रणथम्भौर किले का इतिहास | Ranthambore Fort history in hindi

Ranthambore Fort history in hindi: हठीले हम्मीर की गाथाएं रणथम्भौर के किले से जुड़ी हुई हैं. यह राजस्थान के उन पांच दुर्गों में गिना जाता है जिन्हें यूनेस्कों की विश्व धरोहर सूचि में शामिल किया गया हैं. लम्बे समय तक अजेय रहने वाले रणथम्भौर का किला सवाई माधोपुर के रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान में स्थित हैं. राजस्थान के पर्यटन स्थलों में एक यह उद्यान प्राचीन काल में जयपुर के शासकों द्वारा अपने शिकार के लिए उपयोग में लिया जाता था. रणथम्भौर किले का इतिहास | Ranthambore Fort history in hindi

रणथम्भौर किले का इतिहास | Ranthambore Fort history in hindi

गिरी दुर्ग रणथम्भौर हम्मीर की आन बान और शान के लिए प्रसिद्ध हैं. सवाई माधोपुर से 10 किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखलाओ से घिरा हुआ रणथम्भौर का किला विषम आकृति वाली ऊँची नीची सात पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित हैं. जिनके बीच में गहरी खाइया और नाले हैं.

यह किला यदपि एक ऊँचे पर्वत शिखर पर स्थित है. मगर समीप होने पर ही दिखाई देता है. रणथम्भौर दुर्ग के निर्माण और निर्माताओं के सम्बन्ध में प्रमाणिक जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है. इतिहासकारों का मानना है कि इस किले का निर्माण आठवीं शताब्दी में चौहान शासकों द्वारा करवाया गया था.

किला समुद्रतल से 481 मीटर की ऊँचाई पर स्थित हैं. तथा बारह किलोमीटर की परिधि में विस्तृत हैं. इसके तीन तरफ गहरी खाइयाँ है. खाइयो के साथ परकोटा, फिर ढलवां जमीन और दुर्गम वन हैं. इसकी प्राचीर पहाड़ियों के साथ एकाकार सी लगती हैं. दुर्गम भौगोलिक स्थिति के कारण ही अबुल फजल ने लिखा कि और दुर्ग नंगे है परन्तु यह बख्तरबंद हैं.

Ranthambore fort history & Itihas Hindi Main

रणथम्भौर का वास्तविक नाम रन्तःपुर है अर्थात रण की घाटी में स्थित नगर. रण उस पहाड़ी का नाम है जो किले की पहाड़ी से कुछ नीचे हैं. एवं थंभ जिस पर रणथम्भौर का किला बना हुआ है. इसी से इसका नाम रणस्तम्भपुर हो हो गया जो कालान्तर में रणथम्भौर के नाम से जाना गया.

तराईन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान तृतीय का पुत्र गोविन्दराज सामंत शासक के रूप में रणथम्भौर की गद्दी पर बैठा तत्पश्चात ऐबक, इल्तुतमिश और बलबन इस किले पर आधिपत्य करने में सफल रहे.

1282-1301 ई में हम्मीर देव चौहान यहाँ का शासक था. उस समय जलालुद्दीन खिलजी ने 1292 ई में रणथम्भौर पर आक्रमण किया, मगर उसे सफलता नहीं मिली. तब खिसियाकर उसने कहा- एक सौ किलो को भी वह मुसलमान के एक बाल के बराबर भी नहीं मानता हैं. 1301 ई में हम्मीर के मंत्रियों के विश्वासघात के कारण अलाउद्दीन खिलजी किले पर अधिकार करने में सफल रहा.

इस समय हम्मीर की पत्नी रंगदेवी और पुत्री देवल दे के नेतृत्व में किले में जौहर हुआ जो रणथम्भौर का पहला साका कहलाता है. राणा कुम्भाराणा सांगा का भी इस किले पर आधिपत्य रहा. 1534 ई में मेवाड़ ने इसे गुजरात के शासक बहादुरशाह को सौंप दिया. 1542 ई में यह शेरशाह सूरी एवं उसके बाद सुर्जनहाड़ा के अधिकार में रहा.

1569 ई में रणथम्भौर पर मुगल आधिपत्य स्थापित हो गया. अकबर ने यहाँ शाही टकसाल स्थापित की. मुगलकाल में शाही कारागृह के रूप में भी उपयोग किया गया. मुगलों के पराभवकाल में जयपुर महाराजा माधोसिंह ने किले पर अधिकार कर लिया. 1947 तक यह जयपुर के आधिपत्य में रहा.

नौलखा दरवाजा, हाथी पोल, गणेश पोल, सूरजपोल और त्रिपोलिया पोल किले के प्रमुख प्रवेश द्वार है. किले की प्रमुख इमारतों में हम्मीर महल, रानी महल, हम्मीर की कचहरी, सुपारी महल, बादल महल, जौंरा भौरा, बत्तीस खम्भों की छतरी, रानी हाड़ तालाब, मीर सदरूदीन की दरगाह, लक्ष्मीनारायण मंदिर हैं. किले के पार्श्व में पदमला तालाब स्थित है. भारत प्रसिद्ध त्रिनेत्र गणेश जी मंदिर इसी किले में स्थित हैं.

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