Poem On Diwali In Hindi | दीपावली पर कविता | Diwali Poem

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Poem On Diwali In Hindi | दीपावली पर कविता | Diwali Poem

दीपावली पर कविता-1

माँ तू नाराज न होना
इस दिवाली पर भी मैं नहीं आ पाउंगा
तेरी मिठाई भी मैं नहीं खा पाउंगा
दिवाली हैं तुझे खुश दिखना होगा
शुभ लाभ तुझे खुद लिखना होगा
तू जानती हैं यह पूरे देश का त्यौहार हैं
और यह भी माँ कि तेरा बेटा थानेदार हैं
मैं जानता हूँ
पड़ोसी बच्चे पटाखे जलाते होगें
तोरण से अपना घर सजाते होगें
तू मुझे बेतहाशा याद करती होगी
मेरे आने की फरियाद करती होगी
मैं जहॉ रहूं मेरे साथ तेरा प्यार हैं
तू जानती हैं न मॉ तेरा बेटा थानेदार हैं
भोली मॉ मैं जानता हूँ
तुझे मिठाईयो में फरक नहीं आता है
मोलभाव करने का तर्क नहीं आता हैं
बाज़ार भी तुम्हें लेकर कौन जाता होगा
पूजा में दरवाज़ा तकने कौन आता होगा
तेरी सीख से हर घर मेरा परिवार हैं
तू समझती हैं न मॉ तेरा बेटा थानेदार हैं
मैं समझता हूँ
मॉ बुआ दीदी के घर प्रसाद कौन छोड़गा
अब कठोर नारियल घर में कौन तोड़ेगा
तू फक्र कर माँ
कि लोगों की दिवाली अपनी अबकी होगी
तेरे बेटे के डयुटी की दिवाली सबकी होगी
लोगों की खुशी में खुशी मेरा व्यवहार हैं
तू जानती हैं मॉ तेरा बेटा थानेदार हैं….

दीपावली पर कविता-2

चीनी मधुर पर अभिशाप, ह्रदय की धड़कन की खातिर ,
“मधु’ बूंद टपका ताप में, ज्यों-हँसे ! “मेह” कुटिल-शातिर ।
ऊर्जा-पुरज़ा कचकारे में भरे विद्धुत-अनल,
बन तमहर चकमक करता,षडयंत्री दावानल।
दावग्नि कब हो सकती ?,कही ज्योत उत्तम असली ,
असली होती मिट्टी की दीपों की ही दीपावली।
जब नापाक ह्रदय से कृत्रिम दीप जले, तम दूर कहाँ ?
जोत अनीति की बाती से, अँधियारा मजबूर कहाँ ?
कुदरती मिट्टी की,हाथों से,बने दीप में जय-ज्योति ,
स्व का वरण करती मिट्टी ,अक्सर ही विजयी होती ।
स्वदेशी सम्मान, सतरंगी रंगोली चित्रावली,
असली होती मिट्टी की दीपोंसे ही दीपावली।
कुंभकार के हाथ में सनती मिट्टी की लोई ,
आनन्दित मिट्टी पा जाती खुशहाली खोयी ।
तृण-तिनका त्यागी- उत्सर्गी हर्षित पा कर अग्नि,
जलती कुक्षि से निकालती दीप मृगनयनी ।
जलती अवली तमहरी ,तम पर भारी प्रश्नावली,
असली होती मिट्टी की दीपों से ही दीपावली ।
पंकज वसंत

दीपावली पर कविता-3

गीत
चढो अटारी धीरे-धीरे, रखना दीप संभालकर।
एक शिकनभी रह ना जाए, उजियारेके भाल पर।।
पहन घाघरा, चूड़ी-बिछिया
छनके घुंघरू पांव के
झिलमिल-झिलमिल दीप सजाकर
अपने तन के गाँव के
चढो अटारी धीरे-धीरे, रखना दीप संभालकर।
जैसे तुम बेंदी रखती हो, अपने गोरे भाल पर।।
करके माँग सिंदूरी अपनी
दृग में काजल आँजकर
अपनी सोने की मूरत को
और प्यार से माँजकर
चढो अटारी धीरे-धीरे, रखना दीप सँभालकर।
ज्यों मेंहदीके फूल काढ़ती हो, मन के रूमाल पर।।
हँसुली, हार और लटकारा
बाजूबंद हमेल से
कह देंना नथुनी-कुंडल से
सदा रहें वे मेल से
चढ़ो अटारी धीरे-धीरे रखना दीप सँभालकर।
ज्यों तुम विमल चांदनी मलतीं, तन के लाल गुलाल पर।।
— कुँअर बेचैन–

दीपावली पर कविता-4

जमाने की चाह है कि मैं हिन्दू या मुसलमान हो जाऊं
पर मेरा ज़मीर कहता है कि मैं इक भला इंसान हो जाऊं
मन्दिर-मस्जिद जाकर कमाऊं आरती-नमाज की दौलतें
या फिर गिरे हुए बंदे को उठाऊं और धनवान हो जाऊं
मेरी तकदीर में बस इतना सा लिख दे दुनिया के मालिक
मुल्क की मिट्टी को चुमूँ और मुल्क पर कुरबान हो जाऊं
मुझे पसीना बनाकर बहा दे ख़ुदा खेतों में, खलिहानों में
मुझसे इतना काम ले कि जीता जागता राष्ट्रगान हो जाऊं
दीपावली पर दीप जले और ईद पर उबले सेवइयां ‘मधु’
कुरआन पढूं तो गीता और गीता पढूं तो कुरआन हो जाऊं
डॉ. मधुसूदन चौबे

दीपावली पर कविता- 5

दिल से सारे वैर भुलाकर
एक दुजे को गले लगाकर
सब शिकवे दुर भगाएगे
आइ दिवाली खुशी से मनाएगें.


दीपावली / दिवाली कविता 6

दिवाली आई दिवाली आई
सब बच्चो के मन को भाई
किसी ने छोड़े खूब फटाखे
किसी ने खाई खूब मिठाई.

दीवाली आई, दिवाली आई
गम के अंधेरो से घबराना मत
ज्ञान का दीपक जलाए रखना
उम्मीद की किरण दिल में जगाए रखना
अँधेरे से घबराना मत.

ज्ञान का दीप जलाए रखना
अँधेरे पर उजाले का पैगाम लाइ है
दीवाली आई दीवाली आई
बच्चो घर को साफ़ रखो
गंदगी न रहने पाए आस-पास
स्वच्छता में ही महालक्ष्मी करती निवास
दीपावली की सबकों हार्दिक है बधाई
दीवाली आई दीवाली आई
सब बच्चो के मन को भाई
-नरेंद्र कुमार

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