राजस्थान का एकीकरण एवं इसके 7 चरण | Rajasthan Ka Ekikaran In Hindi

राजस्थान का एकीकरण एवं इसके 7 चरण | Rajasthan Ka Ekikaran In Hindi

ऐतिहासिक दृष्टि से राजस्थान का विशेष महत्व रहा है. राजस्थान के विभिन्न यशस्वी शासकों ने मध्यकाल में आक्रान्ताओं के विरुद्ध न केवल राजनितिक प्रतिरोध को जिन्दा रखा अपितु गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा को भी अक्षुण्ण बनाए रखने का कार्य किया. स्वतंत्रता के समय अजमेर मेरवाड़ा को छोड़कर पूरा राजस्थान रियासतों में बटा हुआ था. भारत की स्वतंत्रता (15 अगस्त 1947) के समय राजस्थान में 19 रियासतें, 3 ठिकानें व एक केन्द्रशासित प्रदेश था. एक नजर राजस्थान का एकीकरण एवं इसके विभिन्न चरणों पर.राजस्थान का एकीकरण

राजस्थान का एकीकरण (Rajasthan integration In Hindi)

उस समय राजस्थान राज्य की जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर आदि प्रमुख रियासतों की सीमाएं नवस्थापित पाकिस्तान से लगती थी और पाकिस्तान द्वारा इन देशी राजाओं को अनेक प्रलोभन भी दिए जा रहे थे कि वे अपना विलय पाकिस्तान में करे.

इसलिए राजस्थान की इन रियासतों का विलय अत्यंत संवेदनशील मामला था, जिसे लौहपुरुष सरदार पटेल ने कुशलतापूर्वक पूरा किया. राजस्थान के एकीकरण एवं इसके वर्तमान स्वरूप में लाने का कार्य लगभग 8 वर्ष 7 माह में 7 चरणों में पूरा हुआ.

मत्स्य संघ राजस्थान एकीकरण का पहला चरण-(matsy sangh)

राजस्थान एकीकरण के प्रथम चरण में मत्स्य संघ का निर्माण हुआ. अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली व नीमराणा का क्षेत्र भौगोलिक समानता लिए हुए था. अतः इनको मिलाकर संघ बनाने का प्रस्ताव रखा गया. इसका नाम मत्स्य संघ रखा गया.

जो महाभारत काल में उस क्षेत्र का नाम था. 18 मार्च 1948 को इस संघ का केन्द्रीय मंत्री एन वी गाडगिल ने उद्घाटन किया. धौलपुर शासक को राजप्रमुख तथा शोभाराम को इसका प्रधानमंत्री बनाया. अलवर को मत्स्य संघ की राजधानी बनाया गया.

पूर्वी राजस्थान (राजस्थान एकीकरण का दूसरा चरण)-Eastern Rajasthan

इस दूसरे चरण में 9 रियासतों यथा बाँसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, कोटा, बूंदी, झालावाड़, किशनगढ़, शाहपुरा और टोंक को मिलाकर पूर्वी राजस्थान का गठन किया गया.

जिसका उद्घाटन 25 मार्च 1948 को गाडगिल ने किया. कोटा के शासक को राजप्रमुख व गोकुल लाल असावा को प्रधानमंत्री नियुक्त किया. कोटा को पूर्वी राजस्थान की राजधानी बनाया गया.

संयुक्त राजस्थान (एकीकरण का तीसरा चरण)-Joint rajasthan

मेवाड़ महाराणा पूर्वी राजस्थान के गठन से पूर्व ही विलय के लिए तैयार थे. 11 अप्रैल 1948 को मेवाड़ ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर लिए. पूर्वी राजस्थान में मेवाड़ को मिलाकर संयुक्त राजस्थान का गठन हुआ, जिसका उद्घाटन 18 अप्रैल 1948 को पंडित जवाहरलाल नेहरु ने किया.

मेवाड़ के महाराणा भूपाल सिंह को राजप्रमुख व माणिक्यलाल वर्मा को प्रधानमंत्री बनाया गया. उदयपुर को संयुक्त राजस्थान की राजधानी बनाया गया.

वृहत राजस्थान (राजस्थान एकीकरण का चौथा चरण)-Large rajasthan

मेवाड़ के विलय के बाद शेष राज्यों का विलय आसान हो गया. चौथे चरण में जयपुर, जोधपुर, बीकानेर व जैसलमेर जैसी बड़ी और महत्वपूर्ण रियासतों का विलय कर वृहत राजस्थान का निर्माण हुआ.

30 मार्च 1949 को सरदार पटेल ने वृहत राजस्थान का उद्घाटन किया. मेवाड़ के महाराणा भूपालसिंह को महाराजप्रमुख व हीरालाल शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाया गया. जयपुर को राजधानी घोषित किया गया. एकीकरण का यह सबसे महत्वपूर्ण चरण होने के कारण ही 30 मार्च को राजस्थान दिवस के रूप में मनाया जाता है.

संयुक्त वृहत राजस्थान (एकीकरण का पांचवा चरण)-Joint large rajasthan

इस सारी प्रक्रिया के बिच मत्स्य संघ स्वतंत्र रूप से कार्य कर रहा था. लेकिन उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती होने के कारण इसके बारे में फैसला करना आवश्यक था. इसलिए 15 मई 1948 को मत्स्य संघ का वृहत राजस्थान में विलय कर संयुक्त वृहत राजस्थान का गठन किया गया. व शोभाराम शास्त्री को मंत्रीमंडल में शामिल किया गया.

राजस्थान संघ (एकीकरण का छठा चरण)-Rajasthan Union

विलय के इतने चरणों के पश्चात सिरोही के प्रश्न का समाधान करना शेष था. उसका विलय राजस्थान में किया जाए अथवा तत्कालीन बम्बई प्रान्त में शामिल किया जाए. 26 जनवरी 1950 को सिरोही की दो तहसील आबू व देलवाड़ा को बम्बई राज्य में और शेष सिरोही को राजस्थान राज्य में मिलाया गया.

सिरोही की जनता दोनों तहसीलों का भी राजस्थान में ही विलय चाहती थी. अतः इस प्रकरण को राज्य पुनर्गठन आयोग को सौप दिया.

वर्तमान राजस्थान का निर्माण (राजस्थान एकीकरण का सातवाँ चरण)-Current Rajasthan

ब्रिटिश काल में अजमेर मेरवाड़ा एक केन्द्रशासित प्रदेश था. अतः 1956 तक यह ग श्रेणी का स्वतंत्र राज्य बना रहा. अतः राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिश पर इस क्षेत्र का भी राजस्थान में विलय कर दिया गया. साथ ही आयोग की सिफारिश पर आबू व देलवाड़ा को भी राजस्थान में मिलाया गया.

मध्यप्रदेश से लगी हुई सीमा का भी पुनः निर्धारण किया गया. मध्यप्रदेश के सुनेलटप्पा को राजस्थान में तथा राजस्थान के सिरोज को मध्यप्रदेश में मिलाया गया.

परिणामस्वरूप 1 नवम्बर 1956 को राजस्थान का एकीकरण पूर्ण हुआ. राजप्रमुख का पद समाप्त कर दिया गया व राज्य के प्रथम राज्यपाल के रूप में गुरुमुख निहालसिंह को शपथ दिलाई गई.

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