Rajasthani Kavita : खेजड़ी पर कविता और उनका सार

Rajasthani Kavita शीर्षक की यह रचना राजस्थानी भाषा में हैं, राजस्थान के राज्य वृक्ष को कई धार्मिक कार्यो में खेजड़ी का बड़ा महत्व माना जाता हैं. जड़ी रेतीले प्रदेश की जीवनरेखा समझा जाता हैं, इसके उपकार बहुत बड़े हैं. इस मरु प्रदेश में थका हारा मार्गपंथी हो या खेत में काम करने वाला किसान एंव मजदूर. जब भी काम करके थक जाते हैं तो खेजड़ी ही उनका सहारा होती हैं. इसकी ठंडी छाव में बैठकर खेजड़ी को धन्य मानता हैं. लीजिए पढ़ते हैं खेजड़ी पर ये बेहतरीन हिंदी कविता.

Rajasthani Kavita (खेजड़ी)

मरुधर माही थने नमे सब, ढाणी मजरा गाँव खेजड़ी !

किया बखानु थारी माया, धन धन थारी छाव , खेजड़ी !

 

खड़ी एकली थू मदमाती |

कैर बोरडी थारा साथी ||

धोरा में तू किकर जीवै ?

कियाँ रेत में तू खावै पीवै ?

कोसाँ ताईं नजर ना आवै,जल रो कोई ठाँव, खेजड़ी !

तो भी बारह मॉस हरी थू धन धन थारी छाँव खेजड़ी !

नित रा ओल्युं दोलयु थारे |

काला हिरण कुलांचा मारै |

मोर कमेड़ी , कुरजा बोले |

गोडावण रा जोड़ डोले ||

 

कदे डाल पे कोयल कुके ,करै कांगला कांव , खेजड़ी !

ऊट पातड़ा खा अरडावे, धन-धन थारी छाँव,

 

स्यालो और उनालो झेले |

आंधी और दुगट सू खेले |

लू री लपटा लावा लेवे |

पण थू उफ़ | तक कोनी केवे ||

म्हा लोगां रा, जूता तक में, दाझण लागे पाँव, खेजड़ी !

पंथी रुक बिसराम करे हैं, धन धन थारी छाँव खेजड़ी !!

Rajasthani Kavita KHEJDI Meaning In Hindi

हे खेजड़ी, राजस्थान की रेतीली धरती के ढाणी मजरे और गाँव के सभी लोग तुझको नमस्कार करते हैं| मै तेरी महिमा की व्याख्या कैसे करू ?

हे खेजड़ी ! तू धन्य हैं, तेरी छाया धन्य हैं.

तू अकेली अपनी मस्ती में खड़ी हैं और कैर तथा बेर के पेड़ तेरे साथी हैं, पर यह समझ नही आता कि रेतीले धोरों में जीवित कैसे रहती हैं. तथा वंहा रेत में क्या खाती और पीती हैं ? हे खेजड़ी रेत के धोरों में कोसो दूर तक खी पानी का स्थान नही दिखाई देते हैं. इसके बावजूद तू वर्ष के बारह महीने हरी रहती हैं, हे खेजड़ी तू धन्य हैं तेरी छाँव धन्य हैं.

Rajasthani Kavita खेजड़ी का हिंदी में सार आप hihindi.कॉम पर पढ़ रहे हैं.

रोजाना तेरे आस-पास में काले हिरण कुलांचे भरते हैं, मोर कमेड़ी तथा कुरजा नाम के पक्षी बोलते हैं और गोडावण पक्षी के जोड़े घूमते हैं | हे खेजड़ी तेरी डाली पर कभी तो कोयल कुहुकती हैं और कभी कौए कांव-कांव करते हैं, ऊट तेरे पत्ते खाकर आवाज करते हैं.

तुम सर्दी और गर्मी सहती हो, तो कभी धुल भरी आंधियो और रेत के गुब्बार से खेलती हो. तेजी से चलती लू की लपटे तुम्हारी बलैया लेती हैं. लाड़ लड़ाती हैं, पर तुम इतनी सहनशील हो कि इतनी गर्मी को झेलते हुए भी उफ़ तक नही करती हो |

हे खेजड़ी|लू और गर्मी से जुते में हमारे पाँव जलने लगते हैं | तुम्हारी छाया में राहगीर कुछ देर ठहरकर आराम करते हैं | हे खेजड़ी तू धन्य हैं तेरी छाया धन्य हैं |

खेजड़ी का महत्व

खेजड़ी को वर्ष 1983 में राजस्थान का राज्य वृक्ष घोषित किया गया था. इसे थार का कल्पवृक्ष, जांटी, शमी भी कहा जाता हैं. खेजड़ी का वैज्ञानिक नाम Prosopis cineraria हैं. वैसे तो यह वृक्ष पुरे राजस्थान में पाया जाता हैं, लेकिन राजस्थान के पश्चिम इलाकों में अधिक पाया जाता हैं.

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