भारत की आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबंध इन हिंदी | Present Education System In India Essay In Hindi

भारत की आधुनिक शिक्षा प्रणाली पर निबंध Present Education System In India Essay In Hindi: मॉडर्न यानी वर्तमान भारत की शिक्षा व्यवस्था कैसी है इसका स्वरूप इतिहास, व्यवस्थाएं क्या हैं. भारत में अंग्रेजी एवं स्कूली शिक्षा दोनों का प्रादुर्भाव अंग्रेजों के समय एक साथ ही हुआ था. flaws of education system in india today में आज हम जानेगे कि आधुनिक शिक्षा का महत्व अर्थ डिबेट बनाम प्राचीन शिक्षा व्यवस्था पीडीएफ अंतर गुण दोष की चर्चा करेगे.

Present Education System In India Essay In Hindi

Present Education System In India Essay In Hindi

भारत की आधुनिक शिक्षा प्रणाली (our education system today): भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की शुरुआत का श्रेय अंग्रेजों को जाता हैं. इसकी शुरुआत क्यों और कैसे हुई, यह जानने के लिए हमें भारत की प्राचीन काल से लेकर अब तक की स्थिति का आंकलन करना होगा. भारत में शिक्षा की शुरुआत वैदिक काल से मानी जाती हैंवैदिक काल में शिक्षा के लिए गुरुकुल व्यवस्था थी. बालक संसार के प्रलोभनों से दूर आमोद प्रमोद से विरक्त, शुद्धतापूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए गुरु की छत्रछाया में शिक्षा की समाप्ति तक रहता था.

शिक्षा प्रणाली का भारत में इतिहास (history of indian education system)

बौद्ध धर्म  के आविर्भाव के  साथ ही वैदिक काल का अंत एवं बौद्धकाल प्रारम्भ हुआ.  यहाँ  गुरु शिष्य परम्परा की अनूठी मिसाल हमे देखने को मिली.  शिक्षा के प्रति सब समर्पित रहते थे.  किन्तु ग्यारहवीं शताब्दी के बाद  मुस्लिम शासकों के आक्रमणों तथा उनके वर्चस्वस्थापित होने के फलस्वरूप पूरे देश में प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति का हास होने लगा एवं मुस्लिम शिक्षा का बोल बाला हो गया.

मुगल  शासकों ने अपने धर्म एवं संस्कृति के प्रचार के उद्देश्य से  शिक्षा में धर्म के वर्चस्व को बढ़ावा  दिया,  जिससे  समाज में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा मिला. इस काल में शिक्षा के केंद्र के रूप में काफी संख्या में मकतबों एवं मदरसों की स्थापना की गई. मुगलों के पतन के बाद भारत में ब्रिटिश शासकों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया और इसी के साथ यहाँ यूरोपीय शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत हुई.

भारत में पश्चिमी शिक्षा का प्रभुत्व (indian education system compared to foreign education system)

वैसे तो अंग्रेजों ने शासक के रूप में भारत में शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी समझते हुए सन 1781 में मुस्लिमों की उच्च शिक्षा के लिए कलकत्ता में मदरसा एवं 1791 में बनारस में संस्कृत कॉलेज की स्थापना की,  किन्तु यूरोपीय  शिक्षा व्यवस्था आरंभ करने के प्रयास में ब्रिटिश संसद के  सन 1813 में पारित चार्टर के बाद ही प्रारम्भ हुए.  इसके बाद वर्ष 1835 में लार्ड मैकाले के विवरण पत्र को स्वीकृति मिलने के साथ ही भारत में आधुनिक शिक्षा प्रणाली की नीव पड़ी.

लार्ड मैकाले की शिक्षा व्यवस्था (education system in india compared to abroad)

इसके बाद मैकाले के प्रस्तावों के आधार पर भारत में शिक्षा के विकास के प्रयास आरम्भ हो गये. शिक्षा के इस विकास को गति प्रदान करने के उद्देश्य से चार्ल्स वुड की अध्यक्षता में बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल की स्थापना हुई. वुड ने 1854 ई में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की. जिसे वुड्स डिस्पैच की संज्ञा  दी जाती हैं.  इस घोषणा पत्र में उसने लंदन विश्वविद्यालय  को आदर्श मानते हुए उच्च शिक्षा देने के लिए कलकत्ता, बम्बई एवं मद्रास में विश्वविद्यालयों की स्थापना करने का सुझाव दिया. इस तरह वुड्स डिस्पैच के फल स्वरूप भारत में आधुनिक शिक्षा की नींव मजबूत हुई और 1857 ई  में मद्रास, बम्बई एवं कलकत्ता में विश्वविद्यालय आरम्भ किये गये थे.

