Rajasthan Culture In Hindi | राजस्थानी संस्कृति परम्परा एवं विरासत

Rajasthan Culture In Hindi:  राजस्थानी संस्कृति हिंदी में Culture of Rajasthan राजस्थानी संस्कृति एक बहती नीरा है, जो गाँव गाँव ढानी, चौपाल, पनघट, महल, झौपड़ी, किले, गढ़ी खेत खलिहान में बहती हुई जन जन रुपी सागर के संस्पर्श से इंद्रधनुषीयछटा बिखेरती हैं. और अपनी महक के साथ पर्व, मेले, तीज त्योहार, नाट्य, नृत्य, श्रृंगार पहनावा, रीती रिवाज, आचार व्यवहार आदि में प्रतिबिम्बित होती हैं.

तथा जिसे रेत के धोरों के साथ साथ वायुमंडल, वसुंधरा तथा रोम रोम में उल्लसित एवं तरंगित अनुभूत किया जा सकता हैं. राजस्थानी संस्कृति समष्टिगत, समन्वयात्मक एवं प्राचीन हैं. भौगोलिक विविधता एवं प्राकृतिक वैभव ने इसे और आकर्षक बनाया हैं. वस्तुतः राजस्थानी संस्कृति लोक जीवन को प्रतिनिधित्व करने वाली संस्कृति हैं.Rajasthan Culture In Hindi

Rajasthan Culture In Hindi | राजस्थानी संस्कृति परम्परा एवं विरासत

पधारों म्हारे देश के निमंत्रण की संवाहक राजस्थानी संस्कृति सांसकृतिक पर्यटन की पर्याय हैं. तैतीस जिलों को अपने आंचल में समेटे राजस्थान की धरती सांस्कृतिक परम्पराओं का अनूठा मिश्रण प्रस्तुत करती हैं. राजस्थान की सांस्कृतिक परम्पराएं विरासत से जुड़े स्थल, प्रकृति एवं वन्यजीव की विविधता तथा दैदीप्यमान इतिहास पर्यटक के खुला आमंत्रण हैं. सम्रद्ध लोक संस्कृति के परिचायक तीज त्योहार उमंग के प्रतीक मेले, आस्था और विश्वास के प्रतीक लोक देवता, फाल्गुन की मस्ती में नृत्य करती आकर्षक परिधान से युक्त महिलाएं पर्यटकों को चमत्कृत करने के लिए पर्याप्त हैं. Rajasthan Culture.

धरती धोरा री की झिलमिलाती रेत एवं गूंजता सुरीला लोक संगीत पर्यटक को अभिभूत करने वाला होता हैं. राजस्थान की संस्कृति एवं परम्परा की मुख्य बात यह है कि राजस्थान के जनमानस की विशालता ने जिस प्रकार सभी मान्यताओं और आस्थाओं को फलने फूलने दिया, उसी प्रकार उनके अनुयायियों के साथ भ्रात भाव रखा. अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह विश्वभर के श्रद्धालुओं का आस्था एवं विश्वास का केंद्र हैं.

राजस्थान की संस्कृति का इतिहास व परिचय Essay On Rajasthan Culture Gk

जिसमें न धर्म की पाबंदी है न जाति की, न देश की न, सम्प्रदाय की. हिन्दू मुसलमान, सिक्ख एवं अन्य धर्मावलम्बियों द्वारा दरगाह पर अकीदत फूल चढ़ाते हैं, मनौतियाँ मानते हैं. सूफीमत के संदेशवाहक ख्वाजा साहब के दरबार की दरबार के प्रखर कव्वाल और गायक थे. शंकर शम्भु कव्वाल. आज अजमेर सूफी मत का अंतर्राष्ट्रीय प्रमुख तीर्थ हैं. पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले के नाकौड़ा भैरव जैनियों के पूजनीय है ही परन्तु सनातनियों के मान्य भी हैं.

मेवाड़ के केसरियाजी जैनियों के मान्य है और सनातनियों के भी हैं. यही स्थिति उन लोक देवताओं की हैं. जिन्होंने वहां के सुदूर अंचलों में स्थित आदिवासियों, जनजातियों एवं किसानों को सदियों से आस्था के सूत्र में बांधे रखा. रुणिचा में चिर समाधि में लीन रामदेव, जिस प्रकार हिन्दुओं के रामदे है उसी प्रकार मुसलमानों के भी रामसा पीर हैं. आज भी बाबा रामदेव उत्तर भारत के प्रमुख पूजनीय देवताओं में से एक हैं.

