मित्रता पर कहानी इन हिंदी | Short Story On Friendship In Hindi For Kids

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Short Story On Friendship In Hindi For Kids

Short Story On Friendship In Hindi For Kids

राम ईश्वर के अवतार तथा महापुरुष माने जाते हैं. उनका सम्बन्ध त्रेता युग से हैं. द्वापर युग में एक अन्य ईश्वरीय अवतार तथा महान पुरुष हुए हैं. उनका नाम हैं श्रीकृष्ण. कृष्ण की सुदामा के साथ मित्रता प्रसिद्ध हैं. हिन्दी में कवि नरोत्तम दास ने   इस पर एक खंड काव्य की रचना भी की हैं.

श्रीकृष्ण और सुदामा बचपन के मित्र थे. श्रीकृष्ण का सम्बन्ध धनाढ्य परिवार से था. वह यदुवंशी क्षत्रिय थे. सुदामा एक निर्धन ब्राह्मण के पुत्र थे. दोनों संदीपन गुरु के आश्रम में पढ़ते थे. दोनों में प्रगाढ़ मित्रता थी. एक बार गुरुमाता ने उनको वन से लकड़ी लाने भेजा.

वहां खाने के लिए कुछ भुने चने भी दिए. श्रीकृष्ण लकड़ी काटते रहे और सुदामा पोटली खोलकर चने चबाते रहे. जब श्रीकृष्ण लकड़ी काटकर आए तब तक सारे चने समाप्त हो चुके थे. दोनों मित्र में विनोदपूर्ण कहा सुनी हुई. आश्रम में आकर श्रीकृष्ण ने गुरुमाता से इसकी शिकायत भी की.

बड़े होने पर श्रीकृष्ण द्वारका के राजा बने. गरीब सुदामा एक झोंपड़ी में रहते थे. उनकी पत्नी जानती थी कि द्वारकाधीश श्रीकृष्ण उनके मित्र हैं. बहुत आग्रह करके उसने सुदामा को उनके पास भेजा, जिससे श्रीकृष्ण की सहायता पाकर उनकी निर्धनता दूर हो सके, द्वारका पहुँचने पर श्रीकृष्ण ने महल में उनका करुनापूर्ण स्वागत किया.

देखि सुदामा की दीन दशा करुना करिकै करुणानिधि रोए
पानी परात को हाथ छुयो नहिं नैन्नु के जल तें पग धोए

भेंट के लिए लाए चावलों की पोटली श्रीकृष्ण ने उनकी कांख से छीन ली. दो मुट्ठी चावल खाकर उनको दो लोकों की सम्पति का स्वामी बना दिया. श्रीकृष्ण ने उन्हें प्रकट रूप में कुछ नहीं दिया. सुदामा घर लौटे तो पछता रहे थे कि वह द्वारका क्यों आए. घर पहुंचकर उनको अपना स्थान पहचान में नहीं आ रहा था.

सब कुछ बदला बदला था. वह सोच रहे थे कि मैं रास्ता भूलकर पुनः द्वारका तो नहीं आ गया. तभी रत्नजड़ित आभूषणों और बहुमूल्य वस्त्रों से सुसज्जित महिला ने उनको बुलाया, वह उनकी ब्राह्मणी थी. इस कथा से श्रीकृष्ण में एक परम विश्वस्त और उदार मित्र के दर्शन होते हैं. उनका व्यवहार एक आदर्श मित्र के सर्वथा अनुकूल हैं. कविवर रहीम ने लिखा हैं.

जे गरीब तें हित करें ते रहीम बड लोग
कहाँ सुदामा बापुरों कृष्ण मिताई जोग

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