एक राष्ट्र एक चुनाव पर निबंध | One Nation One Election Essay In Hindi

One Nation One Election Essay In Hindi : नमस्कार दोस्तों आपका स्वागत है आज हम एक राष्ट्र एक चुनाव पर निबंध, स्पीच, अनुच्छेद जानेगे. भारत में इस समय एक देश एक चुनाव राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन चूका हैं. इस निबंध में हम सरल शब्दों में एक राष्ट्र एक चुनाव आवश्यकता, महत्व, लाभ हानि, पक्ष, विपक्ष आदि को समझने का प्रयास करेंगे.

One Nation One Election Essay In Hindi

एक राष्ट्र एक चुनाव पर निबंध | One Nation One Election Essay In Hindi

लोकतंत्र में चुनावों को उत्सव की तरह माना जाता हैं. पांच या छः वर्षों में एक बार चुनाव होते है लोग अपने मताधिकार द्वारा पसंद की सरकार बनाने में अपनी भागीदारी अदा करते हैं. भारत दुनियां का सबसे बड़ा लोकतंत्र हैं. यहाँ विश्व के सर्वाधिक 1 अरब मतदाता हैं. विस्तृत भूभाग में फैले भारत को प्रशासनिक इकाईयों के रूप में 29 राज्य एवं 7 केंद्र शासित प्रदेशों ( धारा ३७० हटाने के बाद 28 राज्य एवं 9 केंद्र शासित प्रदेश) में विभक्त किया गया हैं.

देश में प्रत्येक छः महीने में किसी न किसी राज्य या केन्द्रशासित प्रदेश के विधानसभा, विधान परिषद, स्थानीय निकाय के चुनाव होते रहते हैं. भारतीय लोकतंत्र ने ७० वर्षों के अनुभव में अब इस बात को महसूस किया है कि निरंतर चलने वाले इन चुनावों के कारण अपार मात्रा में धन एवं शक्ति का व्यय होता हैं. कभी किसी प्रदेश में तो कभी दूसरे में फिर लोकसभा और राज्य सभा के चुनावों के चलते केन्द्रीय इकाईयों यथा चुनाव आयोग, सुरक्षा बल, शिक्षा विभाग से जुड़े कर्मचारी आदि के कार्य भार में अतिरिक्त वृद्धि होने से वे अपनी कार्यक्षमता का पूर्ण प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं.

‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (One Nation One Election) के तहत भारत में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ करवाने के विषय पर व्यापक चर्चा की जा रही हैं. विभिन्न राजनीतिक दल इसे अपने अपने नफे नुक्सान के नजरिये से कभी इसे फायदे गिनाते है तो कभी नुक्सान गिनाते नजर आ रहे हैं. यह निश्चित है भारत में एक देश एक चुनाव मुद्दे पर सर्वसम्मती बनना मुश्किल हैं.

एक देश, एक चुनाव के तहत चुनाव नीति में बदलाव करके देश की केन्द्रीय सरकार के लिए निर्वाचन चुनाव लोकसभा एवं सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों के लिए निर्वाचन के लिए विधानसभा चुनाव एक साथ आयोजित करवाने का प्रस्ताव हैं. ऐसा हो पाया तो समय तथा धन दोनों की बचत हो सकेगी.

ऐसा नहीं है कि भारत में एक राष्ट्र एक चुनाव की मांग पहली बार उठ रही है इससे पूर्व भी 1952, 1957, 1962, 1967 के चुनावों में राज्य की विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों का आयोजन साथ साथ करवाया जा चूका हैं. मगर 1968 में यह क्रम टूट गया, जब कई राज्य सरकारें अपना कार्यकाल पूर्ण करने से पूर्व ही निरस्त कर दी गई थी. इस तरह यदि भारत में एक साथ चुनावों की प्रक्रिया को पुनः स्थापित करने की बात की जा रही है तो इसमें कोई बड़ी समस्या की बात नहीं हैं.

