राणी सती मंदिर झुंझुनू का इतिहास | Rani Sati Temple Jhunjhunu History In Hindi

राणी सती मंदिर झुंझुनू का इतिहास | Rani Sati Temple Jhunjhunu History In Hindi: राजस्थान के प्रसिद्ध देवी मन्दिरों में झुंझुनू शहर में स्थित दादी सती का मंदिर विशेष उल्लेखनीय हैं. माँ नारायणी इनका वास्तविक नाम हैं. भक्तों के संकट हरने वाली देवी सती के भारत में कई मंदिर हैं जिनमें मुख्य एवं सबसे बड़ा मंदिर झुंझुनू जिले में ही स्थित हैं. हम माता रानी के इतिहास, कहानी और मंदिर के बारें में विस्तार से पढेगे.

Rani Sati Temple Jhunjhunu History In Hindi

Rani Sati Temple Jhunjhunu History In Hindi

History Of Rani Sati Sadi Jhunjhunu In Hindi: झुंझुनू शहर के मध्य में स्थित राणी सती का 400 साल पुराना जिले का सबसे बड़ा धार्मिक एवं पर्यटन स्थल हैं. दूर से देखने पर विशाल क्षेत्र में बना यह मंदिर एक राजमहल की तरह प्रतीत होता है. सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण संगमरमर के पत्थरों की कटाई करके बनाया गया हैं. जिसकी दीवारों पर सुंदर पेंटिंग तथा मंदिर प्रांगण में जल विद्युत् के फव्वारे बने हुए हैं. यहाँ प्रत्येक शनिवार तथा रविवार के दिन में मंदिर में विशेष भीड़ देखने को मिलती हैं.

विशेषकर शेखावटी क्षेत्र में राणी सती को नारी के सम्मान, ममता, नारी शक्ति व अस्मिता का प्रतीक माना जाता हैं, राज्य से ही नहीं देश के अलग अलग शहरों से बड़ी संख्या में भक्त आकर माँ के चरणों में शीश नवाते हैं. मंदिर में भादों की अमावस्या तिथि को विशेष पूजा एवं भक्ति कार्यक्रम चलते हैं. इस दिन बड़ा मेला भरता हैं.

“जगदंबा जग तारिणी, रानी सती मेरी मात|
भूल चूक सब माफ़ कर, रखियो सिर पर हाथ||”

रानी सती के झुंझुनू मंदिर में कई हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियाँ मंदिर बने हुए हैं. मंदिर परिसर में भगवान शिव, मैया पार्वती, गणपति, राम, सीता, लक्षमण और हनुमान जी की सुंदर मूर्तियाँ बनी हुई हैं. यहाँ एक आकर्षक षोडश माताजी का मंदिर भी हैं जिसमें सोलह देवियों की प्रतिमाएं स्थापित हैं. मंदिर परिसर के इन देवस्थानों में एक मंदिर भगवान लक्ष्मीनारायण का भी हैं.

ऐसी मान्यता है कि राणी सतीजी नारी शक्ति के प्रतीक में मैया दुर्गा की अवतार थी. जिन्होंने आज से चार सौ साल पहले अपने पतिदेव के हन्ता को मारकर जीवित समाधि ली थी. आर्थिक साधनों की दृष्टि से सती मंदिर की गिनती देश के समृद्ध मन्दिरों में की जाती हैं. मंदिर ट्रस्ट राज्य में प्रतिबंधित सती प्रथा का विरोध करता हैं. ट्रस्ट द्वारा मंदिर परिसर की दीवारों पर स्पष्ट रूप से लिखा गया हैं, कि हम सती प्रथा का प्रतिकार करते हैं.

दिन की दो पारियों में मंदिर की पूजा होती हैं. सुबह 5 बजे से दोपहर एक बजे तक मुख्य मंदिर दर्शन के लिए खुला रहता हैं, शाम के समय 3 बजे से रात 10 बजे तक भक्त माताजी के दर्शन करते हैं. मुख्य कार्यालय सवेरे 9 बजे से सायंकाल 8 बजे तक खुला रहता हैं.

Rani Sati Temple

बाहर से आने वाले यात्रियों के ठहरने के लिए मंदिर परिसर में ही विश्राम लक्ष बने हुए हैं. मंदिर परिसर में स्थित कार्यालय में सम्पर्क करके एक दिन के लिए 100 से 600 रूपये तक प्रति कमरा के खर्च से यहाँ ठहरा जा सकता हैं. मंदिर में एक भोजन आलय तथा एक साउथ इंडियन कैंटीन भी बना हैं. यहाँ आने वाले भक्त दोपहर 11 से 1 बजे तथा रात को 8 बजे से 10 बजे के मध्य भोजन प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं.

