका आशय होता हैं निषिद्ध या मना किया हुआ. इस्लाम को मानने वालों को इस पवित्र माह में किसी से लड़ाई झगड़ा करना पूरी तरह से मना किया गया हैं. क्योंकि इसी माह की दसवीं तिथि को अली का देहांत हुआ था.

ताजिये निकालना

मुहर्रम महीने के दसवें दिन इस्लाम को मानने वाले सभी ताजिये निकालते हैं. यह एक प्रकार का जुलूस होता हैं जो हुसैन अली और उनके 71 साथियों की कुर्बानी की याद में मनाया जाता हैं. जुलुस की शक्ल में अनेक रंग बिरंगे बांस और कागजों की मदद से ताजिया निकाला जाता हैं.

सैकड़ों लोग एक ही स्वर में बेहद दर्दनाक शोक गीत गाते हैं, जिन्हें इस्लाम में मर्सिया कहते हैं. कुछ लोग रुदन करते हुए अपनी छाती पीटते हैं हाय हुसैन हम न हुए । हाय हुसैन हम न के रुदन स्वर के साथ ताजिया पुरे शहर में निकाला जाता हैं. लोग इस कद्र भावो में बह जाते हैं कि उनकी छाती पर वार कर करके नीली पड़ जाती हैं.

मुहर्रम के दिन

आज भी मुहर्रम त्यौहार के अंतिम दिन ताजिये को कर्बला (सीरिया) ले जाया जाता हैं, जहां उसे दफना दिया जाता हैं. ये वही युद्ध स्थली थी. जहाँ हुसैन अली ने वीरता से युद्ध किया था, तथा मस्जिद में नमाज अदा करते समय पीछे से वार कर उनकी हत्या कर दी थी. ताजिये को कब्र में दफनाते समय हजारों की तादाद में लोग इमाम को याद करते हुए विलाप करते हैं तथा घर लौट आते हैं और घर आकर नमाज पढ़ी जाती हैं.

मुहर्रम त्योहार के महत्व Importance of Muharram Festival in Hindi

प्रत्येक धर्म में पर्व और त्यौहार लोगों के दिलों को आपस में जोड़ने का काम करते हैं. मुहर्रम का पाक महीना भी इस्लाम को मानने वालो को प्रेम, भाईचारे के साथ रहने, नेकी का पालन करने तथा आपसी बैर व लड़ाई झगड़े से मुक्त रहने की बात कहता हैं. शिया तथा सुन्नी दोनों समुदाय के लोग इस दिन को मिलकर मनाते हैं. शियाओं की मान्यता हैं कि हुसैन अली इस्लाम के सबसे चमत्कारी लोगों में से एक थे, इनका सम्बन्ध भी मुहम्मद साहब के खानदान से था. इस कारण शियाओ द्वारा अली को पैगम्बर माना जाता हैं.

याजिद द्वारा इस्लामिक कानून को मानने से इनकार कर दिए जाने के बाद उन्होंने याजिद के खिलाफ विद्रोह शुरू किया जो कर्बला की लड़ाई में परिणित हुआ था. इसमें हुसैन मारे गये तथा परिवार के अन्य लोगों को दमिश्क में कैद कर लिया गया. वही सुन्नी मत को मानने वाले मुसलमानों के लिए भी मुहर्रम का महीना पाक माह हैं. इनकी मान्यता के अनुसार इस दिन मूसा ने फिरौन पर जीत हासिल की थी. मूसा इस्लाम का एक धार्मिक नेता हुआ करता था, जो समूचे अरब में इस्लाम के प्रचारक के रूप में जाना जाता था. उसने मुहर्रम माह के दसवें दिन ही मिस्र के फिरौन को हराकर इस्लामी शासन स्थापित किया था.

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