भारत हर समय किन्ही चुनावों के मोड़ पर खड़ा नजर आता हैं. इससे व्यापक दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं. प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते ही है साथ ही बड़े स्तर पर धन की बर्बादी होती हैं. लोकसभा चुनाव 2019 में भारत में तीन महीने तक सरगर्मी रही, इन चुनावों की समाप्ति तक ६० करोड़ रूपये का खर्च हुआ.

इन बिखरी चुनाव व्यवस्था से हित केवल दो समुदायों का सधता है पहला राजनीतिक दल एवं दूसरे मिडिया हाउस, नेताओं को समय के साथ अपने चुनावी खेल खेलने का पर्याप्त अवसर मिल जाता हैं. मिडिया को हर समय टीआरपी मिलती रहती है, जबकि इसका सबसे बड़ा नुकसान देश के राजकोष एवं देश की जनता पर पड़ता हैं. एक राष्ट्र एक चुनाव फोर्मुले को लागू करना इसलिए भी कठिन है क्योंकि इस बिल को सामान्य बहुमत की बजाय दो तिहाई बहुमत के साथ पारित कर कानून बनाने के बाद ही अमल में लाया जा सकेगा.

नीति आयोंग के अनुसार 2024 तक देश की विधानसभाओं के कार्यकाल को कम करके अथवा पहले समाप्त होने वाले कार्य काल को बढ़ाकर आगामी लोकसभा चुनावों के साथ आयोजित करवाया जा सकता हैं. वर्ष 2019 में ही इंडोनेशिया में एक राष्ट्र एक चुनाव का सफल प्रयोग किया जा चूका हैं. जहाँ राष्ट्रपति एवं संसदीय चुनावों का एक साथ आयोजन हुआ और इसके लिए आठ लाख चुनावी बूथ बनाए गये थे. फिर भारत में तो इसका पहले भी प्रयोग हो चूका हैं, केवल विरोध के नाम पर अच्छी नीतियों का विरोध करने की प्रवृत्ति को तो मानसिक दिवालियापन का नाम ही दिया जा सकता हैं.

एक साथ चुनावों के आयोजन के फायदे की बात करे तो आर्थिक बचत पहला बड़ा लाभ प्रतीत होता हैं. एक अनुमान के मुताबिक़ विगत लोकसभा के चुनावों में प्रति मतदाता 72 रूपये का खर्च आता हैं, इसके अतिरिक्त चुनावों में कितनी काला पैसा उपयोग में आता है तथा चुनाव आयोग को कितने की जानकारी दी जाती है इस तथ्य से हम सभी भली भांति परिचित हैं. वर्ष 2014 के आम चुनावों में कुल तीस हजार करोड़ रूपये खर्च हुए थे, वही 2019 में यह खर्च दुगुना यानी ६० हजार करोड़ हो गया था.

एक राष्ट्र एक चुनाव की क्रियान्वयन के बाद आमजन को बार बार आचार संहिता के बंधन से राहत मिलती हैं. इससे शिक्षा, न्याय, चिकित्सा जैसे मूलभूत कार्यों में बाधाएं उत्पन्न होती हैं. यदि भारत में एक साथ सभी चुनाव होने लगे तो काले धन के प्रवाह पर भी रोक लग सकेगी. इस व्यवस्था को अमल में लाने के बाद सामाजिक सोहार्द एवं भाईचारे को भी बढ़ावा मिलेगा.

बार बार चुनावों के आयोजन में राजनेता जाति, धर्म और विवादित मुद्दों को उछालकर आमजन में फूट डालने के कार्य में रत रहते हैं. ऐसे में यदि पांच वर्षों में एक बार ही चुनावों का आयोजन होता है तो उन्हें समाज को कम से कम एक बार ही बांटने का अवसर मिलेगा.  इस व्यवस्था का एक अन्य लाभ आमजन को भी मिलेगा, नित्य की चुनावी रेलियाँ, भाषण शोर शराबे से उन्हें कम से कम पांच वर्षों तक तो छुटकारा मिलना निश्चिन्त हैं.

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