आप राजस्थान के झुंझुनू शहर पधारकर राणी सती माँ के मंदिर के दर्शन कर सकते हैं. शहर सड़क एवं रेल मार्ग से जुड़ा हुआ हैं. झुंझुनू बस स्टेंड से यहाँ की दूरी लगभग तीन किलोमीटर हैं. इसके अतिरिक्त झुंझुनू रेलवे स्टेशन की से मंदिर की दूरी 2 किमी तथा गांधी चौक से 1 किमी तक की यात्रा से आप दादी सती के दर्शन कर सकते हैं.

श्री राणीसती दादी की कथा और सम्पूर्ण जीवन परिचय (rani sati story in hindi history temple jhunjhunu rajasthan)

माँ सती का चार सौ वर्ष प्राचीन मंदिर बेहद भव्य क्षेत्र में बना हैं. मंदिर की कलाकृतियाँ एवं चित्रकारी इसे अधिक आकर्षक बना देती हैं. भादों की अमावस्या को मंदिर का नजारा देखते ही बनता हैं. इस उत्सव पर मंदिर भक्तों से भर जाता हैं. भक्त माँ की महिमा के लिए दूर दूर से आकर अपनी मन्नते मांगते हैं. मुख्य मंदिर में दादी जी सती की विशाल प्रतिमा बनी हैं. सम्पूर्ण मंदिर मकराना के सुंदर पत्थरों से बना है जिस पर रंगीन चित्रकारी की गई हैं. लोगों की मान्यता है कि माँ सती दुर्गा का अवतार है सभी भक्त अपने घरों में देवीजी की प्रतिमा स्थापित करके पूजा करते हैं. उनका विश्वास है कि माँ के समक्ष की गई प्रत्येक मुराद पूरी होती हैं. मंदिर परिसर में कुल तेरह मंदिर है जिनमें 1 देवी सती का तथा (१) माँ नारायणी (२) जीवणी सती (३) पूर्णा सती (४) पिरागी सती (५) जमना सती (६) टीली सती (७) बानी सती (८) मैनावती सती (९) मनोहरी सती (१०) महादेई सती (११) उर्मिला सती (१२) गुजरी सती इनके भव्य मंदिर भी यहाँ बने हैं. हरि बगीची में भगवान शिव की सुंदर प्रतिमा लगी हुई हैं.

श्री राणीसती जी की जीवन गाथा ( राणीसती दादी – जीवन परिचय )

१३३८ वि कार्तिक शुक्ला ८ शुभ मंगलवार रात के १२ बजे हरियाणा प्रान्त के अग्रवाल वंश में देवी जी का जन्म घुरसमाल जी के यहाँ हुआ था. महम नगर के ढ़ोकवा इनका जन्म स्थान हैं. देवी गोयल गोत्र से हैं. इनका परिवार महाराजा अग्रसेन के परिवार से सम्बन्धित था. बालपन में इनका नाम नारायणी बाई रखा गया था. बचपन से ही इन्हें धार्मिक कथाएँ सुनने एवं सखियों के साथ खेलने का शोक था. इन्होने घर पर ही धर्म, शस्त्र एवं घुडसवारी की शिक्षा पाई. कहते है नारायणी देवी उत्तम दर्जे की निशानेबाज थी, उनकी योग्यता का कोई सानी था. अपने प्रारम्भिक जीवन में ही कई चमत्कार हुए. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कहा जाता हैं कि इनके महम नगर में एक डायन आया करती थी, जो स्त्री, पुरुष व बच्चों को अपना शिकार बनाती थी. उन्हें नारायणी बाई के बारे में पता चला तो वह उन पर हमला करने के लिए आई. मगर देवी को देखकर उसकी हिम्मत नहीं हुई, जाते जाते वह नारायणी की एक सखी को अपने साथ ले जाने लगी.

अतः नारायणी उनकी तरफ बढ़ी ही थी कि वह अंधी व बोहोश होकर जमीन के पास गिर पड़ी. वह देवी को पहचान चुकी थी. अतः उसने माँ की सहेली को छोड़ते हुए जीवनदान की याचना करते हुए यह वचन दिया कि वह आगे से बच्चों का भक्षण नहीं करेगी. इस पर नारायणी बाई ने उसे माफ़ किया और उसकी आँखे फिर से ठीक हो गई. इस तरह के कई चमत्कार राणी सती ने अपने बचपन के दिनों में दिखाएं.

