शांति नही तब तक | Shanti Nhi Tab Tak | Hindi Kavita

   Shanti Nhi Tab Tak | Hindi Kavita

शांति नही तब तक, जब तक
सुख-भाग न सबका सम हो |
नही किसी को बहुत अधिक हो
नही किसी को कम हो
स्वत्व मांगने से न मिले
संघात पाप हो जाए
बोलो धर्मराज, शोषित वे
जिएँ या मिट जाए ?
न्यायोचित अधिकार मांगने
से न मिले, तो लड़ के.
तेजस्वी छींनते समर को,
जीत, या कि खुद मर के.
किसने कहा, पाप है समुचित.
स्वत्व प्राप्ति हित लड़ना?
उठा न्याय का खड्ग समर में
अभय मारना मरना?
यह समर तो और भी अपवाद है
चाहता कोई नही इसको, मगर
जूझना पड़ता सभी को, शत्रु जब
आ गया हो द्वार पर ललकारता,
छीनता हो स्वत्व कोई, और तू
त्याग तप से काम ले, यह पाप है.
पुण्य है विच्छिन कर देना उसे
बढ़ा रहा तेरी तरफ जो हाथ हो
युद्ध को तुम निध कहते हो मगर
जब तलक है उठ रही चिंगारियाँ
भिन्न स्वार्थो के कुलिश संघर्ष की,
युद्ध जब तक विश्व में अनिवार्य है.
और जो अनिवार्य है, उसके लिए
खिन्न या परितप्त होना व्यर्थ है
तू नही लड़ता, न लड़ता, यह आग
फूटती निश्चय, किसी भी ब्याज से

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