शरद पूर्णिमा त्योहार 2018 इसका महत्व और व्रत विधि एवं कविता | Sharad Purnima 2018

Sharad Purnima 2018 की त्योंहार की hihindi परिवार की तरफ से सभी पाठकों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ. शरद पूर्णिमा हिन्दू धर्म का अहम पर्व है, जिन्हें आश्विन माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है. इस समय तक लगभग वर्ष ऋतू की समाप्ति और शरद ऋतू का आगमन हो चूका होता है. इस दिन के व्यंजनों में खीर मुख्य है. इस शरद पूर्णिमा को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है जिनमे कोजागर व्रत और कौमुदी व्रत. यह वर्ष का एकमात्र दिन होता है, जिस दिन चन्द्रमा अपने पूर्ण रूप में दिखाई देता है. पुरानोके अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन ही चन्द्रमा अपनी सोलह कलाओं के साथ उदय होता है.

शरद पूर्णिमा त्योहार 2018 में कब है (When is Sharad Purnima 2018)

शरद पूर्णिमा का त्यौहार हर साल सितम्बर के अंतिम सप्ताह या अक्टूबर के पहले सप्ताह में मनाया जाता है. हिन्दू कैलेंडर के अनुसार इन्हें आश्विन माह की पूर्णिमा के दिन मनाने का प्रावधान है. वर्ष 2018 में इसे 5 अक्टूबर के दिन मनाया जाएगा. Sharad Purnima 2018 मुहूर्त यानि चन्द्र दर्शन का समय शाम 6 बजकर 20 मिनट रहेगा.

ये है शरद पूर्णिमा का महत्व | Sharad Purnima 2018

पौराणिक मान्यता और कथाओं के अनुसार शरद पूर्णिमा के दिन ही धन और एश्वर्य की देवी महालक्ष्मी का जन्म हुआ था. इस कारण देश के कई भागों में इस दिन को लक्ष्मी पूजन के रूप में भी मनाया जाता है. इस पूजा में लक्ष्मी जी के वाहन उल्लू और रंगोली का विशेष महत्व है.

माना जाता है कि इसी दिन शिव पुत्र कार्तिकेय का भी जन्म हुआ था. इस कारण इसे कुमार पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस दिन सर्वकामना पूर्ति के दिन कन्याएँ प्रात स्नान के पश्चात सूर्य और चन्द्रमा की पूजा करती है. जिससे उन्हें मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है.

शरद पूर्णिमा की पूजा विधि

इस दिन स्त्री और पुरुषो दोनों द्वारा व्रत रखा जाता है. सभी प्रकार की संसारिक बुराइयों से दूर रहते हुए स्वच्छ प्रवृति से पूरा दिन माँ लक्ष्मी की अराधना में व्यतीत किया जाना चाहिए. तांबे या मिटटी से बने कलश के साथ महालक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर की स्थापना स्वच्छ स्थान पर करनी चाहिए. लक्ष्मी पूजन के पश्चात मिटटी के दियों में घी डालकर उन्हें प्रज्वलित करे इसके बाद शरद पूर्णिमा के मुख्य व्यंजनों में बनी खीर को किसी साफ़ बर्तन में निकालकर चन्द्रमा की रौशनी में रखे.

जब पूजा अवधि का एक पहर पूरा हो जाए तो उस खीर व प्रसाद का लक्ष्मी को भोग लगाकर ब्राह्मणों में वितरित कर देवे. तत्पश्चात सभी परिवार के सदस्य साथ बैठकर माँ लक्ष्मी के भजन आरती कथा का वाचन करे. इसके बाद ही स्त्री/पुरुष जिन्होंने व्रत धारण किया हो भोजन ग्रहण करे. शरद पूर्णिमा की अगली सूबह माँ लक्ष्मी की स्थापित मूर्ति का विसर्जन किसी पंडित को या अपनी परम्परानुसार किया जाना चाहिए.

शरद पूर्णिमा की कथा (Story of Sharad Purnima 2018)

एक समय की बात है एक धनवान सेठ के दो पुत्रियाँ हुआ करती थी. दोनों हर वर्ष आश्विन पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा का व्रत रखती थो. बड़ी बहिन पूर्ण श्रद्धा भाव के साथ व्रत को विधि विधान के साथ पूरा करती थी. मगर छोटी बहिन बिना किसी विधि को बिच में ही व्रत को अधुरा छोड़ दिया करती थी. इस तरह कुछ वर्षो के बाद दोनों बहिनों की शादी होती है. तथा अपने ससुराल चली जाती है.
बड़ी बहिन का जीवन सुख सम्रद्धि से परिपूर्ण रहता है. मगर छोटी बहिन सन्तान सुख को प्राप्त नही कर पाती है. उनके सन्तान के जन्म के साथ ही नवजात की मृत्यु हो जाती है. बार बार यही होने पर वह पंडित के पास जाती है तथा इस समस्या का कारण पूछती है तो पंडित उन्हें पिछले वर्षो में शरद पूर्णिमा के अधूरे व्रतो की याद दिलाता है. सही विधि विधान के साथ उपवास न करने के कारण ही उनके साथ ऐसा घटित होता है.
पंडित की सलाह पर उसने अगली शरद पूर्णिमा को सही विधि विधान के साथ व्रत किया मगर सन्तान के रूप में पुत्र प्राप्ति होते ही उसकी मृत्यु हो जाती है. तब वह उस मृत बेटे को दफनाने की बजाय उसे पीढ़े पर सुलाकर उस पर कपड़ा डाल देती है. तथा अपनी बड़ी बहिन को अपने घर पर आमंत्रित करती है. बहिन के आने पर उन्हें उस पीढ़े पर बैठने का इशारा करती है. जब बड़ी बहिन उस पर बैठने के लिए झुकती है तो उसका लहंगा उस मृत बच्चे पर डाले गये कपड़े को छू जाता है.

जिससे बच्चा रोने लगता है. बड़ी बहिन कहती है तू मेरे द्वारा अपने बेटे को मरवाकर मुझे कलंकित करवाना चाहती थी? तब छोटी बहिन कहती है बहिन यह तो पहले से ही मरा हुआ था. आपके पुण्य कर्मो के स्पर्श मात्र से ही यह जीवित हो गया है.

शरद पूर्णिमा पर कविता (Poem on Sharad Purnima 2018)

न जाओ चाँद अभी
कुछ देर बैठे रहो
मेरे करीब
वक्त रुक जाता है
जिन्दगी चल पड़ती है.


उल्फत के चार दिन या अदावत के चार दिन।
तुझको मिले ऐ जिन्दगी मोहलत के चार दिन।
कहती हैं हमसे चीख कर वीरान बस्तियां ।
सदियों सुलगते रहते हैं नफरत के चार दिन।।


हे मन मोहना, तू बस मेरे नैन
तू छाड़ी दीयो,मुझे न मिले चैन
ताड्पाती जाए यह विरह भरी रैन
ढूंढे तुझे हर जगह मेरे भीगे नैन

ये चाँद इतराये कहे, तू भूल गया मुझे
हर शरद तू बस, इसके अंग सजे
रचाए महारास तू गोपियों के संग
मै सहती रहू विरह पीड़ा, हर अंग
ढूढत फिरू मै तुझे जहाँ तहां
कहा छोड़ गयों मुझे इस धरा
कर पूरी मुराद, हे कृष्ण कन्हैया
इस शरद बन, बस मेरा बंसी बजैया.

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