मुंशी प्रेमचंद की जीवनी | Munshi Premchand Jeevan Parichay

Munshi Premchand Jeevan Parichay हिंदी साहित्य के आधुनिक साहित्कारों में मुंशी प्रेमचंद का स्थान बहुत ऊँचा है. ये हिंदी के सर्वश्रेष्ट कथाकार और उपन्यासकार सम्राट माने जाते है. उतर भारत के हिंदी प्रदेशों में गोस्वामी तुलसीदास के समान उन्हें भी अध्यधिक सम्मान तथा लोकप्रियता प्राप्त हुई. इनकी रचनाओं के पाठक गरीब भी है तो अमीर भी है. देखा जाए तो मुंशी प्रेमचंद आधुनिक हिंदी गद्य के निर्माता भी है. और उनके सर्वोत्कृष्ट प्रतिनिधि भी जब उन्होंने लिखना प्रारम्भ किया था उस समय हिंदी का कथा साहित्य प्रारम्भिक अवस्था में था.

मुंशी प्रेमचंद की जीवनी | Munshi Premchand Jeevan Parichay

उन्होंने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर साहित्य का सम्बन्ध जन जीवन से स्थापित किया और मानव चरित्र का स्वाभाविक चित्रण कर देश की सामाजिक, राजनैतिक आर्थिक आदि विभिन्न समस्याओं का समावेश कर हिंदी गद्य साहित्य की प्रोढ़ अवस्था प्रदान की. इन सभी विशेषताओं से मुंशी प्रेमचंद जन जन के गद्यकार और उपन्यासकार माने गये.

मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय और साहित्य रचनाएं (Munshi Premchand’s life introduction and literature works)

मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 अक्टूबर 1880 में बनारस के पास लमही गाँव में हुआ था. इनके बचपन का नाम धनपतराय था, परन्तु घर में अपने आप को नवाबराय नाम से संबोधित किया जाता था. छोटी अवस्था में विवाह हो जाने तथा पिता के निधन होने से मेट्रिक की परीक्षा उतीर्ण करके मुंशी प्रेमचंद को बनारस में एक शिक्षक की नौकरी स्वीकार करनी पड़ी.

बाद में नौकरी करते हुए उन्होंने बीए तक की पढाई की और सरकारी सेवा में आगे बढ़कर डिप्टी इंस्पेक्टर बन गये. परन्तु तभी राष्ट्रिय आंदोलन के प्रभाव में आकर प्रेमचंद ने 20 साल की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और स्वतंत्र रहकर साहित्य स्रजन करने लगे.

आरम्भ में इनकी कहानियां कानपुर के पत्र जमाना में छपती थी. सन 1909 में इन्होने अपनी कहानियों का एक संग्रह ”सोजे वतन” नाम से प्रकाशित करवाया. जिसे सरकार ने जब्त कर लिया. इसके बाद इन्होने नवाबराय से प्रेमचंद नाम बदलकर हिंदी में कहानी और उपन्यास साहित्य की रचना की.

मुंशी प्रेमचंद की पहली कहानी ”पंच परमेश्वर” सन 1916 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई. इसके बाद उनकी 296 कहानियाँ मानसरोवर नाम से आठ भागों में प्रकाशित हुई. इनका पहला उपन्यास सेवा सदन प्रकाशित हुआ. तो पाठकों ने इनका काफी स्वागत किया. इससे प्रेरित होकर मुंशी प्रेमचंद ने वरदान, प्रतिज्ञा, निर्मला, गबन, प्रेमाश्रम, कायाकल्प, रंगभूमि, कर्मभूमि गोदान और मंगलसूत्र उपन्यास की रचना की.

उन्होंने प्रेम की वेदी, कर्बला, संग्राम ये तीन नाटक भी लिखे और कुछ अंग्रेजी उपन्यासों का अनुवाद भी किया. अपने जीवन में हंस और जागरण नामक पत्रों का सम्पादन तथा संचालन भी किया तथा कुछ बालोपयोगी रचनाएं भी लिखी.

