Poems By Meera Bai In Hindi – मीरा बाई की रचनाएं व कविताएँ

Poems By Meera Bai In Hindi – मीरा बाई की रचनाएं व कविताएँ: शीर्ष भक्त कवयित्रियों में मीराबाई का नाम प्रमुखता से लिया जाता हैं. meera bai poems in hindi उनकी कविताओं को पद कहा जाता हैं 250 पदों को प्रमाणिक माना गया हैं. १५७३ में जोधपुर में चोकड़ी नामक गाँव में मीरा बाई का जन्म हुआ था.  आज के इस लेख में हम mirabai poem in hindi में उनकी रचनाओं तथा काव्य परिचय के बारे में विस्तार से  इस निबंध में जानेगे.

Poems By Meera Bai In Hindi

मीरा बाई की रचनाएं [Poems By Meera Bai In Hindi]

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mira bai poem in hindi: मीरां राजस्थान की ऐसी कवयित्री हैं जो अनेक कारणों से प्रसिद्ध रही हैं. उन्होंने अपने जीवनकाल में जो भी लिखा, वह आज भी विवाद का विषय बना हुआ हैं. मीरा बाई न क्या लिखा, कितनी रचनाएं प्रस्तुत कीं, इस विषय में विद्वान् एकमत नहीं हैं.

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mirabai poems in hindi मीरा बाई का कृतित्व

विद्वानों ने जिन रचनाओं को मीरा की रचना स्वीकार किया हैं, उन्हें तीन भागों में विभाजित किया गया हैं. पहले भाग में वे रचनाएं आती हैं जो टीका ग्रंथ हैं, दूसरें में प्रबंधात्मक रचनाओं को स्थान प्राप्त हैं और तीसरे में स्फुट पद या मुक्तक रचनाओं को स्थान प्राप्त हुआ हैं.

अब विचारणीय यह हैं की क्या ये रचनाएं मीरा बाई द्वारा रचित हैं या उन्हें मीरा के नाम से जोड़ दिया गया हैं. मीरा ने जिन रचनाओं के ऊपर जानकारी दी गई हैं. उनका संक्षिप्त विवेचन इस प्रकार हैं.

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टीका ग्रंथ– टीका ग्रंथ के अंतर्गत गीत गोविन्द की टीका उपलब्ध हैं जिसे मीरा द्वारा रचित माना गया हैं. उल्लेखनीय बात यह हैं की गीतगोविंद की टीका मीरा ने लिखी थी, इसका कोई विश्वसनीय और प्रमाणिक आधार नहीं हैं.

प्रबंधात्मक रचनाएँ– मीरा के नाम से जिन प्रबंधात्मक रचनाओं का उल्लेख किया जाता हैं, उनमें पांच रचनाओं के नाम लिए जाते हैं. नरसीजी को मायरो या माहिरो, सतभामानुरूशणु, रुक्मणी मंगल, नरसी मेहता नी हुण्डी और चरीत अर्थात चरित्र इस विषय में विद्वानों में मतभेद हैं. कुछ इसे मीरा बाई द्वारा रचित मानते हैं और कुछ इस मत का खंडन करते हैं. अधिकांश विद्वानों के मतानुसार  इसे मीरा बाई द्वारा रचित मानना तर्क संगत नहीं हैं.

सतभामानुरूशणु मीराबाई की रचना नहीं हैं. इसका कारण यह हैं की यदि भाषा को आधार बनाया जाए तो इसकी भाषा में और मीरा बाई की भाषा में पर्याप्त अंतर हैं. अनेक विद्वानों ने इसी आधार पर इसे मीरा के बहुत बाद की रचना माना हैं.

नरसी मेहता नी हुण्डी और रुखमणी मंगल– ये दोनों रचनाएं भी मीरा बाई के नाम के साथ जोड़ दी गई हैं. वास्तविकता यह हैं की ये मीरा के द्वारा रचित नहीं हैं. कोई ऐसा पुष्ट प्रमाण नहीं मिलता हैं जिनसे यह सिद्ध हो सके की ये रचनाएं हैं अथवा नहीं.

स्फुट पद– वास्तव में मीराबाई के नाम से जिन रचनाओं का अब तक उल्लेख किया गया हैं, वे मीरा की नहीं हैं, पर मीरा बाई की प्रमाणिक रचनाओं में उनके द्वारा रचित स्फुट पद अवश्य आते हैं. यह तो माना जा सकता हैं की मीरा बाई के पदों में बहुत से पद ऐसे हैं जो प्रक्षिप्त हैं और मीरा के नाम से जोड़ दिए गये हैं.

आज स्थिति बड़ी विकट हैं अब तो यह समस्या और विकट रूप लेकर सामने आ गई है कि जो पद मीरा के नाम से उपलब्ध हैं, उनमें से कौन से असली हैं और कौन से नकली. अतः आवश्यकता इस बात की हैं कि मीरा बाई की पदावली का एक प्रमाणिक और सुसम्पादिक संस्करण तैयार किया जाना चाहिए. निम्न दो मुख्य सिद्धांत हैं जिनको आधार मानकर ही मीरा की पदावली का विश्वसनीय व प्रमाणिक स्वरूप निश्चित किया जा सकता हैं.

  1. मीरा बाई सगुणउपासिका थी, इस बात को ध्यान में रखकर मीरा पदावली का प्रमाणिक पाठ उपलब्ध कराया जाना चाहिए.
  2. मीराबाई ने अपनी मूल पद रचना अपनी मातृगिरा तत्कालीन राजस्थानी या मारवाड़ी में ही की थी. इन दो तथ्यों को स्वीकार किये बिना मीरा पदावली का पाठालोचन चाहे कितना ही वैज्ञानिक विधि से क्यों न किया जाए, कभी निर्दोष और निर्विवाद नहीं हो सकता.

