भारत में नगरीय स्वशासन (नगरपालिका नगर निगम नगर परिषद) | NAGAR PALIKA NAGAR PARISHAD NAGAR NIGAM IN HINDI

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NAGAR PALIKA NAGAR PARISHAD NAGAR NIGAM IN HINDI

नगरपालिका,नगर निगम,नगर परिषद क्या है और कैसे कार्य करती है. (What is municipal, municipal corporation, city council)

जो कार्य ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत द्वारा किये जाते है, शहरों में इस प्रकार के कार्य नगरपालिका और नगर निगम या नगर परिषद के द्वारा किये जाते है. शहरों में स्थानीय स्वशासन की संस्थाओं का स्वरूप वहां की जनसंख्या के अनुसार किया जाता है. 20,000 से अधिक एवं एक लाख से कम जनसंख्या वाले नगर नगरपालिका, एक लाख से अधिक किन्तु पांच लाख से कम जनसंख्या वाले नगर में नगर परिषद तथा पांच लाख या इससे अधिक जनसंख्या वाले नगर में नगर निगम होता है.

उदहारण के लिए जनसंख्या के आधार पर नाथद्वारा में नगरपालिका, भरतपुर में नगर परिषद तथा अजमेर में नगर निगम कार्यरत है. नगरपालिका, नगर परिषद या नगर निगम के गठन के लिए उनके क्षेत्र को वार्डो में बाट दिया जाता है. प्रत्येक वार्ड के मतदाता अपने एक प्रतिनिधि का निर्वाचन करते है जो कि पार्षद कहलाता है. ये पार्षद इन संस्थाओं के सदस्य होते है. इनके साथ उन क्षेत्र के लोकसभा व विधानसभा के सदस्य तथा कुछ मनोनीत लोग भी इसके सदस्य होते है.

निर्वाचित पार्षद अपने में से ही किसी एक पार्षद को अपना मुखिया और एक को उप मुखिया चुनते है. नगरपालिका का मुखिया अध्यक्ष, नगरपालिका का मुखिया सभापति और नगर निगम का मुखिया मेयर या महापौर के नाम से जाना जाता है, इनका कार्यकाल पांच वर्ष का होता है. समय समय पर होने वाली बैठकों में ये पार्षद अपने शहर की विकास योजनाओं, समस्याओं आदि पर चर्चा करके निर्णय लेते है. ये अपने क्षेत्राधिकार के विषयों पर नियम उपनियम भी बनाते है.

नगरपालिका,नगर निगम,नगर परिषद के कार्य

शहरी संस्थाओं के कार्य दो तरह के होते है, कुछ कार्य अनिवार्य होते है, जैसे शहर के लिए शुद्ध पानी की व्यवस्था करना, सड़को पर रोशनी और सफाई की व्यवस्था करना, जन्म मृत्यु का पंजीयन करना, दमकल की व्यवस्था आदि कार्य नगर पालिका, नगर निगम और नगर परिषद को अनिवार्य रूप से करने ही पड़ते है.

कुछ कार्य ऐसे भी है, जिन्हें करना इन संस्थाओं की इच्छा पर निर्भर है, जैसे सार्वजनिक बाग़, स्टेडियम, वाचनालय, पुस्तकालय का निर्माण करना, वृक्षारोपण, आवारा पशुओं को पकड़ना, मेले प्रदर्शनियों का आयोजन, रेन बसेरों की व्यवस्था आदि.

इन संस्थाओं को अपने कार्य में मदद के लिए अधिशाषी अधिकारी या मुख्य कार्यकारी अधिकारी या आयुक्त, इंजिनियर, स्वास्थ्य अधिकारी, राजस्व अधिकारी, सफाई निरीक्षक आदि होते है. इन संस्थाओं को तीन स्रोतों से धन प्राप्त होता है. इन्हें केंद्र या राज्य सरकारों से अनुदान और ऋण के रूप में धन मिलता है. दूसरा इन्हें विभिन्न शुल्को एवं जुर्माने के रूप में धन मिलता है. तीसरा, ये अपने शहरवासियों पर विभिन्न कर लगाकर धन प्राप्त कर सकती है.

ये स्थानीय संस्थाएं हमारी अपनी संस्थाएं है. अपनी समस्याओं के समाधान और विकास के लिए हमे योग्य, कर्तव्यनिष्ठ और सेवाभावी प्रतिनिधि को ही निर्वाचित करना चाहिए. हमारी जिम्मेदारी यह भी है कि हम इन संस्थाओं और जन प्रतिनिधियों का सहयोग करे, तब ही ये संस्थाएं सार्वजनिक हित में अच्छे से अच्छा कार्य कर सकेगी.

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