नक्सलवाद एक भयानक समस्या | Naxalite In Hindi

Naxalite In Hindi- गत वर्ष ही CRPF के 74 जवानों के शहीद होने के बाद एक बार फिर से नक्सलवाद फिर से सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती के रूप में उभर कर सामने आया हैं. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र राष्ट्र भारत में अपने अधिकारों की मांग को लेकर बार-बार हो रहे नक्सलवादी हमले आतंकवाद की तरह विषैले दंश के रूप में सामने आ रहा हैं. कई बार देश के प्रधानमन्त्री ने इस तरह के नक्सलवादी संगठनो द्वारा की जा रही हिंसा पर व्यतव्य देना अपने आप में इस समस्या की अहमियत को दिखाता हैं. समय रहते यदि नक्सलवाद की समस्या का समाधान नही किया गया तो कोई शक नही आने वाले वर्षो में यह देश की एकता अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा साबित हो सकती हैं.

Naxalite Essay In Hindi

यदि नक्सलवाद के इतिहास और जन्म की बात करे तो इसकी शुरुआत देश की आजादी के साथ ही शुरू हो गई थी. चीन के साम्यवादी दल की विचारधारा से प्रभावित यहाँ के साम्यवादी क्रांतिकारी विचारधारा पर अमल करने वाले लोगों ने पश्चिम बंगाल के नक्सलवाड़ी नामक छोटे से ग्राम से नक्सलवाद की शुरुआत मानी जाती हैं. यह विचारधारा प्रखर रूप से जब सामने आई जब 1967 में इस गाँव के बियल नामक आदिवासी किसान की जमीन वहां के जमीदार द्वारा हड़प ली गई.

अपनी जमीन पर नाजायज तरीके से अधिपत्य के कारण वहां के किसानों ने भूस्वामियों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत कर दी. इन किसानों को साम्यवादियों का प्रत्यक्ष समर्थन मिलने से इस प्रकार के आदिवासी किसान विद्रोह देश के अन्य हिस्सों में भी शुरू हो गये. इसी नक्सलवाड़ी गाँव से आरम्भ हुआ यह विद्रोह प्रथम नक्सलवाद विद्रोह माना जाता हैं. इस प्रकार की विचारधारा से प्रभावित होकर एक हिंसक आंदोलन का जन्म हुआ जिन्हें नक्सलवाद कहा जाता हैं.

नक्सलवाद मार्क्सवाद और माओवादी विचारधारा का पालन करता हैं. जो अपने अधिकारों की मांग को पूरी करवाने के लिए सशस्त्र विद्रोह/आंदोलन में विशवास करते हैं. चीन के माओवादी नेता माओ को अपना वैचारिक गुरु मानते हुए ये संगठन अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हिंसक साधनों का उपयोग करते आए हैं. शुरूआती समय में नक्सलवाद एक तरह का भूस्वामियों के अत्याचार के विरुद्ध आदिवासी किसानों द्वारा आरम्भ किया गया एक किसान आंदोलन था, जो अब पूर्ण सिस्टम का विरोधी बनकर हर मुमकिन अवसर पर हिंसा पर उतारू हैं.

भारत में नक्सलवाद विचारधारा के पिता कन्हाई चटर्जी को माना जाता हैं इनके समर्थक सशस्त्र विद्रोह और क्रांति के प्रबल समर्थक थे. इन्होने अपने समर्थकों को लेकर 1969 में सीपीआई (कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) की नीव रखी. इस पार्टी के संस्थापक सदस्यों में कानू सान्याल और चारु मजुमदार का नाम आता हैं, जो बड़े नक्सलवादी नेता हुआ करते थे, इन्ही के नेतृत्व में पहला नक्सलवादी विद्रोह आरम्भ हुआ था.

भारत में नक्सलवाद

नक्सलवाड़ी (पश्चिम बंगाल) से शुरू हुआ यह विद्रोह धीरे धीरे पड़ोसी राज्य बिहार, उड़ीसा आंध्रप्रदेश, झारखंड,महाराष्ट्र, छतीसगढ़, उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश तक फ़ैल चूका हैं. नक्सलवाद की शुरुआत में यह अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए एक आन्दोलन का तरीका भर था, जो कालान्तर में व्यापक मानवीय हिंसा का रूप धारण कर चूका हैं. भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रो के अनुसार यह 20 से अधिक राज्यों के 250 जिलों तक फ़ैल चूका संगठन हैं, जिनके 40 हजार से अधिक सक्रिय लोग और 15 हजार से अधिक प्रशिक्षित सैनिक हैं.

यह सगठन इन राज्यों के बहुत बड़े क्षेत्र में अपना प्रभुत्व बनाए हुए हैं, इस क्षेत्र में रंगदारी और लुट खसोट से व्यापक मात्रा में आय अर्जन की जाती हैं. रो द्वारा 2009 में जारी सरकारी आंकड़ो के अनुसार कुल 40 हजार वर्ग किमी. क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाए यह संगठन विभिन्न तरह के कार्यक्रमों के द्वारा 1400 करोड़ रूपये हर साल कमाता हैं. इस बात से समझा जा सकता हैं कि अपने हक़ की लड़ाई के लिए शुरू हुआ यह संगठन आज अपने राजनितिक और आर्थिक स्वार्थ सिद्धि के लिए कार्यरत हैं.

