Sheetala Ashtami Ki Vrat Katha शीतला अष्टमी 2019 व्रत कथा महत्व स्टोरी

Sheetala Ashtami Ki Vrat Katha : सभी पाठकों को शीतला अष्टमी 2019 पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं. शीतला माँ हिन्दू धर्म की एक प्राचीन देवी हैं, जिनका बहुत बड़ा महत्व रहा हैं. स्कन्द पुराण में माता शीतला के बारें में विस्तृत विवरण मिलता हैं. इन्हें चेचक की देवी भी कहा जाता हैं. इनका वाहन गधा है तथा ठंडे भोजन का इन्हें भोग लगाया जाता हैं. माताजी का सबसे बड़ा मंदिर तथा मेला चाकसू जयपुर में भरता हैं. हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण किये हुए शीतला माता को दर्शाया जाता हैं. मान्यता है कि शीतलासप्तमी तथा अष्टमी तिथि को व्रत रखकर व्रत कथा का पाठ करने से देवी प्रसन्न हो जाती हैं.

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शीतला अष्टमी की कथा माँ शीतला से जुड़ी हुई एक पौराणिक कथा है. एक समय की बात हैं जब माताजी ने पृथ्वी लोक भ्रमण का निश्चय किया. उन्हें विचार आया कि मेरे कितने भक्त मेरी पूजा अर्चना करते है तथा कितने लोग इस भूलोक पर है जो मुझे मानते हैं तथा मेरा मंदिर बनाते हैं.

बताया जाता हैं कि शीतला माता ने राजस्थान के एक डूंगरी नामक गाँव में कदम रखा, तो उन्होंने पाया कि उस गाँव में उसका एक भी मंदिर नहीं है और ना ही कोई व्यक्ति उसकी पूजा करता हैं. विचारों के इसी उड़दबुन में वह एक संकरी गली से गुजर रही थी, तभी ऊपर रहने वाले किसी मकान वाले ने गर्म चावलों का पानी देवी पर उड़ेल दिया.

शरीर पर गर्म जल गिरने से पूरा बदल असहाय कष्ट पाने के साथ ही शरीर से फफोले निकलने लगे. तथा पूरे शरीर में जलन होने लगी. वह दर्द के मारे चिल्लाकर मदद की गुहार लगाने लगी, मुझे किसी ने गर्म जल से जला दिया मेरी मदद करों शरीर जल रहा हैं मुझे बचाओं, मगर कोई भी गाँव वाला माताजी की मदद के लिए आगे नहीं आया.

तभी उनकी यह आवाज एक बूढी कुम्हारिन के कानों में पड़ी जो घर के बाहर बैठी थी. वह तुरंत माताजी के पास गई और उन्हें ठंडी छाँव में बिठाकर बोली मैया थोड़ा साहस रखो, घर में ठंडा पानी रखा हैं मैं आप पर डालती हूँ आपका दर्द कम हो जाएगा. शीतला पर ठंडा जल डालने के बाद वह उनके लिए घर में बनी राबड़ी व दही को लाकर उन्हें दिया.

राबड़ी और दही खाया तो उसके शरीर को ठंडक मिली, तब उस कुम्हारिन ने कहाँ माँ आपके बाल बहुत बिखर गये हैं लाओ में चोटी बना देती हूँ. जब वह शीतला माता के बाल को संवार रही थी तो उसकी नजर सर के बालों के बीच बनी एक आंख पर नजर पड़ी तो वह घबरा उठी तब भागने लगी. इस पर शीतला माता कहने लगी, बेटी डरो मत मैं को प्रेतात्मा नहीं हूँ मैं शीतला माता हूँ.

मैं देव लोक से धरती पर यह जानने आई थी कि यहाँ कितने लोग मुझे मानते हैं तथा उनके दुःख दर्द क्या हैं. यह कहने के बाद उन्होंने अपने दैवीय रूप उस कुम्हारिन को दिखाया. जब कुम्हारन ने सच्चाई जानी तो वह बिलख बिलख कर रोने लगी उसके पश्चाताप का कारण यह था कि उसके घर देवी स्वयं आई मगर घर में ना कोई आसन न चौकी हैं व उन्हें कहाँ बिठाएं.

शीतलामाता भक्तिन के चिंता के विषय को समझ गई तो उन्होंने कहा आप चिंता ना करे, वह कुम्हार के गंधे पर सवार हुई तथा एक हाथ में झाड़ू तथा दूसरे हाथ में डलिया लेकर कुम्हार के घर की दरिद्रता को साफ़ कर फेक दिया और उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर बोली आपके जो कुछ चाहिए आप मांगिए.

कुम्हारन ने माँ से निवेदन करते हुए कहा माँ मेरी इच्छा है कि आप डूंगरी गाँव में बसकर आपने जिस तरह मेरे घर से दरिद्रता को हटाया इस प्रकार जो भक्त होली के सात दिन बाद सप्तमी को जो आपकी पूर्ण भक्ति भाव से पूजा करे तथा ठंडा जल, दही व बासी ठंडा भोजन कराए आप उनका सुहाग बनाए रखना, उन्हें संतान देना तथा पुरुष भी आप पर ठंडा जल चढ़ाकर, नरियल फूल चढ़ाकर परिवार सहित ठंडा बासी भोजन करे उसके काम धंधे व्यापार में कभी हानि का सामना ना करना पड़े.

इस पर माता शीतला ने तथाअस्तु कहा और उन्हें सभी वर देने की बात कही. साथ ही उन्होंने उस कुम्हारन की सेवा से प्रसन्न होकर कहा बेटी मेरी पूजा का एकाधिकार ब्राह्मण को होगा. तब से माँ शीतला शील कि डुंगरी पर बसने लगी तथा देश भर में उनका यह मुख्य मंदिर हैं. शीतला सप्तमी तथा अष्टमी के दिन यहाँ विशाल मेला भरता हैं.

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