सबसे बड़ा धन संतोष पर निबंध | Santosh Dhan Essay In Hindi

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सबसे बड़ा धन संतोष पर निबंध Santosh Dhan Essay In Hindi

Santosh Dhan Essay In Hindi

जब आवै संतोष धन सब धन धुरि समान
संतोषी सदा सुखी

गौधन गजधन वाजिधन और रतन धन खानि
जब आवै संतोष धन सब धन धुरि समान


प्रस्तावना– आज भले ही संतोषी स्वभाव वाले व्यक्ति को मुर्ख और कायर कहकर हंसी उड़ाई जाय लेकिन संतोष ऐसा गुण हैं जो आज भी सामाजिक सुख शांति का आधार बन सकता हैं. असंतोष और लालसा ने श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों को उपेक्षित कर दिया हैं. चारों ओर इर्ष्या, द्वेष और अस्वस्थ होड़ का बोलबाला हैं. परिणामस्वरूप मानव जीवन की सुख शान्ति नष्ट हो गयी हैं.

संसार की अर्थव्यवस्था में असंतोष– आज सारा संसार पूंजीवादी व्यवस्था को अपनाकर अधिक से अधिक धन कमाने की होड़ में लगा हुआ हैं उसकी मान्यता है. कैसे भी हो अधिक से अधिक धन कमाना चाहिए,  धनोपार्जन में साधनों की पवित्रता अपवित्रता का कोई महत्व नहीं रहा हैं. रिश्वत लेकर, मादक पदार्थ बेचकर, भ्रष्टाचार कर टैक्स चोरी करके मिलावट करके, महंगा बेचकर धन कमाना ही लोगों का लक्ष्य हैं.

यही काला धन हैं. इससे ही लोग सुख और एश्वर्य का जीवन जीते हैं.  इसमें से थोड़ा बहुत धार्मिक कार्यों में  दान देकर  अथवा सामाजिक संस्थाओं को देकर वे दानवता और उदार पुरुष का गौरव पाते हैं. इस संसार की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था दूषित हो गयी हैं. अनैतिक आचरणों से धन कमाना आज का शिष्टाचार बन गया हैं. एक ओर अधिक से अधिक धन बटोरने की होड़ मची हैं तो दूसरी ओर भुखमरी और घोर गरीबी हैं. ये दोनों पक्ष आज की अर्थव्यवस्था के दो पहलु हैं, दो चेहरे हैं. अमीर और अमीर बन रहा हैं. गरीब और गरीब होता जा रहा हैं.

असंतोष के कारण– सम्पूर्ण मानव जाति आज जिस स्थिति में पहुच गई हैं. इसका कारण कहीं बाहर नहीं हैं, स्वयं मनुष्य के मन में ही हैं. आज का मानव इतना स्वार्थी हो गया हैं कि उसे केवल अपना सुख ही दिखाई देता हैं. वह स्वयं अधिक से अधिक धन कमाकर संसार का सबसे अमीर व्यक्ति बनना चाहता हैं. फोबर्स नामक पत्रिका ने इस स्पर्द्धा को और बढ़ा दिया हैं. इस पत्रिका में विश्व के धनपतियों की सम्पूर्ण सम्पति का ब्यौरा होता हैं.

तथा उसी के अनुसार उन्हें श्रेणी प्रदान की जाती है. अतः सबसे ऊपर नाम लिखाने की होड़ में धनपतियों में आपाधापी मची हुई हैं. यह सम्पति असंतोष का कारण बनी हुई हैं. इसके अतिरिक्त घोर भौतिकवादी दृष्टिकोण भी असंतोष का कारण बना हुआ हैं. खाओ पियो मौज करो यही आज का जीवन दर्शन बन गया हैं. इसी कारण सारी नीति और मर्यादाएं भूलकर आदमी अधिक से अधिक धन और सुख सुविधाएं बटोरने में लगा हुआ हैं. कवि प्रकाश जैन के शब्दों में

हर ओर धोखा झूठ फरेब, हर आदमी टटोलता है दूसरे की जेब

संतोष में ही समाधान– इच्छाओं का अंत नहीं, तृष्णा कभी शांत नहीं होती, असंतुष्टि की दौड़ कभी खत्म नहीं होती, जो धन असहज रूप से आता हैं. वह कभी सुख शान्ति नहीं दे सकता, झूठ बोलकर, तनाव झेलकर अपराध भावना का बोझ ढोते हुए, न्याय, नीति, धर्म से विमुख होकर जो धन कमाया जाएगा, उससे चिंताएं, आशंकाए और भय ही मिलेगा सुख नहीं. इस सारे जंजाल से छुटकारा पाने का एक ही उपाय हैं संतोष की भावना.

उपसंहार– आज नहीं तो कल धन के दीवानेपन को अक्ल आएगी. धन समस्याओं को हल कर सकता हैं भौतिक सुख सुविधाओ को दिला सकता हैं, किन्तु मन की शान्ति तथा चिंताओं और शंकाओं से रहित जीवन धन से नहीं संतोष से ही प्राप्त हो सकता हैं. संतोषी सदा सुखी यह कथन आज भी प्रासंगिक हैं. असंतोषी तो सिर धुनता हैं तब संतोषी सुख की नीद सोता हैं.