नक्सलवाद के कारण

प्रत्येक समस्या की उत्पति उनके प्रश्रय के पीछे कुछ अहम कारण जुड़े होते हैं. यदि हम बात करे नक्सलवाद की तो इसकी शुरुआत इस समस्या के बढ़ने और आज विकृत रूप धारण कर लेने के पीछे कोई एक मुख्य वजह न होकर कई कारण जुड़े हुए हैं, जिनमे से कुछ मुख्य कारणों के बारे में यहाँ चर्चा कर रहे हैं.

  • आज हमारा राष्ट्र मंगल ग्रह पर उपस्थति दर्ज करवा चूका हैं, कई क्षेत्रों में अग्रणी राष्ट्र होने के कारण विकसित राष्ट्रों की सूची में आने की बाते कही जा रही हैं. मगर कई दूर-दराज आदिवासी बहुल इलाकों में आज भी प्राथमिक शिक्षा, स्वच्छ पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं. इस कारण अशिक्षित लोग कुछ लोगों के बहकावे में आकर नक्सलवाद से जुड़ जाते हैं.
  • भारतीय मूल की जातियों में आदिवासी जनजाति गिनी जाती हैं. जिनके जीवन का आधार जंगल ही था. वनों के निरंतर हास के कारण इनके सामने रोजीरोटी की समस्या आन पड़ी हैं.
  • कई सामजिक बुराई यथा गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और कुपोषण के कारण भी नक्सलवाद को इन पिछड़े इलाकों में बढ़ावा मिला है.
  • भारत की आजादी के पश्चात किसी भी सरकार ने आदिवासी, दलित हितो के बारे में कोई विशेष ध्यान नही दिया. यदि कुछ योजनाओं बनाई भी गई तो इनके समुचित क्रियान्वयन ना होने के कारण असली हकदार लोगों तक इनका फायदा नही पहुच पाया.
  • नक्सलवाद की शुरुआत का मूल कारण स्थानीय जमीदारों के अत्याचार और भूमि अधिग्रहण भी अहम विषय था जिसके कारण लोग बेरोजगार होते चले गये और नक्सलवाद की तरफ उनका रुझान बढ़ता गया.

नक्सलवादी घटनाएं/हमले

हाल ही में छतीसगढ़ राज्य के सुकमा में नक्सली हमले में 25 सुरक्षाकर्मी मारे गये थे. वही दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले में 76 जवानों को मौत के घाट उतार दिया गया था. 1950 के बाद निरंतर रूप से सुरक्षा बलों और पुलिस की टुकडियो पर आए दिन हमले हो रहे हैं.

अब तक कई बड़ी घटनाओं और छिटपुट झड़पो में हजारों की संख्या में सुरक्षाबलों को जिन्दगी से हाथ धोना पड़ चूका हैं. 13 फरवरी 2010 को ईस्ट फ्रंटियर राइफल के कैंप पर हुए नक्सली हमले में 20 जवान मारे गये थे. पश्चिम बंगाल के मिदनापुर उड़ीसा के कोरापुत, दंतेवाड़ा तथा सुकमा जैसे जिले अकसर नक्सलियों के निशाने पर रहते हैं.,

बड़े नक्सली हमलों की बात करे तो 1 मार्च 2017 को सुकमा में 11 जवानों की हत्या, 11 मार्च 2014 को झीरम घाटी के पास हुए हमले में 15 जवानों की मौत, 12 अप्रैल 2014 को बीजापुर और दरभा की घाटी में हुए नक्सली हमले में 14 लोग मारे गये, दिसंबर 2014 को ही सुकमा की चिंतागुफा इलाके में हुए नक्सली हमले में 14 जवान मारे गये. 25 मई 2013 को झीरम घाटी हमला के पास कोंग्रेसी नेताओं पर हुए बड़े हमले में 30 से अधिक नेता मारे गये थे. दंतेवाड़ा हमला जो 6 अप्रैल 2010 के दिन हजारों की संख्या में नक्सलियों ने CRPF के जवानों पर घात लगाकर हमला किया था, जिनमे 76 से अधिक सुरक्षाकर्मी शहीद हो गये थे.

नक्सलवाद की समस्या का समाधान

पिछले कुछ वर्षो से नक्सली घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं. रेल, सुरक्षा बलों का कैंप, पूल, स्कूल, अस्पताल, पुलिस थाना जैसे महत्वपूर्ण और अधिक से अधिक संख्या में जनहानि से किये जाने के उद्देश्य से घात लगाकर हमला, बम ब्लास्ट जैसी घटनाओं को अंजाम देने की फिराक में रहते है.

भुखमरी, गरीबी तथा अशिक्षा के कारण पिछड़े इलाकों में लोग थोड़े से धन के प्रलोभन में आकर हिंसा जैसे अपराध को करने को तैयार हो जाते हैं. आज के समय में नक्सलवाद घरेलू आतंकवाद का रूप ले चूका हैं. समय रहते यदि इस स्थति से निपटा नही गया, तो दूर भविष्य में इसके विकटगामी परिणाम देखने को मिल सकते हैं. हमारे सिस्टम को भी चाहिए सदियों से पीड़ित और विकास के प्राथमिक मापदंड़ो से दूर रह रहे दलित और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और रोजगार की उपलब्धता के साथ साथ सरकारी योजनाओं से यहाँ के आमजन के जीवन स्तर को सुधारने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाने चाहिए.

 

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