पर उपदेश कुशल बहुतेरे पर निबंध | Par Updesh Kushal Bahutere Essay In Hindi

पर उपदेश कुशल बहुतेरे पर निबंध | Par Updesh Kushal Bahutere Essay In Hindi: सामान्य इन्सान भी बनावटी प्रकृति का होता है, तथा यह प्रकृति तब तक सहनीय होती है जब तक उससे सम्बन्धित गुण विद्यमान रहते हैं. लेकिन किसी व्यक्ति में इस तरह के गुणों का अभाव होने के बाद भी दिखावा करना असहनीय बोझ होने लगता हैं. दिखावे की प्रवृति व्यवहारिक उपदेश के स्वरूप सामने आती हैं. किसी भी प्रासंगिक विषय पर सामने वालो को उपदेश की प्रवृति अग्राह्य हो जाती हैं, जब उपदेश देने वालो का चरित्र उन तथ्यों के बिलकुल विपरीत होगा. Par Updesh Kushal Bahutere उक्ति पर हम निबंध बता रहे हैं.

Par Updesh Kushal Bahutere Essay In Hindiपर उपदेश कुशल बहुतेरे पर निबंध | Par Updesh Kushal Bahutere Essay In Hindi

शीर्षक पंक्ति का सन्दर्भ गोस्वामी तुलसीदास की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृति रामचरितमानस में वर्णित मेघनाद की मृत्यु के बाद शोक संतप्त विलाप करती मन्दोदरी को रावण द्वारा किये जाने वाले सांत्वना के प्रसंग से सम्बन्धित हैं. इस सूक्ति में व्यग्य का पुट छिपा हुआ हैं. दूसरों को उपदेश देना आसान है, लेकिन उन उपदेशों को अपने जीवन में उतारना उतना ही कठिन. जब रावण जैसे तथाकथित महाज्ञानी की कथनी और करनी में इतना अधिक अंतर सामान्य लोगों के गलें नहीं उतर पाता, तो सामान्य लोगों की क्या बिसात.

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इंसान अपने स्वभाव का गुलाम होता है, तथा उनके इस स्वभाव को बदलना बेहद कठिन हो जाते हैं. और इन्सान का स्वभाव है कि लोभ, इर्ष्या, द्वेष, काम और क्रोध जैसी प्रवृतियों को मुक्त करना कठिन होता है. इन्ही बुरी प्रवृतियों में से एक है अन्य को उपदेश देना, वह जिस आचरण का अनुसरण नहीं करता है परन्तु अन्य को वैसा आचरण करने के लिए सुझाव देता रहा हैं.

यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य हैं कि मनुष्य उपदेश देने की प्रवृति में अत्यधिक रूचि रखता है. अधिकांश व्यक्ति बिन मांगे सुझाव और अनाश्यक रूप से नसीहत या उपदेश देने व्यक्ति के मस्तिष्क में वे बातें गहरी बैठी हुई हैं. वह यदि स्वयं उस प्रकार का व्यवहार नहीं करता है और इसके बावजूद उपदेश देने का कार्य करता हैं.

इसका मतलब यह भी है कि कही न कही वह व्यक्ति हीन भावना से ग्रसित है. साथ ही वह नैतिक रूप से कायर भी हैं क्योंकि नैतिक रूप से कायर इंसान ही उपदेश दिए गये सद्वचनो का स्वयं जीवन में पालन नहीं कर पाता है. जब रावण ने मन्दोदरी को संसार की क्षणभंगुरता का वर्णन करते हुए उसे सांसारिक मोह माया से वंशीभूत होकर उसने सती साध्वी सीता का अपहरण किया हैं.

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रावण के पांडित्य या विद्वता में कोई संदेह नहीं लेकिन व्यक्तित्व के इस महत्वपूर्ण अंतर्विरोध ने उसकी नैतिक कायरता स्पष्ट कर दिया. वह एक ज्ञानी के रूप में जिस आचरण का समर्थन करता है उसी आचरण का अपने जीवन में पालन नहीं कर पाता है. क्योंकि उसके बाद ज्ञान पर उसकी कामुकता, लिप्साएं, सांसारिक, सुख सुविधाएं आदि अत्यधिक हावी हैं, सामान्यतया अधिकांश व्यक्तियों की स्थिति ऐसा ही होती हैं.

दूसरों को उपदेश देने की प्रवृति के पीछे यदि एक ओर व्यक्ति को स्वयं को ज्ञानवान प्रदर्शित करने की सहज भावनाएं होती है, तो दूसरी ओर आत्म श्लाघा एवं अहमवादी प्रकृति भी उसे उपदेश देने के प्रेरित करती हैं. वर्तमान समय में भी समय में भी सामान्य व्यक्तियों में यह प्रवृति बहुत तेजी से पनपी है. व्यक्ति स्वयं को प्रदर्शित करने और दिखावे की प्रवृति का कोई अवसर छोड़ना नहीं चाहता हैं.

वास्तव में उपदेश देने का अधिकार उसी व्यक्ति को हैं. जो स्वयं उन उपदेशों को अपने जीवन में पालन करता है. जिसकी कथनी और करनी में बहुत अंतर न हो. व्यक्ति जो बोल रहा हैं. वह दूसरों के लिए ही नहीं बल्कि उसके ऊपर भी लागू होती हैं. ऐसा नैतिक रूप से साहसी व्यक्ति ही कर सकता हैं.

नैतिक रूप से साहसी व्यक्ति ही अपने उद्देश्यों की द्रढ़ता पर कायम रह सकता हैं. उसकी कथनी और करनी में अंतर नहीं रहने के कारण कोई भी व्यक्ति उसके आचरण पर सवाल खड़े नहीं कर सकते हैं. ऐसी स्थिति में उपदेश देने वाले व्यक्ति की महानता एवं गम्भीरता भी सामने आती हैं. ऐसे व्यक्ति समाज के सभी सदस्य अत्यंत आदर प्रदान करते हैं.

इन्हें मान समान प्राप्त है उसका चरित्र एवं आचरण समाज के दुसरे सदस्यों के प्रति अनुकरणीय बन जाता हैं. समाज ऐसे व्यक्ति से नेतृत्व प्रदान करने की अपेक्षा करता है. जिससे सकारात्मक प्रभाव समाज के अन्य सदस्यों के आचरण पर पड़े और समाज के आचरण पर पड़े और समाज के विकास को एक नई सकारात्मक एवं ईमानदार दिशा प्राप्त हो सके.

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