रुकनुद्दीन फिरोजशाह का इतिहास | Rukn Ud Din Firuz Shah History In Hindi

रुकनुद्दीन फिरोजशाह का इतिहास Rukn Ud Din Firuz Shah History In Hindi: इस्लामी कानून में उत्तराधिकार के अनिश्चित नियमों के कारण इल्तुतमिश को इस बात की चिंता हो गई थी कि उसकी मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत काअस्तित्व खतरे में न पड़ जाए क्योंकि उसका योग्य एवं प्रतिभावान पुत्र नसीरुद्दीन उसके जीवन काल में ही मर गया था. Rukn Ud Din Firuz Shah History में आज हम सल्तनतकालीन सुल्तान रुकनुद्दीन फिरोजशाह के जीवन इतिहास को जानेगे.

रुकनुद्दीन फिरोजशाह इतिहास Rukn Ud Din Firuz Shah History In Hindi

रुकनुद्दीन फिरोजशाह का इतिहास Rukn Ud Din Firuz Shah History In Hindi

History Of Rukn Ud Din Firuz Shah: उससे छोटा रुकनुद्दीन अत्यधिक आलसी और विलासी था और अन्य पुत्र अवयस्क थे. अतः उसने अपनी पुत्री रजिया को उत्तराधिकारी बनाने का निश्चय किया. रजिया की योग्यता को वह परख चुका था. और उसकी अनुपस्थिति में रजिया ने भी सुचारू रूप से शासन चला कर अपनी योग्यता प्रदर्शित कर दी थी. इल्तुतमिश ने अपने सामंतों से रजिया के उतराधिकारी पर सहमती भी प्राप्त कर ली थी.

इल्तुतमिश के सामने तो तुर्क सरदारों ने रजिया को सुल्तान बनाना स्वीकार कर लिया था परन्तु उसकी मृत्यु के बाद एक स्त्री को अपनी सुल्तान बनाना उन्हें पसंद नहीं आया और उन्होंने इल्तुतमिश के जीवित बड़े पुत्र रुकनुद्दीन फिरोजशाह को सिंहासन पर बिठा दिया.

रुकनुद्दीन फिरोजशाह हिस्ट्री

इतिहासकार मिन्हाज लिखता हैं कि रुकनुद्दीन भोग विलास में डूबा हुआ और  अनुचित स्थानों पर राज्य के धन को नष्ट करने लगा. परिणामस्वरूप शासन व्यवस्था लडखडाने लगी और शासन की बागडोर रुकनुद्दीन की माँ शाह तुर्कान के हाथ में चली गई. शाह तुरकान पहले एक दासी थी.

इल्तुतमिश की बेगम बनने के बाद वह अत्यधिक महत्वकांक्षी और क्रूर बनती गई और अब शासन सत्ता के हाथ में आते ही उसने उन सभी अमीरों से प्रतिशोध लेना शुरू कर दिया जिन्होंने युवावस्था में उसका अपमान और तिरस्कार किया था.

मिनहाज लिखता हैं कि शाह तुर्कान ने इल्तुतमिश की अन्य बेगमों से भी प्रतिशोध लिया था. कई अमीरों का वध करवा दिया तथा इल्तुतमिश के युवा पुत्र कुतुबुद्दीन को अँधा करवाकर मार डाला.

उसके अत्याचारों के परिणामस्वरूप समूचे राज्यों में असंतोष और विद्रोह फ़ैल गया. रुकनुद्दीन विरोधियों का दमन करने के लिए दिल्ली से चला परन्तु मार्ग में ही उसका वजीर जुनैदी उसका साथ छोड़कर विद्रोहियों से जा मिला.

रुकनुद्दीन घबरा गया और उसने दिल्ली की तरफ वापिस कूंच कर दिया. परन्तु उसकी अनुपस्थिति में दिल्ली की स्थिति बदल चुकी थी. शुक्रवार की नमाज के समय रजिया जनता के सम्मुख जा खड़ी और उसे स्वर्गीय सुल्तान की अंतिम इच्छा और शाह तुर्कान के अत्याचारों की याद दिलाते हुए सहयोग की अपील की, इसका परिणाम प्रभावशाली निकला.

न केवल जनता ने अपितु बहुत से युवा तुरकान अधिकारियों ने रजिया का साथ दिया. शाह तुर्कान को बंदी बनाकर कारागार में डाल दिया गया, दिल्ली पहुचते ही रुकनुद्दीन फिरोजशाह को भी बंदी बना लिया गया और रजिया सुल्तान को दिल्ली सिंहासन पर बिठा दिया गया. कुछ दिनों बाद शाह तुर्कान और रुकनुद्दीन को मौत के घाट उतार दिया गया.

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