Information About Rajasthan Culture In Hindi

पाबूजी राठौड़ की गोरक्षा हेतु प्राणहुती सम्बन्धी लोक गाथा लाखों को भाव विभोर करती हैं. लोक गायकों के द्वारा पाबूजी की फड़ को गेय में बांचने की प्रथा मध्यकाल से चली आ रही हैं. राजस्थान के मध्यकालीन संतों एवं उनके अनुयायियों द्वारा स्थापित मठों, रामद्वारों, मेलों, समागमों तथा यात्राओं के माध्यम से सांस्कृतिक एवं भावनात्मक एकता के यशस्वी प्रयास का सूत्रपात हुआ.

संतों की मानव कल्याण की कामना तथा प्रेमाभक्ति के सिद्धांतों ने यहाँ के समाज में भावनात्मक एकता के आयाम के नए पटल खोले हैं. मन मिलाने का जो प्रयास संतों द्वारा जिस सहजता से किया गया वह स्तुत्य है और यहाँ की संस्कृति की पहचान हैं. राजस्थानी लोग अपनी संस्कृति और परम्परा पर गर्व करते हैं. उनका दृष्टिकोण परम्परागत हैं. यहाँ साल भर मेलों एवं पर्व त्योहारों का ताँता लगा रहता हैं.

Rajasthan Culture & Art In Hindi

यहाँ एक कहावत प्रसिद्ध हैं. सात वार नौ त्योहार. राजस्थान के मेले और पर्व त्योहार रंगारंग एवं दर्शनीय होते हैं. ये पर्व त्योहार लोगों के जीवन उनकी खुशियाँ और उमंग के परिचायक हैं. प्रायः इन मेलों और त्योहारों के मूल में धर्म होता है, लेकिन इनमें से कई मेले और त्योहार अपने सामाजिक और आर्थिक महत्व के परिचायक हैं. मनुष्य और पशुओं की अंतनिर्भरता को दर्शाने वाले पशुमेले राजस्थान की पहचान हैं.

पुष्कर का कार्तिक मेला, परबतसर और नागौर के तेजाजी का मेला, जो मूलतः धार्मिक हैं. राज्य के बड़े पशु मेले माने गये हैं. राजस्थान में तीज को त्योहारों में पहला स्थान दिया गया हैं. राजस्थान में एक कहावत प्रसिद्ध हैं. तीज त्योहारा बावरी ले डूबी गणगौर. इसका अर्थ है कि त्योहारों के चक्र की शुरुआत श्रावण महीने की तीज से होती हैं. तथा साल का अंत गणगौर के साथ होता हैं. गणगौर धार्मिक पर्व होने के साथ ही राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं. तीज, गणगौर जैसे पर्व महिलाओं के महत्व को भी रेखांकित करते हैं.

Culture Of Rajasthan History in hindi राजस्थान का इतिहास हिंदी में

राजस्थान में पुरा संपदा का अटूट खजाना हैं. कहीं पर प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की छटा है तो कहीं हड़प्पा संस्कृति के पूर्व के प्रबल प्रमाण एयर कहीं प्राचीनकाल में धातु के प्रयोग के साक्ष्य, कहीं गणेश्वर का ताम्र वैभव तो कहीं प्रस्तर प्रतिमाओं का इतिहास कहीं मरणमूर्तियों और म्रदभांडों से लेकर धातु प्रतिमानों तक का शिल्पशास्त्र बिखरे पड़े हैं. उपासना स्थल, भव्य प्रासाद, अभेद्य दुर्ग एवं जीवंत स्मारकों का संगम आदि राजस्थान के कस्बों, शहरों एवं उजड़ी बस्तियों में देखने को मिलता हैं.

आमेर, जयपुर, जोधपुर, बूंदी, उदयपुर, शेखावटी के मनोहारी विशाल प्रासाद तथा रणकपुर, ओसियां, देलवाड़ा, झालरापाटन के उत्कृष्ट कलात्मक मंदिर और जैसलमेर की पटवों की हवेलियाँ इत्यादि ऐसे कुछ प्रतीक हैं, जिन पर राजस्थान कलाकारों के हस्ताक्षर हैं.

