पूस की रात प्रेमचंद कहानियाँ हिंदी | Poos Ki Raat Munshi Premchand Story in Hindi

Poos Ki Raat Munshi Premchand Story in Hindi: हम आपका हार्दिक स्वागत करते हैं. प्रेमचंद कहानियाँ हिंदी में आज हम हिंदी के महान लेखक मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित पूस की रात कहानी को शोर्ट एवं कथा सार के रूप में आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं. यदि आप मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़ना पसंद करते है तो निश्चय ही यह मोरल स्टोरी आपकों बहुत पसंद आएगी. इसे आप पीडीऍफ़ के रूप में फ्री डाउनलोड कर बच्चों को पढ़ने के लिए भी दे सकते हैं.

Poos Ki Raat Munshi Premchand Story in Hindi

Poos Ki Raat Munshi Premchand Story in Hindi

प्रेमचंद हिंदी जगत के कथा सम्राट माने जाते हैं. आपने 1916-17 से कहानी लेखन के क्षेत्र में युगांतकारी परिवर्तन किया. इनके पूर्व रहस्य, रोमांच और  रोमांस की कहानियाँ लिखी जाती थीं, किन्तु प्रेमचंद मील के पत्थर साबित हुए उन्होंने कलात्मक कहा-नियाँ लिखकर हिंदी कहानी को स्थापित ही नहीं किया, अपितु भावी पीढ़ी को दिशा निर्देश भी दिया हैं.  उनकी  कहानियों  में सा-माजिक परिवेश और चरित्र चित्रण की जीवंतता को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैं.

तभी तो प्रेमचंद कथा साहित्य के पात्र पुस्तक बंद कर देने पर भी “दिल की किताब”  में खुले रहते हैं. इतना  ही  नहीं  प्रेमचंद  ने सशक्त, सजीव एवं सरल तथा स्वाभाविक भाषा हिंदी को प्रदान की. उनकी कहानियों की संख्या लगभग 300 है, जो आज मान सरोवर भाग 1- 8 तक पुस्तकों के रूप में संग्रहित हैं. इनके कथा साहित्य को तीन कालों में विभाजित किया जा सकता है प्रथम वर्णनात्मक, द्वितीय विकास और प्रौढ़काल जिसमें कहानीकार का झुकाव आदर्श से यथार्थ की ओर गया था, तृतीय पूर्ण उत्कर्ष काल की कहानियाँ.

अंतिम चरण की कहानियाँ आकार में लघु है, कितना प्रभाव में व्यापक हैं. जिसकी कोई सीमा नहीं हैं. इनमें यथार्थ जीवन, सामा जिक विवेचन, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण और अनुभूति की गहराइयों के दर्शन होते हैं. प्रारम्भ में जो कथा, संग्रह प्रकाशित हुए हैं, उनमें सप्तसरोज, प्रेम, पच्चीसी, प्रेम पूर्णिमा, प्रेम द्वादशी, प्रेमतीर्थ, प्रेमपियूष, प्रेमप्रसून, कफन आदि हैं. ग्रामीण और नगरीय जीवन की कोई स्थिति अछूती नहीं रही हैं. यही कारण है कि उनकी कहानियों में प्रत्येक वर्ग व समाज का प्रतिनिधित्व मिलता हैं. डॉ हजारी प्रसाद द्वेदी का इस सन्दर्भ में यह कथन समीचीन प्रतीत होता है यथा.

प्रेमचंद जी के अध्ययन से सारा उत्तरी भारत जाना जा सकता हैं. झोपड़ी से महलों तक, कस्बों से गाँवों तक, अमीरों से कृषक तक, पंचायतों से धारा सभाओं तक, समाज के प्रत्येक वर्ग के आचार विचार, रहन सहन, व्यवहार का परिचायक इनसे बड़ा कोई नहीं हैं. वस्तुतः प्रेमचंद ने कथा को जीवन से जोड़ा था. उनकी कहानियाँ पढ़ते समय हमारा परिवार समाज जीवंत हो उठता हैं.

वे स्वयं कहा करते थे कहानी जीवन के बहुत निकट आ गई हैं. उसकी जमीन अब उतनी लम्बी चौड़ी नहीं है, उसमें कई रसों कई चित्रों और कई घटनाओं का कोई स्थान नहीं रहा. वह अब केवल एक प्रसंग का, आत्मा की एक झलक का, सजीव स्पष्ट चित्रण है. अब उसमें व्याख्या अंश का कम और संवेदना का अंश अधिक रहता है. उनकी शैली भी अब प्रवाहमयी हो गई हैं. लेखक को जो कुछ कहना है, वह कम से कम शब्दों में बोलना चाहता हैं. वह अपने मनोभावों की व्याख्या करने नहीं बैठता, केवल उनकी ओर इशारा कर देता हैं.