राणी सती का विवाह मिगसर शुक्ल ८ सं. १३५१ मंगलवार को महम नगर में बड़ी धूमधाम से तनधन दास जी के साथ हुआ था.इनके पिताजी हिंसार राज्य के दीवान थे. इनके न्याय एवं कुशल राज्य की प्रशंसा समूचे उत्तर भारत में होती थी. नारायणी के पिता ने बेटी को दहेज़ में अपार धन दिया साथ ही उन्हें श्यामकर्ण घोड़ी दी, जो उन्हें बेहद प्रिय थी. हिंसार का नवाबी राज्य आज के हरियाणा से बड़े भूभाग में विस्तृत था. तनधनदास जी विवाह के पश्चात श्यामकर्ण घोड़ी पर बैठकर ही ससुराल जाया करते थे. एक समय नवाब के बेटे को उसके कुछ दोस्तों ने भड़काया कि तुम नवाब के शहजादे हो फिर भी राज्य की सबसे अच्छी घोड़ी दीवान की बेटी के पास हैं, यह तो आपकी सवारी के लिए होनी चाहिए. उसे पहले से ही घोड़ी पाने की बात घर कर गई थी. दोस्तों की इस राय से घोड़ी पाने की उसकी तमन्ना अधिक प्रबल हो गई और वह अपने पिता नवाब से घोड़ी की मांग करने लगा. मगर दीवान ने यह कहा कि स्वामी अब घोड़ी मेरी नहीं रही उसे मैं अपनी बेटी को दहेज में दे चूका हूँ.

फिर क्या था. नवाब के बेटे ने श्यामकर्ण को छिनने के प्रयास किये, आपसी संघर्ष में कई सैनिक भी मारे गये. आखिर नवाब को इस प्रयास में विफलता हाथ लगी. वह आधी रात को दीवान की घोड़ी लाने के लिए हवेली पर गया. मगर तनधन जी के साथ हुए संघर्ष में वह भाले के वार से मारा गया. अब दीवान जी के लिए हिंसार राज्य में रहना सम्भव नहीं था. अतः वे अपने परिवार सहित झुंझुनू के नवाब की शरण में आ गये. उस समय झुंझुनू का नवाब सर्वाधिक शक्तिशाली था. आसपास के राज्य के शासक उसकी सेना के आगे कही टिक नहीं पाते थे. हिंसार और झुंझुनू के नवाब के बीच पुराना बैर था. उधर जब सुबह नवाब उठे तो उन्होंने शहजादे के न मिलने पर खोजबीन शुरू की, जल्द ही उनके सामने जब बेटे की लाश लाई गई और सारी बात खुली तो कोहराम मच गया.

नवाब ने अपनी सेना को हुक्म दिया कि वह दीवान को पकड़कर उसके सामने लाए. सेना ने लुहारू तक उन्हें जाते देखा मगर वे अब झुंझुनू की सीमा में प्रविष्ट हो चुके थे. झुंझुनू की सीमा में हिंसार के सैनिकों का प्रवेश करने का मतलब था दोनों नवाबों के बीच युद्ध, अतः वे खाली हाथ लौट आए. जब नवाब को घटनाक्रम पता चला तो वह बहुत निराश हुआ. उधर जलान्दास जी के परिवार को झुंझुनू नवाब ने शाही सम्मान देकर उन्हें अपने राज्य के दीवान का पद दिया.

हिंसार और झुंझुनू राज्य के बीच खासकर दीवान जालान्दास जी और नवाब के परिवार के बीच शत्रुता ठन गई. उधर महम नगर के सेठ घुर्सामल जी ने अपनी बेटी नारायणी देवी के मुकलावे के लिए तनधनदास जी के यहाँ लग्न मुहूर्त भेजा. लग्न समय से 4 दिनों पहले तनधनदास जी अपने दोस्तों के साथ महम पहुच गये. नगर सेठ ने उनकी खातिरदारी की. मंगसिर कृष्णा १ सं. १३ ५२ मंगलवार को प्रात: शुभ बेला में नारायणी बाई (राणी सती) का मुकलावा कर दिया. सेठजी ने अपने दामाद को महम में रह कर ही व्यापार करने का न्यौता भी दिया. मगर तनधनदास जी जमाई बनने के लिए तैयार नहीं थे. इस तरह तनधनदास जी व नारायणी बाई को दहेज धन आदि देकर झुंझुनू की ओर विदा किया. यात्रा की शुरुआत में ही अपशकुन होने लगे मगर श्रीगणेश कर यात्रा आरम्भ कर दी.

