Mukhyamantri Jal Swavlamban Abhiyan (MJSA)| मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना राजस्थान

Mukhyamantri Jal Swavlamban Abhiyan: राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य हैं जिसका क्षेत्रफल 343 लाख हैक्टर हैं. इसमे से 168 लाख हैक्टर भूमि ही कृषि योग्य हैं. राज्य की 101 लाख हैक्टर भूमि बंजर हैं. राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 10.4 प्रतिशत जबकि उपलब्ध जल मात्र 1.16 प्रतिशत ही हैं. दक्षिण पश्चिमी से उत्तर पूर्व की ओर फैली हुई अरावली पर्वत श्रंखला राज्य को दौ भौगोलिक क्षेत्रो में विभाजित करती हैं. जिसके पश्चिम में थार का मरुस्थल हैं. जो लगभग राज्य के क्षेत्रफल का 60 प्रतिशत हैं.

राज्य की वार्षिक वर्षा शुष्क गर्म पश्चिम में 100 मी.मी से दक्षिणी पूर्व में 900 मी.मी तक होती हैं. प्रत्येक 5 वर्ष में सामान्यता 3 वर्ष अकाल से प्रभावित होते हैं. अर्थात अनिश्चित एवं असामयिक वर्षा की ओर उसके असंतुलित वितरण के कारण फसल उत्पादन असुरक्षित हो जाते हैं. कभी-कभी कम समय में अधिक वर्षा होने से प्राप्त वर्षा जल का अधिकतम भाग व्यर्थ चला जाता हैं.

मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना राजस्थान

Mukhyamantri Jal Swavlamban Abhiyan (MJSA)

राज्य में जल भराव ढांचे के अभाव के कारण जल का समुचित उपयोग नही होता हैं. जिससे कुओ का जल स्तर गिरता जा रहा हैं. राजस्थान में प्राय वर्षा अंतराल काफी बड़ा होता हैं. जिससे फसल उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं. फलस्वरूप राज्य के कृषक की कृषि उत्पादन में कमी तथा कृषि योग्य भूमि बंजर में तब्दील हो हो जाने से चारा, लकड़ी, दूध इत्यादि की कमी के कारण सामाजिक और आर्थिक स्थति कमजोर होती जा रही हैं इस परिस्थिति के लिए जल की कमी मुख्य कारण हैं.

वर्षा आधारित क्षेत्रो में फसल उत्पादन के अनिश्चिनता,अधिकांश पंचायत समितियों में प्रति वर्ष जल स्तर का गिरना, अधिकाँश क्षेत्र प्रति वर्ष अकाल की चपेट में आने में आने से उन क्षेत्रों के लिए टेंकर से पानी उपलब्ध करवाने एवं पशूओ के सारे पर बहुत सारी राशि खर्च होती हैं. उपरोक्त स्थितियों से निपटने के लाए राज्य में मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना राजस्थान प्रारम्भ की गयी.

मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान क्या है (mukhyamantri jal swavalamban yojana)

राज्य की लागभग 70 प्रितिशत भूमि बारानी है एवं वर्षा पर निर्भर है|राज्य में कम वर्षा होने के उपरान्त भी अधिकाँश क्षेत्रो से जल व्यर्थ बहकर निकल जाता है और साथ ही खेतो में कटाव कर उपजाऊ मिट्टी भी बहा ले जाता है| ऐसी परस्थिति में यह आवश्यक है कि जगह -जगह वर्षा जल का संचय कर प्राकृतिक संसाधनों का पूरा उपयोग किया जाए |

वर्तमान में राजस्थान राज्य की भौगोलिक एवं जल संसाधनों सरंचनाओ का परिदृश्य निम्न प्रकार है;|

