नारी शिक्षा पर निबंध – Nari Shiksha Ka Mahatva Par Nibandh

Nari Shiksha Ka Mahatva Par Nibandh – नमस्कार दोस्तों आज नारी शिक्षा पर निबंध लेकर आए हैं. कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9, 10 के स्टूडेंट्स के लिए भारत में नारी शिक्षा महत्व, आवश्यकता, इतिहास पर शोर्ट निबंध, भाषण अनुच्छेद यहाँ 400 और 500 वर्ड्स में दिया गया हैं. चलिए Woman Education Essay in Hindi पढ़ना आरम्भ करते है.

Nari Shiksha Ka Mahatva Par Nibandh

Nari Shiksha Ka Mahatva Par Nibandh

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Nari Shiksha Par Nibandh Hindi Me

भारतीय समाज में नारी शिक्षा की स्थिति- आधुनिक पुरुष प्रधान समाज में नारी को पुरुष के मुकाबले कमतर आँका जाता हैं. इस मानसिकता के चलते नारी शिक्षा के मामले में भी समाज में उदासीनता रहती है जबकि पुरुषों को शिक्षा में सुअवसर मिलते रहे हैं.

नारी को पुरुष प्रधान समाज में पहले बेटी फिर बहू और माँ के रूप में जीवन की इन भूमिकाओं का निर्वहन करना पड़ता हैं. उनका स्थान इतना महत्वपूर्ण होने के उपरान्त भी वह शिक्षा की दायरे से अभी भी बाहर ही स्वयं को पाती हैं. प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक महिला शिक्षा के कोई विशेष प्रबंध व सुविधाएं नहीं थी, मगर आजादी के बाद से केंद्र सरकार, राज्य सरकारे तथा समाज नारी शिक्षा में उन्नति की ओर बढ़ा है फिर भी औसतन नारी आज भी साक्षरता से वंचित हैं. आज भी पुरुषों की तुलना में नारी साक्षरता बेहद कम हैं.

शिक्षित नारी का समाज में स्थान– एक साक्षर इन्सान स्वयं के भौतिक एवं बौद्धिक विकास में सबल होता हैं. इस लिहाज से यदि नारी शिक्षित हो तो वह एक गृहणी, माँ अथवा पत्नी के रूप में बेहतर परिवार का संचालन, बच्चों की देखभाल कर सकती हैं. वह अपनी सन्तान में उत्तम संस्कार तथा अच्छे गुणों को जन्म दे सकती हैं. सदाचार, अनुशासन तथा ईमानदारी जैसे गुण तभी समाज पैदा किये जा सकते है जब प्रत्येक नारी साक्षर हो. एक पढ़ी लिखी नारी विविध भूमिकाओं में यथा माँ के रूप में उत्तम शिक्षिका, पत्नी के रूप में श्रेष्ठ भागीदार, बहिन के रूप में अच्छी मित्र और पथप्रदर्शक हो सकती है.

एक शिक्षित नारी समाज सेवा में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं दे सकती हैं. वकील, चिकित्सक, प्रशासनिक अधिकारी, सलाहकार के रूप में अपने दायित्वों को पूरा कर पाएगी. महिला अपनी दोहरी भूमिकाओं को लेखिका, कवयित्री, अभिनेत्री, प्रशासिका तथा कुशल गृहणी के रूप में अपनी सेवाएं परिवार तथा समाज को दे सकती हैं. नारी शिक्षा से समाज और देश के विकास को दुगुनी गति मिल सकेगी तथा उनका सकारात्मक योगदान तरक्की में सहायक हो सकेगा.

शिक्षित नारी आदर्श गृहणी- ज्ञान अर्थात शिक्षा ही मनुष्य के ज्ञान चक्षु खोलती हैं. अतः एक गृहणी नारी का शिक्षित होना अति आवश्यक हैं. वह अपने घर, परिवार, बच्चों के हित अहित सही गलत के फैसले सही तरीके से कर सकेगी तथा परिवार के विकास में एक स्तम्भ बनकर साबित होगी. गृहस्थी के भार का वहन शिक्षित पति पत्नी उतना आसानी से कर सकते है जिससे परिवार में सुख शान्ति व सम्रद्धि का वातावरण रहता है जो बच्चों के संतुलित विकास के लिए भी जरुरी हैं. एक अशिक्षित नारी की तुलना में शिक्षित नारी परिवार के आय व्यय का लेखा जोखा अच्छी तरह से रख सकती है अपव्यय से बचा सकती हैं.

वह परिवार की प्रतिष्ठा को बनाएं रखने में सहयोग कर सकती है तथा हस्त उद्योग यथा सिलाई, बुनाई जैसे कार्य में भी अपना योगदान दे सकती हैं. घर की स्वच्छता तथा सजावट में रूचि रखने वाली शिक्षित नारी घर को स्वर्ग का रूप दे सकती हैं. वह अन्धविश्वास तथा आडम्बरों से मुक्त रहने के साथ ही परिवार में इस तरह के विचारों को रोकने में प्रभावी होती हैं. वह विभिन्न तरीको से अपने परिवार को सुखी एवं सम्पन्न बनाने में पति के अर्द्धांगिनी बन सकती हैं.

नारी शिक्षा का महत्व– भारतीय संस्कृति में नारी को हमेशा से सम्मानित स्थान प्राप्त था. प्राचीन काल में नारियो को देवी का स्वरूप मानकर उन्हें पूजनीय कहा गया था. उस दौर में भी नारियां परम्परागत शिक्षा प्राप्त कर पुरुष के समान जिम्मेदारियों को पूरा कर समाज कल्याण में सहयोगिनी हुआ करती थी. आज भी बिना नारी के सहयोग के पुरुष के समस्त कार्य अप्रभावी हैं यही वजह है कि नारी का एक अन्य नाम अर्द्धांगिनी है दोनों से मिलकर समाज बनता है एक गाड़ी के चलने के लिए जिस प्रकार दोनों पहियों का सम्वत चलना जरुरी है उसी भांति गृहस्थी को चलाने के लिए भी स्त्री पुरुष को समान भागीदारी से आगे बढना जरुरी हैं. परिवार में आत्मीयता तथा एकता की स्थापना में शिक्षित नारी अधिक कारगर साबित हो सकती हैं. वह अपने निजी व्यवहार में सभी सदस्यों के साथ संतुलन बनाए रखती हैं. इससे परिवार का वातावरण हल्का रहता है तथा सुख सम्रद्धि से पूर्ण रहता हैं, जिसका सीधा असर समाज व देश पर पड़ता हैं.

उपसंहार- अंत में यही कहा जा सकता है कि एक नारी अच्छी एवं गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा पाकर न केवल अपने सुचरित्र का निर्माण करती है बल्कि वह अपने परिवार तथा समाज में भी अपने विचारों की छाप छोड़ती हैं. एक शिक्षित नारी आदर्श पत्नी, कुशल गृहिणी, आदर्श माँ, बहिन किसी भी रूप में देश व समाज की अशिक्षित नारी की तुलना में बेहतर एवं कुशल रूप में अपनी सेवाएं दे सकती हैं. जिस समाज व देश की नारियां सुसंस्कृत होती है वह हमेशा तरक्की के शिखर पर आरूढ़ होता है इसकी कारण कहा गया है शिक्षित नारी सुख सम्रद्धिकारी.

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