Essay On Jab Aave Santosh Dhan Sab Dhan Dhuri Saman In Hindi

जब आवे संतोष धन सब धन धूरि समान पर निबंध | essay on Self Satisfaction In Hindi

प्रस्तावना– मनुष्य महत्वकांक्षी प्राणी हैं. वह जीवनपर्यन्त अपनी इच्छाओं की पूर्ति में लगा रहता है. जैसे ही उसकी एक इच्छा की पूर्ति हो जाती है, वैसे ही दूसरी इच्छा उसके मन में जाग जाती हैं और वह उस इच्छा की पूर्ति में लग जाता हैं, लेकिन इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं होती हैं.

वह इच्छाओं के अन्न्ताकाश में ही भटकता रहता है, यही इच्छाएँ उसके दुःख का कारण बनती रहती हैं. वह इच्छाओं की पूर्ति के लिए न केवल स्वयं चैन से रहता है और न दूसरों को रहने देता हैं. इसीलिए भारतीय मनीषियों ने जीवन में सफलता के लिए संतोष का स्थान महत्वपूर्ण माना हैं.

संतोष से सुख एवं शान्ति मिलती हैं. संतोष रुपी सद्गुण अपनाने से मनुष्य ईश्वर से सम्बन्ध स्थापित करने में सफल हो जाता हैं, इसलिए कहा गया है कि मानव जीवन में जब व्यक्ति को संतोष धन प्राप्त हो जाता है तो उसे अन्य किसी प्रकार के धन की आवश्यकता नहीं होती हैं.

उक्ति लम्बे जीवन का सार – संत कबीर ने अपने लम्बे जीवन का अनुभव का सार उक्ति रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा हैं.

गो धन, गज धन, बाजि धन और रतन धन खान,
जब आवे संतोष धन सब धन धुरि समान.

संत कबीर के उक्त कथन का एक एक शब्द सत्य प्रतीत होता है, क्योंकि मनुष्य के मन में जब संतोष रुपी खजाना समा जाता है तब उसके लिए धन का कोई महत्व नहीं रह जाता हैं. वह जीवन में सुख शांति प्राप्त कर समत्व भाव से पूरित हो जाता हैं. इस लिए म्होपनिषद में बताया गया है कि अप्राप्य वस्तु के लिए चिंता न करना, प्राप्य वस्तु के लिए सम रहना संतोष हैं.

लेकिन इस सम्बन्ध में यह विचारणीय है कि मनुष्य को स्व विकास के लिए प्रयत्न तो करना चाहिए. इस सम्बन्ध में एक यूनानी दार्शनिक ने कहा है जो घटित होता है उससे मैं संतुष्ट हूँ क्योंकि मैं जानता हूँ कि भगवान का चयन मेरे चयन से अधिक श्रेष्ठ हैं.

मानव मन में धन एकत्र करने की सहज लालसा– प्रायः हम अपने चारों ओर के जीवन में लोगों को देखते हैं, सभी धन के पीछे भाग रहे हैं. धन प्राप्ति की अंधी दौड़ में उसकी भूख प्यास भी उसके लिए कोई मायने नहीं रखती. आज का आदमी लखपति से करोड़पति बनने की कोशिश में अहर्निशी लगा रहता हैं. इसके लिए वह अपने स्वजनों एवं सम्बन्धियों का गला काटने तक में नहीं चूकता.

आज मानसिक स्थिति यह बन चुकी है कि आत्मीय सम्बन्ध, स्नेह, सहयोग तथा समाज में स्थान सब धन की तराजू में तोले जा रहे हैं. आवश्यकता से अधिक धन एकत्र करने पर भी मनुष्य संतुष्ट नहीं होता. मनुष्य संज्ञावान प्राणी होते हुए भी यह नहीं समझ पाता कि सांसारिक सुख सुविधाओं के समस्त भौतिक पदार्थों, धन सम्पति आदि एकत्रित करके भी उसका मन कभी सुखी नहीं रह सकता. वह तो संतोष रुपी धन को पाकर ही सुख शान्ति से रह सकता हैं. लेकिन यह महत्वकांक्षी मनुष्य कभी भी संतोष रुपी धन प्राप्त करने की कोशिश ही नहीं करता.

धन एकत्रीकरण हेतु अपनाए जाने हेतु अनुचित उपाय – आज का मनुष्य धन एकत्रीकरण की दौड़ में इतना अँधा हो गया है कि वह धन के लिए भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, तस्करी, अपहरण और अवैध धंधे भी करता हैं. इतना ही नहीं, अपने पराये का भेद भूलकर हत्या लूटपाट आदि करने में भी पीछे नहीं हटता हैं. उसे धन मिलना चाहिए, मान सम्मान मिले न मिले. इसकी उसे कोई परवाह नहीं हैं. धन के सामने सारी दुनियां पराई लगने लगती हैं. धन ही उसके लिए सबसे बड़ा धर्म है और सबसे बड़ी पूजा हैं, उसके लिए धन ही ईश्वर हैं.

उपसंहार – यदपि मानव जीवन में धन का महत्व है, लेकिन धन ही सब कुछ नहीं हैं. मनुष्य को धन के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी. इसके लिए आवश्यक है कि उसे अपने मन पर नियन्त्रण रखना होगा. क्योंकि मन की साधना ही संतोष की साधना हैं, संतोष की साधना ही सच्चे सुख की साधना है. इसलिए मनुष्य को प्रयत्न करके इस प्रकार की साधना करनी चाहिए, क्योंकि जिसने संतोष रुपी सच्चे सुख को पा लिया हैं उसको फिर इस संसार में कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा नहीं रह जाती हैं. वह अपना जीवन सुख शांति और ईश्वर के अधीन करके जीना प्रारम्भ कर देता हैं.

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