तनधनदास जी का कारवा भिवानी के पास देवसर में पहुंचा ही था कि नवाब की फोज ने उन पर हमला कर दिया. संख्या में कम सैनिक होने के बाद भी झुंझुनू के सैनिकों ने वीरता का परिचय देते हुए नवाब की सेना को तितर बितर कर दिया और आगे बढ़े, कुछ ही दूरी पर गये थे कि नवाब का सिपहसालार धोखे से तनधनदास जी पर हमला कर देता हैं. जिसमें वे घायल हो जाते हैं मगर मृत्यु से पूर्व से सिपहसालार का सिर एक वार में ही धड़ से अलग कर देते हैं.

इतना सब कुछ हुआ, मगर नारायणी देवी को इसकी भनक तक नहीं लगी. चूँकि वो पर्देदार रथ में बैठी थी. जब अधिक हो हल्ला हुआ तो उन्होंने पर्दा हटाकर बाहर देखा तो जो कुछ देखा यकीन नहीं हो रहा था. उनकी आँखों के सामने प्राणनाथ तनधनदास जी की लाश पड़ी थी. नवाबी सेना ने भी चारों ओर घेरा डाल दिया था. राणी क्रोध धारण कर तलवार लेकर घोड़ी पर सवार हुई और कुछ ही पलों में समूची नवाबी सेना को मार डाला. अपने पति के हत्यारों को मारने के बाद वह आव्हान करती है कि कोई है तब घोड़ी का सेवक राणा हाजिर होता हैं. तब राणी सती कहती है राणाजी मुझे इस पहाड़ की तलहटी में सती होना हैं आप चिता का प्रबंध करें. सूर्य अस्त होने वाला हैं अतः आप अविलम्ब इसे आरम्भ करें. राणाजी उन्हें अपने झुंझुनू चलने के लिए कहते है मगर देवी कहती हैं वहां जाकर क्या करुगी, हमारा झुंझुनू तो सामने ही हैं. अतः वो चिता पर अपने पति के शव के साथ बैठ जाती हैं. उसी क्षणी चिता तीव्र ज्वाला के साथ जलने लगती हैं. आसपास के लोगों को नारायणी बाई के सती होने की बात का पता चलता है तो नारियल, चावल, घी इत्यादि लेकर सती स्थल आते हैं.

कुछ पल बाद राणी सती चिता से प्रकट होकर सभी आगंतुकों को धन्यवाद देती हुई राणाजी से कहती हैं. तीन दिन में मेरी चिता ठंडी हो जाएगी. तब मेरी भस्मी को चुनरी में बाँधकर घोड़ी पर रख देना आप भी साथ में बैठ जाना. जहाँ घोड़ी स्वयं रूक जाए वही मेरा स्थान होगा. मैं अपने पतिदेव के संग वही निवास करुँगी तथा सदियों तक अपने क्षेत्र के भक्तों का कल्याण करूंगी. इस तरह राणी दादी जी के सती होने के तीन दिन उपरान्त राणा जी वह भस्मी एकत्रित करके चुनरी में बांधकर घोड़ी पर बैठ जाते हैं. घोड़ी झुंझुनू के मांड से होती हुई गोचर भूमि को पार करते हुए झुंझुनू नगर के उत्तर में आकर रूक जाती हैं. यही देवी का भव्य मंदिर बनाया जाता हैं.

राणी सती की भस्मी को उस स्थान पर खेजड़ी के वृक्ष के बांधकर राणाजी दीवान के घर जाकर जब सारी कथा सुनाते हैं तो घर में कोहराम मच जाता हैं. समूचा नगर उस स्थल की ओर चल पड़ता हैं. खेजड़ी के नीचे भस्मी को स्थापित कर पूजन किया जाता हैं तथा एक चबूतरा बनाया जाता हैं. कुछ लोग उसी स्थान पर नारायणी बाई के सती होने पर शंका जताते हैं महज कुछ ही पलों में चबूतरा अग्नि कुंड बनकर धधकने लगता हैं. यह चमत्कार देखकर सभी ग्रामवासी देवी सती माता का जय जयकार करते हैं. इस तरह निरंतर तेरह दिन और तेरह रात चबूतरा अग्नि चिता के रूप में जलता रहता हैं. अंत में सभी लोग राणी सती से अपनी क्षमा मांगते है तथा देवी से प्रार्थना करते हैं. तभी आकाशवाणी से ध्वनि आती हैं चबूतरे पर जल चढाओं, सभी लोग जल पात्र लेकर अग्नि को ठंडी करते हैं.

इस तरह कलयुग की राणी सती माँ आज भी झुंझुनू में अपने प्रिय भक्तों पर अपना ममत्व व कृपा बरसाती हैं. राणी सती मंदिर झुंझुनू का इतिहास इन्ही के साथ सम्पन्न होता हैं.

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