मीरा पदावली की विशेषताएँ

  1. मीरा बाई पदावली में माधुर्य भाव की भक्ति की प्रधानता हैं. अधिकांश पद ऐसे हैं जो यह प्रमाणिक करते हैं. कि मीरा कृष्ण के प्रेम में निमग्न रहती थीं और पल प्रतिपल उनके आगमन उनके दर्शन और मिलन के लिए उत्कठित रहती थीं.
  2. वह कृष्ण भक्त थी और कृष्ण भक्तिभाव में आकण्ठ निमग्न होने के कारण उन्होंने पदावली में स्थान स्थान पर कृष्ण के रूप सौन्दर्य उनकी बंकिम छटा आदि का उल्लेख तो किया ही है, उनके व्यवहार का भी वर्णन कर दिया हैं.
  3. मीरा बाई पदावली में जो पद हैं, उनसे यह प्रमाणित हो जाता हैं कि मीरा सगुण भक्त थी, कि मीरांबाई सगुण भक्त थीं. यदपि वे निर्गुण संतों से परिचित थीं, उनके मार्ग को भली भांति समझती थीं, इसलिए कहीं कहीं वह छाया भी देखने को मिलती है, किन्तु उसमें मीरा का मन रमा हुआ प्रतीत नहीं होता है. इसी आधार पर जब यह प्रश्न उठता है कि मीरा सगुण साधिका थीं या निर्गुण साधिका या उनके आराध्य सगुण थे या निर्गुण, तब उनके पदों को आधार बनाकर यही कहना उपयुक्त लगता हैं कि सगुण साधिका थीं और कृष्ण को ही अपना सर्वस्व और जीवनाधार मानती थीं.
  4. मीरा के पदों में प्रेम का उदात्त, परिष्कृत और समर्पणयुक्त रूप से देखने को मिलता हैं. जो विरह भावना मीरा के पद में व्यक्त हुई है, वह उनके पवित्र मन की पवित्र अभिव्यक्ति हैं.
  5. मीरा राजस्थान कवयित्री थीं इसलिए राजस्थान का जन जीवन, यहाँ के लोक विश्वास, रीती नीति, आचार विचार, शकुन, अप शकुन आदि को भी उनके पदों में स्थान प्राप्त हुआ हैं. राजस्थान के पर्व, उत्सव, तीज त्यौहार, होली आदि का वर्णन बार बार किया गया हैं. इससे यह सिद्ध होता है कि मीरा बाई के पद राजस्थानी जनजीवन के प्रतिबिम्ब हैं.
  6. मीरा के पदों में जिस शिल्प का प्रयोग हुआ है, वह सहज शिल्प है उसमें कहीं भी कृत्रिमता और आरोपण नहीं हैं.

निष्कर्ष– उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह सरलतापूर्वक कहा जा सकता है कि मीरा के नाम से विद्वानों ने कितनी ही रचनाओं को भले ही जोड़ दिया हो, किन्तु वे मीरा की प्रतीत नहीं होती हैं. मीरा द्वारा रचित प्रमाणिक पद तो वे ही हैं. जो मीरा पदावली के नाम से मिलते हैं. वास्तव में मीरा गितिकार थी, उन्होंने स्फुट या मुक्तक पदों की ही रचना की है, अतः पदावली ही उनकी प्रमाणिक रचना है और न तो उन्होंने कोई टीका ग्रंथ लिखा है और न कोई प्रबंधात्मक रचनाएं ही प्रस्तुत की हैं.

मीरा बाई की कृष्ण भक्ति – mirabai poems in hindi on krishna

मीरा की कृष्ण भक्ति- मीरा में कृष्ण के प्रति असीम अनुरक्ति थी, उसने अटूट निष्ठा के साथ स्वयं को भगवान कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया. वह रात दिन भगवान कृष्ण के चरणों में बैठी रहती तथा उनके भजन गाती रहती हैं. मीरा बाई की कृष्ण भक्ति की आध्यात्मिक यात्रा को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं, जो निम्नलिखित हैं.

कृष्ण प्राप्ति के लिए लालायित रहना – प्रथम सोपान में मीरा कृष्ण को प्राप्त करने के लिए लालायित रहती हैं. इस अवस्था में वह व्यग्रता से गा उठती हैं, मैं विरहणी बैठी जागूं जग सोवेरी आली और कृष्ण मिलन की तड़फ में बोल उठती हैं. दरसन बिन दुखण लागे नैन इस प्रकार प्रथम चरण में मीरा कृष्ण प्राप्ति के लिए अत्यधिक लालायित हैं.

कृष्ण भक्ति से उपलब्धियों की प्राप्ति- दूसरे सोपान में मीरा को कृष्ण भक्ति से उपलब्धियों की प्राप्ति हो जाती है और वह कहती हैं पायोजी मैं तो राम रतन धन पायो. मीरा के उदगार उसकी प्रसन्नता के सूचक हैं. और इसी तरंग में वह कह उठती हैं साजन म्हारे घर आया हो जुगा, जुगा री जोवता विरहणी पिय पाया हो.

आत्म बोध का ज्ञान– अंतिम सोपान में मीरा को आत्म बोध हो जाता है वो मीरा की भक्ति की चरम सीढी हैं. वह अपनी भक्ति में सख्य भाव से ओत प्रेत होकर कहती है म्हारे तो गिरधर गोपाल दूजो न कोई. मीरा इस अवस्था में अपने प्रियतम कृष्ण से मिलकर उसमें एका कार हो जाती हैं.

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