रावल रतनसिंह का इतिहास | Rawal Ratan Singh History And Story In Hindi

रावल रतनसिंह का इतिहास | Rawal Ratan Singh History And Story In Hindi

मेवाड़ की भूमि पर अनेक स्वतंत्रता प्रेमी, स्वामिभक्त सरदारों व राजाओं ने जन्म लिया. रावल रतनसिंह जी उनमें से एक हैं, जिन्हें अधिकतर इतिहास की किताबे रत्न सिम्हा (Ratnasimha) के नाम से भी संबोधित करती हैं, आपकों बता दे मेवाड़ की चित्तोड़ की महारानी पद्मावती इन्ही रतनसिंह की पत्नी थी. जिन्होंने राजपूती वीरता का परिचय देते हुए अलाउद्दीन खिलजी से इज्ज्त बचाने के लिए जौहर किया था. रावल रतनसिंह का इतिहास भी पद्मावती के शौर्य से कम नही था. वे एक महान धर्मरक्षक यौद्धा थे. रावल रतनसिंह की जीवनी (जीवन परिचय) में हम उनके बारे बताने जा रहे हैं.रावल रतनसिंह का इतिहास | Rawal Ratan Singh History And Story In Hindi

रावल रतन सिंह का जीवन परिचय (rawal ratan singh story history & biography in hindi)

रतनसेन, रत्न सिंह, रतन सिंह, रतन सेन आदि इन्ही के नाम हैं. बप्पा रावल द्वारा स्थापित गुहिल वंश के शासक रतन सिंह जो चौदहवी सदी में मेवाड़ (चित्तोड़) के शासक बने थे. इनका शासनकाल बेहद छोटा रहा था. इनके पिता का नाम समरसिंह था.

1301ई० अथवा 1302 के आसपास इतिहासकार इनका शासनकाल मानते हैं. मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा लिखी गई रचना ‘पद्मावत’ में इनके बारे में विवरण मिलता हैं. मात्र 1 साल तक इनका चित्तोड़ पर शासन रहा था. अन्तोगत्वा विवाह प्रसंग में रतनसिंह और अलाउद्दीन खिलजी के मध्य संघर्ष हो गया. खिलजी पद्मावती से विवाह करना चाहता था, वही रानी पद्मावती के कहने पर रतनसिंह ने उनसे विवाह कर लिया था.

यही वजह थी कि खिलजी किसी भी कीमत पर पद्मावती को प्राप्त करना चाहता था, इसके लिए उसने 1303 में चित्तोडगढ किले पर आक्रमण किया, कई महीनों तक चले इस संघर्ष में समस्त परिवार को शहादत प्राप्त हुई.

रावल रतन सिंह और अलाउद्दीन खिलजी के मध्य युद्ध (alauddin khilji and raja rawal ratan singh history in hindi):-

1302 ई में रावल रतनसिंह मेवाड़ की राजधानी चित्तोड़ में राजसिंहासन पर बैठा. एक वर्ष के भीतर ही अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तोड़ पर आक्रमण किया. मेवाड़ के बढ़ते हुए प्रभाव, साम्राज्य विस्तार की लालसा, दुर्ग के सामरिक महत्व आदि के कारण अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर दिया.

अलाउद्दीन एक विशाल सेना के साथ दिल्ली [ दिल्ली सल्तनत का इतिहास ] से रवाना हुआ. और चित्तोड़ के समीप गंभीरी और बेडच नदियों के संगम पर अपना सैनिक शिविर स्थापित किया. चित्तोड़ पर आठ माह के घेरे के बाद भी खिलजी को कोई सफलता नही मिली. तब अलाउद्दीन ने कूटनीति का सहारा लिया एवं संधि वार्ता के लिए पहल की.

संधि वार्ता के दौरान रतनसिंह को बात चीत करते हुए अपने पडाव तक ले गया एवं उसे कैद कर लिया. गौरा और बादल के प्रयासों से रतनसिंह को अलाउद्दीन की कैद से मुक्त करा किले में ले आए. अब युद्ध अवश्यम्भावी हो गया था. अतः दोनों के मध्य भीषण युद्ध हुआ, किले के भीतर रसद सामग्री भी खत्म हो गई थी. और राजपूत सेना के लिए किले के भीतर से निकल कर शत्रु सेना पर टूट पड़ना आवश्यक हो गया था.

राजपूत सरदारों ने केसरिया वस्त्र धारण किए और किले के द्वार खोल दिए. रावल रतनसिंह तथा उसके सेनापति गौरा व बादल वीरतापूर्वक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए. इधर रानी पद्मिनी के नेतृत्व में विशाल संख्या में स्त्रियों ने किले के अंदर जौहर किया. यह चित्तोड़ का पहला जौहर था. चित्तोड़ पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया.

विजय के बाद सुल्तान ने चित्तोड़ की जनता का कत्लेआम करने का आदेश दिया, मुस्लिम सैनिकों ने जीभर जनता को लूटा और भवनों मन्दिरों को धराशायी कर दिया. कुछ दिनों बाद मेवाड़ का राज्य और चित्तोड़ का दुर्ग अपने पुत्र को सौपकर अलाउद्दीन दिल्ली लौट गया.

सुल्तान के दिल्ली लौटने के बाद राजपूत वीरों ने चित्तोड़ जीतने के प्रयास जारी रखे. सरदार हम्मीर [ हम्मीर देव चौहान का इतिहास] जो सिसोदा गाँव का था. ने १३२६ में चित्तोड़ को पुनः जीत लिया और मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश की स्थापना की.

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