अब हम कहानी का मूल्य उसके घुटन विचार से नहीं लगाते. हम चाहते है पात्रों की मनोगत स्थिति स्वयं घटनाओं की सृष्टि करें, खुलासा यह है कि आधुनिक गल्प का आधार अब घटना घटना नहीं, मनोविज्ञान की अनुभूति हैं. वस्तु विधान में प्रेमचंद प्रारम्भ, मध्य और अंत में सदैव सचेत रहे हैं. कहानी की विषय वस्तु कसावटपूर्ण होती हैं. मूल कथा के साथ अवांतर कथाएँ चलती रहती हैं. वे अंत में मूल कथा में समाहित हो जाती हैं. चरित्र चित्रण में भी वे सावधान रहे हैं.

डॉ लक्ष्मीनारायण लाल के शब्दों में उन्होंने जहा अपने प्रारम्भिक काल की कहानियों में व्यक्तित्व की अपेक्षा प्रचार को लिया तथा उनके मनोभावों की दुनियां में प्रवेश किया, वहां उत्कर्षकाल में आकर वे चरित्र के स्थान पर उनकी मनोवैज्ञानिक अनुभूति यों पर उतर आए. चरित्र विकास की दिशा में प्रेमचंद की प्रगति बाह्य जगत से अंतर्जगत की ओर थी और वे क्रमशः स्थूलता से मनोभावों की सूक्ष्मता की ओर गये हैं. प्रेमचंद की कहानियों में अनेक वर्गों, जातियों, स्वभाव संस्कार, व्यवस्था और मानसिक स्तर के पात्र हैं. वर्गगत विशेषताएं ही उनके चरित्र की मुख्याधार हैं.

प्रेमचंद की कहानियों की भाषा सरल एवं स्वाभाविक हैं. इनमें कहीं कहीं नाटकीय कथनोंपथनों से रोचकता आ गई हैं. वहां वे किसी मत या दृश्य विशेष को चित्रित करते हैं तो वहां भाषा चित्रात्मक एवं आलंकारिक बन पड़ी हैं. उनकी शैली में सूक्ष्मता, व्यंग्यात्मकता, संक्षिप्तता और वाक्पटुता के गुण विद्यमान हैं. अरबी, फ़ारसी और अंग्रेजी के शब्द भी मिल जाते हैं. मुहावरे दानी और रवानगी तथा चटपटापन एवं चुस्ती तो उनकी भाषा का प्राण हैं. देशकाल तथा वातावरण चित्रण में भी वे अनूठे है, स्थानीयता के रंग भरने में उन्हें सफलता मिली हैं. प्रेमचंद की कहानी कला की विशिष्टता है आदर्श और यथार्थ का उचित समन्वय. शुरू में वे आदर्शवादी थे, पर बाद में द्वंदात्मक भौतिकवादी जीवन की ओर उनका झुकाव बढ़ता गया.

पूस की रात मुंशी प्रेमचंद की लोकप्रिय हिंदी कहानी कथासार पीडीएफ

पूस की रात कृषक जीवन की करुण कथा कहती है. अभावों में पलने वाला किसान होड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी अपनी रोजी रोटी नहीं जुटा पाता. वह तो शोषणग्रस्त जीवन व्यतीत करने को बाध्य हैं. ऊपर से प्रकृति की मार उसे हताश कर देती हैं कप कपाती सर्दी उसे इतना उदासीन बना देती है कि खड़ी फसल को जानवरों से नहीं बचा पाता है और सर्दी से बचाव के लिए कुत्ते को ही गले लगाने के लिए विवश हो जाता हैं.

कहानी के प्रारम्भ में हल्कू सहना (बनिया) के रूपये देने को कहता है, किन्तु उसकी पत्नी मुन्नी कहती है कि तीनों रूपये दे दिए तो कम्बल कहाँ से आएगा और ठिठुरती रात में खेत की रक्षा कैसे होगी. वह फसल आने पर रूपयें लौटाने की बात कहती है, किन्तु हल्कू सोच में पड़ गया. सोंचा कि यदि उधारी नहीं चुकाई तो सहना झिडकिया देगी, गालिया बकेगी. पर फ़िक्र पूस की रातें काटने की भी थी.

जाड़े में बचाव कैसे होगा. पर सोंचा जाड़ों में मरेंगे तो मरेंगे, अभी तो बला टल जाएगी. वह खुशामद करके पत्नी से बोला, ला रूपये दे दे, गला तो छूटे. कम्बल के लिए कोई दूसरा उपाय करेंगे.