मुंशी प्रेमचंद की साहित्यिक विशेषताएं (Literary features of Munshi Premchand)

प्रेमचन्द के साहित्य की अनेक विशेषताएं है वे आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य के युग पुरुष माने जाते है. उन्होंने अपने समय की अनेक समस्याओं को आधार बनाकर साहित्य रचना की तथा जागरूक रहकर जन भावनाओं से अपना सम्बन्ध बनाए रखने की पूरी चेष्टा की. उन्होंने जन भाषा में लिखा और जनता की समस्याओं पर लिखा, जनता के दुःख, दैन्य, गरीबी, उत्पीड़न तथा मनोभावों का प्रभावशाली चित्रण किया.

राजनैतिक एवं सामाजिक चेतना

मुंशी प्रेमचंद जी ने राष्ट्रिय आंदोलन के कारण बीस वर्ष की सरकारी नौकरी छोड़ दी थी. इसलिए उनमे राजनितिक चेतना पर्याप्त थी. इसी कारण उन्होंने साहित्य में राष्ट्रीय आंदोलन का चित्रण किया. सामाजिक द्रष्टि से वे काफी जागरूक थे. इस क्षेत्र में उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वासों, कुरूतियों, पाखंड पर व्य्ग्यात्मक चित्र उतारे है.

वे समाज में व्याप्त हर तरह के शोषण के विरुद्ध थे. इस कारण उन्होंने सदा शोषित दलित वर्ग का पक्ष लिया और उनके मनोभावों का यथार्थ चित्रण उभारा है.

मुंशी प्रेमचंद की भाषा शैली (Munshi Premchand’s language style)

प्रेमचंद आधुनिक हिंदी कथा साहित्य के निर्माता तथा गद्य शैली के जनक थे. उन्होंने नवाबराय के रूप में पहले उर्दू में लिखा फिर मुंशी प्रेमचंद बनकर हिंदी में साहित्य रचा. इस कारण उनकी भाषा सही मायनों में हिंदुस्थानी भाषा है. इनकी प्रारम्भिक हिंदी कहानियों में उर्दू का प्रभाव अधिक है, परन्तु प्रवर्ती रचनाओं में यह प्रभाव कम हो गया है. उनकी भाषा में उर्दू फारसी अरबी अंग्रेजी के बहुप्रचलित शब्द तथा गाँवों के प्रचलित शब्द और लोकोक्तियाँ पर्याप्त मात्रा में मिल जाती है.

इसकी मुख्य रूप से व्यास शैली है. परन्तु मनोवैज्ञानिक स्थलों पर उनकी शैली विश्लेषणात्मक हो जाती है. प्रकृति चित्रण एवं सामाजिक वर्णनों में इनकी शैली वर्णनात्मक हो जाती है, तो भ्रष्टाचार आदि के चित्रण में प्रेमचंद की शैली व्यंग्यात्मक हो जाती है.

मुंशी प्रेमचंद इन हिंदी (Munshi Premchand in hindi)

मुंशी प्रेमचंद को हिंदी का सर्वप्रिय गद्य लेखक मानने का कारण यह है कि वे जनता के लेखक थे. उनके साहित्य में आदर्शवाद, यथार्थवाद और जनवाद का स्वर मिलता है. भारतीय जन जीवन का जैसा सूक्ष्म ज्ञान मुशी प्रेमचंद को था, अपने विचारों को व्यक्त करने की जो कलात्मक बारीकी इन्हें प्राप्त थी.

दलित जनताओं की पीड़ा की जो अनुभूति इन्हें थी, उनका चित्रण करने में आधुनिक काल का कोई भी लेखक इनकी बराबरी नही कर सकता. ये हिंदी गद्य साहित्य के बेजोड़ लेखक माने जाते है.

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