Poem On Veer Kunwar Singh Jayanti 2019 | बाबु वीर कुंवर सिंह पर कविता

Poem On Veer Kunwar Singh In Hindi Jayanti 2019 बाबु वीर कुंवर सिंह पर कविता: भारत की भूमि को वोरियर लैंड अथवा वीरों की भूमि कहा गया हैं. अपने वतन की खातिर कुबार्नी देने वालों का इतिहास बेहद लम्बा हैं. भारत की स्वतंत्रता की जंग में ना जाने कितने ही वीरों ने अपने सर्वस्व बलिदान कर दिया था, उनमें 18 साल की आयु में फांसी चढ़ने वाले खुदीराम बोस और 80 साल की आयु में बिहार में 1857 की क्रांति का नेतृत्व करने वाले वीर कुंवर सिंह का नाम बड़े सम्मान साथ लिया था. वतन की आजादी के रखवाले कुंवर सिंह ने उम्रः के इस पड़ाव में जमकर लोहा लिया और 26 अप्रैल 1856 को शहीद हो गये थे.

Poem On Veer Kunwar Singh In Hindi

Poem On Veer Kunwar Singh In Hindi

kunwar singh freedom fighter: बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर में 12 अप्रैल 1782 के दिन वीर कुंवर सिंह जी का जन्म एक राजपरिवार में हुआ था. उनके पिताजी के बाद 1826 में वे अपनी रियासत के जमीदार बने. इनका विवाह भी मेवाड़ के सिसोदिया वंश की राजकुमारी के साथ सम्पन्न हुआ था. रियासत के जमीदार होने के कारण इनकी आमदनी लाखों में थी.

आरम्भ में इन्हें अंग्रेजों की कुटिल नीतियों का ज्ञान नहीं था, जबकि उन्हें ब्रिटिश शासन का भारत के लोगों पर अत्याचार बढने लगा तो वे उनके इरादों को जान गये तथा ८० साल की आयु में इन्होने बिहार में ब्रिटिश सत्ता से बगावत के लिएकई क्रांतिकारी  दल तैयार कर दिए. नाना साहब तथा तात्या टोपे के साथ मिलकर इन्होने अंग्रेजों को भारत से भगाने की कई योजनाएं भी बनाई, जगदीशपुर के गढ़ में इन्होने गोला बारूद का कारखाना भी बनाया.

veer kunwar singh poem in hindi

veer ras kavita in hindi: 23 अप्रैल 1858 को जगदीशपुर से कुछ ही दूरी पर ली ग्रैंड की अंग्रेजी सेना के साथ मुकाबला हुआ, जिसे उन्होंने आसानी से जीत लिया. मगर इस विजय के ठीक तीन दिन बाद 26 अप्रैल को अस्वस्थता के चलते इन्होने प्राण त्याग दिए, ऐसे पराक्रमी यौद्धा की वीरता को हम आपके लिए कुछ कवियों द्वारा वीर कुँवरसिंह पर कविता प्रस्तुत कर रहे हैं वीर रस की ये कविताएँ आपकी रग रग में ज्वार ला देगी.

short poem on veer kunwar singh Par Kavita in hindi

आज कहानी एक सुनानी,
वीर जिसकी थी अलग जिंदगानी,
जब देश के युवाओं का पुरुषार्थ
दम तोड़ रहा था,
८० बसत देख चुके बाबु कुवर का कर्तव्य,
उन्हे झकझोर रहा था,
उनकी कहानी उन्ही की जुबानी,
वीर जिसकी थी अलग जिदगानी|
राजा क्या सुख पाने बने हो,
जनता को मरवाने बने हो,
ऐ देशवासियो क्या हम इतने नरम है,
हजारो साल की सस्कृति में क्या इतना ही दम है|
मुट्ठी भर गोरे हमे लूट जा रहे है,
और राजाओ के आत्मस्वाभिमान डूबते जा रहे हैं|
क्या ये प्रजा हमारी नही?
क्या महल के बाहर हमारी जिम्मेदारी नही|
अग्रेजो को टुकड़े खा रहे हो ,
आर्यवर्त का नाम डूबा रहे हो,
कुत्ते कहे जाते है ऐसे लोग, राजा नही कहलाते है,
स्वाधीनता छोड़ने वाले, महल में रह भी दास हो जाते हैं|
जगदीशपुर वो कमजोर रियाशत नही है,
न कमजोर उनका राजा है,
बूढी है हड्डिया मेरी,
लेकिन इन्हे हरा सके,गोरे वो में ताकत नही है|
८० साल की उम्र तक
शायद मुझे इसलिए जीना था|
आज इन हरामियो के गलत इरादे और उनके खून के साथ गिराना,
अपना पसीना था|
अगर नही साथ मेरे लोग तो क्या हुआ,
इन चमगादडो की फ़ौज के लिए,
एक शेर है आरा का खड़ा|
जगदीशपुर से आरा तक की सुरग मे,
इनकी लाशे क्र्मश बिछाऊगा |
चाहे शहीद हो जाऊ लेकिन स्वतत्र जिया हू,
स्वतत्र ही इस धरा से जाऊंगा|