मुन्नी आँखे तरेरकर कहती है कि उपाय क्या होगा. कोई खेरत में रूपये देने से रहा. वह अपनी भड़ास निकालते हुए बोली न जाने यह उधार कब चुकता होगी. ब्याज पर ब्याज बनिया वसूल करता जाता है. मुन्नी अपने पति पर बरसती हुई कहती है कि खेती छोड़कर मजदूरी क्यों नहीं करते, कम से कम दो वक्त का पेट तो भरे.

ऐसी खेती से बाज आए. वह रूपये देने से इंकार कर देती है, पर हल्कू उदास होकर कहता है कि गालियाँ खाने से तो रूपये देना ठीक है. तब पत्नी ताक पर से रूपया लेकर दे देती हैं. हल्कू रूपये लेकर सहना को दे आता है, जो जमा किये थे, ताकि कम्बल खरीद सके, पर ऐसा नहीं हो सका.

शाम होते ही खेत की रखवाली के लिए निकल पड़ा. पूस की अँधेरी रात. साथ में जबरा कुत्ता भी चला आता हैं. खेत में पुराने गाढ़े खद्दर की एक चद्दर ओढ़ एक किनारे बैठ जाता हैं. काँपता रहता है खाट के नीचे कुत्ता जबरा कू कू कर रहा था. हल्कू कुत्ते से ही बतियाने लगा. वह बकने लगा घर में पुआल पर ही पड़ा रहता तो उसे सर्दी नहीं लगती, अब बैठकर रोए अपनी नानी को.

जबरे ने पड़े पड़े दुम हिलाई. हल्कू अपना हाथ निकालकर जबरे की पीठ पर फेरने लगा. और बोला कल साथ मत आना नहीं तो ठंड में ठंडे हो जाओगे. ठंड भगाने के लिए उठकर चिलम पीता हैं. सोचता है किसी तरह रात कटे आठ चिलम पी जाता हैं पर सर्दी थमने का नाम नहीं ले रही थी.

वह धनिकों के बारे में सोचता है जो मोटे मोटे गद्दों लिहाफ व कम्बल में लिपटे रहते है, उनके पास सर्दी फटकने का नाम नहीं लेती. जमींदार मजे करते है और मजूरी खेती उन्हें करनी पड़ती हैं. उस वक्त उसे जबरे का ही सहारा था. वह कुत्ता भी स्वामी के प्रति आत्मीयता दिखाते हुए अपने दोनों पंजे उसके घुटनों पर रख देता हैं. उसकी गर्म सांस जबरे को छूने लगती हैं. हल्कू किसी तरह सोने की कोशिश करता हैं.

पर जाड़े की अधिकता से घुटने छाती में समेट लेने पर भी कम्प कपी बंद नहीं होती हैं. जब किसी तरह रहा नहीं गया तो जबरे को धीरे से उठाया और अपनी छाती से चिपटा लिया. गोद में लेने पर कुत्ते की दुर्गन्ध आने लगी, किन्तु उसे छोड़ने का जी नहीं कर रहा था. जबरा भी समझ रहा था कि स्वर्ग यही है और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो कुत्ते के प्रति घ्रणा की गंध तक नहीं थी.

वह शायद अपनी ऐसी तत्परता से अभिन्न मित्र और भाई को गले नहीं लगाता. इस कुत्ते की आत्मीयता मैत्री ने मानों उसकी आत्मा के सब द्वार खोल दिए थे और उसका एक एक कण चमकने लगा. एक घंटा गुजर जाता हैं. तभी जबरा को किसी जानवर के आने की आहट हुई. वह दौड़ता, भौकता और फिर खेतों की ओर लौट जाता. मानों कर्तव्य उसके ह्रदय में अरमान की भांति उछल रहा था.

ज्यों ज्यों रात बढ़ती सर्दी की भयानकता भी बढ़ रही थी. हल्कू उठा बैठा, आकाश को ताकने लगा और सोचने लगा कि अभी रात बाकी हैं. आखिर उठकर आम के बगीचे से सूखी पत्तियां इकट्ठी करता हैं, अलाव जगाता हैं. कुत्ता भी दुम हिलाता हुआ पास आ बैठा. उसी समय हवा के झोके के साथ मेहँदी की गंध ने तरोताजा कर दिया. जबरा वही बैठा किसी हड्डी को निचोड़ने लगा.

थोड़ी देर तपने के बाद हल्कू ने टांग चौड़ी कर मानों सर्दी को ललकारा कि अब कर ले, जो करना हैं. ठंड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह गर्व से फूल उठा. पर कितनी देर तक, वे पत्तियां जलकर गर्माहट देती. थोड़ी देर तक वह जबरे के साथ खेलने लगा. अलाव के ऊपर कूदफांद करने के लिए जबरे को ललकारने लगा. पर आखिर यह खुशी थोड़ी सी देर में हवा हो गई. अब वहां राख की ढेरी लगी थी.