  1. राज्य का क्षेत्रफल                                                  : 342.52 लाख हैक्टेयर
  2. सिंचाई योग्य क्षेत्रफल                                            : 257.00  लाख हैक्टेयर
  3. औसत वर्षा                                                           : 531.00  मि.मी .
  4. कुल उपलब्ध सतही जल                                         : 25.37 बी. सी. एम.
  5. अंतरराज्यीय जल समझौते के तहत प्राप्त राज्य का हिस्सा                           :19.232 बी. सी. एम
  6. राज्य की वृहद /मध्यम/लघु सिंचाई परियोजनाओं में कुल संग्रहित जल          : 11.885  बी.सी.एम
  7. कुल सिंचित क्षेत्र                                                    : 42.25 लाख हैक्टेयर
  8. उपलब्ध भू -जल                                              : 10.613  बी. सी. एम
  9. कुल जल माग                                                         : 11. 99 बी.सी.एम

[ MCM -MILLION CUBIC METRE, BCM -BILLION CUBIC METRE ]  राज्य में कुल 3439 वृहद ,  मध्यम व लघु सिंचाई परियोजनाओं का निर्माण कर 11885 .4 एम.सी. एम. जल को संग्रहित किया गया है जिसमे से 24 वृहद बाध जिनकी भराव क्षमता 6296.48 एम. सी. एम. ए 84 मध्यम बाध जिनकी भराव क्षमता 2133.54  एम. सी. एम. व 3331 लघु ब़ाध जिनकी भराव क्षमता 3455 .38 एम. सी. एम. है| उपरोक्त आकड़ो से स्पष्ट है की राज्य में अभी भी वर्षा जल संग्रहण क्षमता उपलब्ध वर्षा जल से कम है, इसलिए अधिशेष जल वाले नदी बेसिन में जल संग्रहण हेतु फोर वाटर कोन्सेप्ट  के तहत कार्य किया जा रहा है |

वर्षा जल संचयन एवं कृत्रिम भू -जल पुनर्भरण निम्न स्रातो द्धारा  होता है :

  1. सतही जल का भण्डार {तालाब, पोखर आदि }
  2. जल का भुमिगत संचयन {टाका,कुंड आदि }
  3. इस जल का कृत्रिम पुनर्भुरण [ARTiFICIAL RECHARGE OF AQUIFER } {नलकूप, कुएं ,हैडपम्प }|

वर्षा जल संचयन एवं भू -जल पुनर्भरण क्यो ?

  • हमे वर्षा जल बहुतायत में उपलब्ध होता है साथ ही जीवाणुओं और कार्बनिक पदार्थो से मुक्त एवं हल्का होता है|
  • वर्षा जल नाले एवं सड़को पर व्यर्थ ही बह जाता है एवं सड़को को क्षतिग्रस्त करता है तथा यातायात में बाधा उत्पन्न करता है |
  • कृत्रिम पुनर्भरण किए जाने वाले  वर्षा जल का वाष्पीकरण एवं निस्वदन कम होता है|
  • वर्षा जल शहर के निचले क्षेत्रो में बाढ़ की स्थिति उत्त्पन्न करता है तथा भूमि का कटाव भी करता है |
  • संरचना की लागत कम आती है तथा कम समय में ही बनाई जाती है |
  • वर्षा जल पीने के लिये उपयुक्त होता है इसके शुद्धिकरण हेतु खर्चीले उपायों की आवश्यकता नहीं होती है |
  • पुनर्भरण के कार्य में किसी प्रकार की ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती है |

मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना के लाभ

  • जहाँ पर भू जल और सतही जल अपर्याप्त हो वहां वर्षा जल का पुनभ्ररण घटते भूजल की समस्या का आदर्श समाधान हैं.
  • पुनभरण और संचयन किये जाने वाला जल, उपयोग किये जाने वाले स्थान पर उपलब्ध होता हैं.
  • भूजल स्त्रोतों की जल क्षमता में वृद्धि होती हैं.
  • जीवाणुओं रहित जल का जलभूत में भंडारण होता हैं.
  • पुनर्भरण सरंचना का निर्माण उसी स्थान पर उपलब्ध सामग्री से किया जाता हैं.
  • कम लागत में सरंचना का निर्माण किया जा सकता हैं.
  • भू-जल की गुणवता में सुधार होता हैं.
  • भूमिगत पुर्नभरण सरंचना बनाने में भूमि सतही जल भण्डारण की अपेक्षा कम होता हैं.
  • संग्रहित जल का उपयोग आवश्यकतानुसार जल के अभाव में किया जाता हैं.

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