स्वतंत्रता के बाद भारत की शिक्षा प्रणाली (hindi essay on modern education system)

15 अगस्त 1947 यानी देश को  आजादी मिलने के  बाद शिक्षा सम्बन्धी  सुधारों के दृष्टिकोण से समय – समय पर कई शिक्षा आयोगों की नियुक्ति की गई. एवं उनके सुझावों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में सुधार एवं  परिवर्तन किये गये.  विश्वविद्यालय आयोग, माध्यमिक शिक्षा आयोग एवं भारतीय शिक्षा आयोग प्रमुख हैं.

भारतीय शिक्षा आयोग की संस्तुतियों के कार्यान्वयन के रूप में राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रस्ताव 1986 ई में पारित किया गया, 10+ 2+3 शैक्षिक ढाँचे की शुरुआत हुई, कार्यानुभव को स्कूल के पाठ्यक्रम में विशेष स्थान मिला, अध्यापकों के वेतनमान तथा सेवा शर्तों में सुधार हुआ एवं शिक्षा के व्यवसायीकरण को बल मिला. इसके बाद शिक्षा में समानता अर्थात किसी जाति  धर्म, वर्ग या  लिंग के आधार पर भेदभाव न करने की व्यवस्था की बात कहीं गई.

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था व निजीकरण (availability of education in india)

वास्तव में व्यावसायिक एवं तकनीकी शिक्षा आधुनिक शिक्षा प्रणाली की प्रमुख विशेषता हैं. प्राथमिक शिक्षा की आवश्यकता को देखते हुए शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के अंतर्गत  6 से 14  वर्ष आयु वर्ग वाले बच्चों को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान किया गया हैंकिन्तु भारत की जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही हैं उसे देखते हुए यह कहा जा सकता हैं कि शिक्षा की समुचित व्यवस्था केवल सरकार द्वारा किया जाना संभव नहीं हैं.इसी को ध्यान में रखते हुए शिक्षा के निजीकरण के प्रयास हुए हैं.

शिक्षा में निजीकरण और लाभ हानि (essay in hindi on modern education system)

शिक्षा के निजीकरण का अर्थ है शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के अतिरिक्त गैर सरकारी भागीदारी. वैसे तो ब्रिटिशकाल से ही निजी संस्थाएं शिक्षण कार्य में संलग्न थी,  किन्तु स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद  निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुदान एवं सरकारी सहायता के फलस्वरूप भारत में निजी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ सी आ गई हैं.

स्थिति अब ऐसी हो चुकी हैं कि इस पर अंकुश लगाने की आवश्यकता महसूस की जा रही हैं. क्योंकि अधिकतर निजी शिक्षण संस्थाएं धन कमाने का केंद्र बनती जा रही हैं. एवं इनके द्वारा छात्रों एवं अभिभावकों का शोषण हो रहा हैं. शिक्षा के निजीकरण के यदि कुछ गलत परिणाम सामने आए हैं तो इससे लाभ भी निश्चित तौर पर हुआ हैं.इसके कारण शिक्षा के प्रसार में तेजी आई हैं. शिक्षित लोगों को इसके जरियें रोजगार के साधन उपलब्ध हुए हैं एवं शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हुआ हैं.

भारतीय शिक्षा प्रणाली में सुधार (education system needs change)

चूँकि समाज एवं देश में समय के अनुसार परिवर्तन होते रहते हैं इसलिए शिक्षा के उद्देश्यों पर भी समय के अनुसार परिवर्तन होते हैं. उदाहरण के लिए वैदिक काल में वेदमंत्रों की शिक्षा को ही पर्याप्त मान लिया जाता था. किन्तु वर्तमान काल में मनुष्य के विकास के लिए व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जाता है. वर्तमान समय में कंप्यूटर की शिक्षा के बिना मनुष्य को लगभग ही अशिक्षित माना जाता हैं क्योंकि दैनिक जीवन में अब कंप्यूटर का प्रयोग बढ़ा हैं.

इस समय शिक्षा द्वारा उत्पादकता बढ़ाने सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकीकरण करने, भारत का आधुनिकरण करने तथा नैतिक सामाजिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करने के लिए आधुनिक शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है. वर्तमान की शिक्षा प्रणाली में पारम्परिक एवं सैद्धांतिक  पाठ्यक्रम की अधिकता हैं.  इसके स्थान पर आधुनिक एवं प्रायोगिक पाठ्यक्रम को समुचित स्थान दिया जाना चाहिए, साथ ही इसे अधिक रोजगारोन्मुखी बनाएं जाने की भी जरूरत हैं.

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