जानता हू ये क़ुरबानी,
मेरी व्यर्थ जानी है|
गुमनामी में जायेगी मेरी पीड़ी,
यही हमारी कहानी है|
तलवे चाट अग्रेजो के लोग राजा रह जायगे,
और ९० साल बाद आजादी पे उनके पूत बिजनेस मैन बन जायगे|
वही बनगे सांसद विधायक, अग्रेजो का काम वही बढ़ाएगे|
खून पीयगे वो जनता का और शोषण करते जायगे|
आज मुझे मरवाने पे है जो लगे,
उनके बच्चे मेरी मूर्ति लगाएगे|
हर साल में दो बार माला भी चढ़ाएगे|
मै आज खड़ा हू तब भी खड़ा ही रहूगा|
खूब गिरगे ओले पत्थर पर शीश न झुकाउगा |
नयी पीड़ी से आख मैं मिलाऊगा|
जब आख न झुकाई अब मैने, न कभी झुकाउगा|
एक फक्र हमेशा रहेगा,
मा का वादा पूरा कर जाऊगा|
चाहे हो जाये कुछ भी मुझे,
भारत माँ का सच्चा सपूत कहलाऊगा|

Poem On Veer Kunwar Singh

इस स्वतत्रता महायज्ञ मे कई वीरवर आए काम,
नाना धुधूपत, तातिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास गगन मे अमर रहेंगे जिनके नाम।
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,
बुदेले हरबोलो के मुह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

Poem On Veer Kunwar Singh 3 कुंवर सिंह पर कविता

कहते है एक उमर होती, दुश्मन से लड़ भिड़ जाने की
कहते हैं एक उमर होती, जीवन में कुछ कर जाने की।

लेकिन है ये सब लफ़्फ़ाज़ी, कोई उम्र नहीं कुछ करने की
गर बात वतन की आये तो, हर रुत होती है मरने की।

ये सबक हमे है सिखलाया, इक ऐसे राजदुलारे ने
सन सत्तावन की क्रांति में, जो प्रथम था बिगुल बजाने मे।

अस्सी की आयु थी जिसकी, पर लहू राजपूताना था
थे कुवर सिंह जिनको सबने, फिर भीष्म पितामह माना था।

जागीरदार वो ऊचे थे, अग्रेजों का मन डोला था
उस शाहाबाद के सिहम पर, गोरो ने हमला बोला था।

फ़रमान मिला पटना आओ, गोरे टेलर ने बोला था
पटना ना जाकर सूरा ने, खुलकर के हल्ला बोला था।

सन सत्तावन की जग अगर, इतनी प्रचड हो पाई थी
था योगदान इनका महान, जमकर हुड़दग मचाई थी।

नाना टोपे मगल पांडे, वो सबके बड़े चहेते थे
भारत माता की अस्मत के, सच्चे रखवाले बेटे थे।

चतुराई से मारा उनको, गोरे बर्षों कुछ कर ना सके
छापेमारी की शैली से, अंग्रेज फ़िरगी लड़ ना सके।

वन वन भटका कर लूटा था, सालो तक उन्ही लुटेरो को
है नमन तुम्हे हे बलिदानी, मारा गिन गिन अग्रेजो को।

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