हवा का झोका आने पर तनिक आग झलक जाती, फिर ठंड पड़ने लगी, हल्कू ने चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा गीत गुनगुनाने लगा. पर ठिठुरन बढ़ती गई. जबरा फिर भौकने लगा. शायद खेतों में जानवर घुस आए थे. नील गायों का झुण्ड था. उनके कूदने फादने और नाज चबाने की ध्वनि आने लगी. पर हल्कू ने ध्यान नहीं दिया. मन को समझाने लगा कि जबरा के रहते जानवर नहीं आ सकते.

आवाजें तो उसके मन का भ्रम है, जबरा जोर जोर से भौकने लगा, पर हल्कू अपनी जगह से नहीं हिला. सर्दी ने उसे जकड़ लिया था, हिलना भी जहर के समान लगा. जानवर खेत चर रहे थे, हल्कू मन ही मन गालियाँ देता रहा, पर उठकर जानवरों को भगाने की हिम्मत नहीं हुई.

आखिर इरादा पक्का करके उठा, पर दो चार कदम चलते ही हवा का झोंका बिच्छू के डंक की तरह चुभने लगा. वह फिर बुझते अलाव के पास आ बैठा. राख कुरेद कर अपनी ठंडी देह को गर्माने लगा. जबरा गला फाड़ता रहा, नील गाएं खेत साफ़ करती रही पर हल्कू शांत बैठा रहा. अकर्मण्यता की रस्सी ने उसे जकड़ लिया. सारा खेत चौपट हो गया. सबेरे उसकी पत्नी पहुंची तो देखा हल्कू बेखबर सोया पड़ा हैं.

उसने हल्कू से आकर कहा सारे खेत का सत्यानाश हो गया. ऐसे भी कोई सोता है. पर हल्कू ने बहाना बनाया पेट में दर्द था, तुझे खेतों की पड़ी हैं. यहाँ मरते मरते बचा. दोनों खेत की डांड पर पहुंचे देखा सारा खेत रौंदा पड़ा हैं. खड़ी पकी फसल नष्ट हो गई. जबरा चित्त लेटा था मानों उसमें प्राण शेष नहीं हैं. मुन्नी उदास हो गई, मगर हल्कू इस बर्बादी पर भी खुश था कि अब रात में सर्दी से मरना नहीं पड़ेगा, खेत की रखवाली नहीं करनी पड़ेगी. वह पत्नी को दिलासा देता है कि अब वह मजदूरी करेगा.

पूस की रास कहानी का उद्देश्य

प्रेमचंद जी की कहानियों में ग्रामीण जीवन की झांकी देखने को मिलती हैं. पूस की रात में ग्राम्य जीवन के दर्शन होते हैं. यह एक परिवेश प्रधान कहानी हैं. सचमुच हमारी आँखों के आगे पूस की रात की कडकडाती ठंड का दृश्य इठलाने लगता हैं. कृषक वर्ग हाड़तोड़ मेहनत करता है किन्तु दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाता सर्दी वर्षा से बचाव नहीं कर पाता हैं. ऊपर से उधार देने वाले खून चूसते हैं.

ब्याज पर ब्याज के कारण किसान ता उम्रः ऋणमुक्त नहीं हो पाते. वे महाजनों व जमीदारों के चंगुल में फंसे रहते हैं. इस कहानी में ग्राम्य जीवन की दरिद्रता सहज पति पत्नी सम्बन्ध तथा महाजन की शोषकवृत्ति एवं कुत्ते से प्रगाढ़ सम्बन्ध आदि किसान की चरित्र रेखाओं को स्पष्ट रूप से अंकित कर देते हैं.

वस्तुतः कथा स्वाधीनता पूर्व की है, तब जमीदारी प्रथा  थी. मेहनत किसान करता और मजे उच्च वर्ग. कमोबेश हालात आज भी वैसी ही हैं. छोटे किसान आज भी कर्ज तले दबे रहते हैं. अब सेठ साहूकार और पूंजीपति वर्ग इनका शोषण करते हैं. रोटी कपड़े व कम्बल के लिए आज भी किसान तरसता हैं. अतः यह कहानी आजादी के इतने दशकों बाद भी प्रासंगिक हैं. प्रेमचंद दूरदर्शी थे, इन्होने सौ वर्ष बाद के भारत की दशा का अनुभव कर लिया था, तभी तो भारत के गरीब वर्ग की समस्या को चित्रित कर दिया हैं वे ग्रामीण मिट्टी की खाद थे, यह कह दिया जाए तो अनुचित न होगा.

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