राजस्थान के ख्यातनाम दुर्गों में चित्तौड़, जैसलमेर, रणथम्भौर, गागरोन, जालौर, सिवाना तथा भटनेर का दुर्ग ऐतिहासिक दृष्टि से प्रसिद्ध रहे हैं. इनके साथ शूरवीरों के पराक्रम, वीरांगनाओं के जौहर की रोमांचक गाथाएं जुड़ी हुई हैं, जो भारतीय इतिहास की अनमोल धरोहर हैं. राजस्थान के जनमानस को ये दुर्ग और इनसे जुड़े आख्यान सदा से ही प्रेरणा देते आए हैं. वीरता एवं शौर्य के प्रतीक ये गढ़ और किले अपने अनूठे स्थापत्य, विशिष्ठ सरंचना, अद्भुत शिल्प एवं सौन्दर्य के कारण दर्शनीय हैं.

राजस्थान के दर्शनीय स्थल, चित्रकला व शैलियाँ

राजस्थान की चित्रशैलियाँ भी इसके वैभव का प्रमाण है. बूंदी, नाथद्वारा, किशनगढ़, उदयपुर, जोधपुर, जयपुर आदि राजस्थान की चित्रकला के रंगीन पृष्ट हैं. जिनमें श्रृंगारिकता के साथ साथ लौकिक जीवन की सशक्त अभिव्यक्ति हुई हैं. राजस्थानी शैली गुजराती एवं जैन शैली के तत्वों को अपने में समेटकर मुगल शैली में समन्वित हुई हैं.

राजस्थान के वीर तथा वीरांगनाओं ने जहाँ रणक्षेत्र में तलवारों का जौहर दिखाकर विश्व इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया हैं, वहीँ भक्ति और आध्यात्मिक क्षेत्र क्षेत्र में भी राजस्थान पीछे नहीं रहा हैं. यहाँ मीरा एवं दादू भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत रहे हैं. भक्ति गीतों में जहाँ एक ओर लोकतांत्रिक मूल्यों को प्रतिष्ठा मिली है वही व्यक्ति स्वातंत्र्य का स्वर फूटा और लोकपरक सांस्कृतिक चेतना उजागर हुई हैं.

राजस्थान के मेले व उत्सव पर्व Rajasthan Culture Ki Jankari

इस जनचेतना का परिपाक हमें राजस्थान के मेलों और त्योहारों में दिखाई देता हैं. यहाँ के मेलों और त्योहारों के आयोजन में सम्पूर्ण लोकजीवन पूरी सक्रियता के साथ शामिल होकर अपनी भावनात्मक आस्था का परिचय देता हैं. लोकनृत्य राजस्थानी संस्कृति के वाहक हैं. यहाँ के लोकनृत्यों में लय, ताल, गीत, सूर आदि का एक सुंदर और संतुलित सामजस्य देखने को मिलता हैं. गेर, चंग, गीदड़, घूमर, ढोल आदि नृत्य राजस्थान के जनजीवन की संजीवनी बूटियां हैं. इस बूटी की घूंटी को लेकर राजस्थान के जनजीवन और लोकमानस ने भूखा नंगा रहते हुए भी मस्ती और परिश्रम से जीना सीखा हैं.

यह दोहराने की आवश्यकता नहीं है कि राजपूताने में अनेक वीर, विद्वान् एवं कुलाभिमानी राजा, सरदार आदि हुए. जिन्होंने अनेक युद्धों में अपनी आहुति देकर अपनी कीर्ति को अमर बना दिया. राजपूत जाति की वीरता विश्व प्रसिद्ध हैं. चित्तौड़, कुम्भलगढ़, मांडलगढ़, अचलगढ़, रणथम्भौर, गागरोन, भटनेर, बयाना, सिवाणा, मंडोर, जोधपुर, जालौर, आमेर आदि किलो तथा अनेक प्रसिद्ध रणक्षेत्रों में कई बड़े बड़े युद्ध हुए, जहाँ अनेक वीर राजपूतों ने वहां की मिट्टी का एक एक कण अपने रक्त से तर किया.

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