Social justice Meaning In Hindi | सामाजिक न्याय का अर्थ क्या है

Social justice Meaning In Hindi | सामाजिक न्याय का अर्थ क्या है : एक विचारधारा के रूप में सामाजिक न्याय (Social justice Meaning) सभी इंसानों को समान मानने के सिद्धांत पर कार्य करता हैं. सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक और किसी आधार पर भेद न करना भी इसके अंतर्गत सम्मिलित हैं. सामाजिक न्याय क्या है अर्थ व परिभाषा social justice in india & types of social justice सामाजिक न्याय के बारे में आज हम जानकारी प्राप्त करेगे.

Social justice Meaning In Hindi | सामाजिक न्याय का अर्थ क्या है Social justice Meaning In Hindi | सामाजिक न्याय का अर्थ क्या है

Here Today We Know About What Is Social justice Meaning In Hindi Language Meaning Definition Types Features Social Justice And Indian Constitution And Nature Of Social Justice.

Social justice Meaning In Hindi

भारतीय संविधान के भाग 4 के अंतर्गत सामाजिक, आर्थिक न्याय की स्थापना के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण व्यवस्था की गई हैं. एक अवधारणा के रूप में सामाजिक न्याय की बुनियाद सभी मनुष्यों को समान मानने के आग्रह पर आधारित हैं.

किसी भी व्यक्ति में सामाजिक सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों के आधार पर भेदभाव न हो, वहीँ सामाजिक न्याय हैं. सामाजिक न्याय की अवधारणा का उद्भव सामाजिक मानदंडों, आदेशों कानूनों और नैतिकता के विकास की प्रक्रिया का परिणाम हैं.

इस अवधारणा ने सामाजिक समानता के सिद्धांतों के अनुसार नियमों और कानूनों को लागू करने का समर्थन किया हैं. सामाजिक न्याय शब्द के प्रथम भाग सामाजिक का अर्थ है समाज में रहने वाले सभी लोग और दूसरे भाग न्याय से अभिप्रायः है स्वतंत्रता समानता और अधिकारों की व्यवस्था व वितरण से हैं.

सामाजिक न्याय वह प्रत्यय है जो समाज में रहने वाले सभी लोगों को स्वतंत्रता समानता और उनके अधिकारों की रक्षा करता हैं दूसरे शब्दों में समाज सभी सदस्यों की क्षमताओं के समुचित विकास की अवस्था को सामाजिक न्याय कहा जा सकता हैं. सामाजिक न्याय की परम्परागत अवधारणा व आधुनिक अवधारणा में काफी अंतर हैं.

सामाजिक न्याय का अर्थ (Meaning Of Social Justice)

सामाजिक न्याय से तात्पर्य है समाज के सभी सदस्यों के मध्य बिना किसी भेदभाव के समता, एकता और मानव अधिकारों की स्थापना करना तथा व्यक्ति की प्रतिष्ठा, गरिमा को विशेष महत्व प्रदान करता हैं.

यह मानव अधिकार और समानता की अवधारणाओं पर आधारित संकल्पना हैं जिसका उद्देश्य समतामूलक समाज की स्थापना करना हैं. भारतीय समाज का रुढ़िवादी सामाजिक दृष्टिकोण भेदभाव पूर्ण था. जातीयता और साम्प्रदायिकता भारत में सामाजिक न्याय की स्थापना में सबसे बड़ी बाधाएं रही हैं.

सामाजिक न्याय के अभाव के कारण ही भारत की एकता और अखंडता अक्षुण्ण न रह सकी. और उसे लम्बे समय तक गुलाम रहना पड़ा. भारतीय सामाजिक व्यवस्था जो कि जाति आधारित हैं. सामाजिक न्याय व समतावादी राज्य की स्थापना में बड़ी रूकावट थी.

भारतीय समाज में सदियों से सामाजिक न्याय का संघर्ष जारी रहा. कई ऐसे समाज सुधारक हुए जिन्होंने सामाजिक न्याय की स्थापना पर बल दिया. महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी, कबीर, लोकदेवता बाबा रामदेव से लेकर महात्मा गांधी तक हजारों समाज सुधारक हुए जिन्होंने भारतीय समाज के भेदभाव व ऊँचनीच पर आधारित सामाजिक ढाँचे को सुधारने की भरसक चेष्टा की.

जिन राज्यों में सामाजिक न्याय का अभाव रहता है वहां युद्ध, क्रांति, बगावत व विद्रोह की अधिक आशंका रहती हैं. सभी श्रेष्ठ शासकों ने अपनी नीतियों में सामाजिक न्याय को मान्यता प्रदान की हैं. जिन राज्यों और प्रशासकों ने सामाजिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध कार्य किया उनकी सत्ता हमेशा अस्थिर और डावाडोल रही हैं.

हमारा भारतीय समाज पहले वर्ण व्यवस्था पर आधारित था. कालांतर में धीरे धीरे प्रदूषित होकर वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गयी. जातिव्यवस्था में रुढ़िवादीयां आने से असमानता, अलगाववाद, क्षेत्रवाद, सामाजिक उंच नीच की भावना उत्पन्न हुई.

जिस लाभ विदेशियों द्वारा उठाया गया. फूट डालो और राज करो की नीति अपनाकर पहले विदेशी आक्रान्ताओं और तत्पश्चात अंग्रेजों ने लम्बी अवधि तक भारत को पराधीन करने में सफलता अर्जित की. लेकिन स्वतंत्रता प्राप्ति आंदोलन में सभी भारतीयों ने सामाजिक भेदभावों को भुलाकर एकता अखंडता और भाईचारे की भावना को अपनाकर अन्तः 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्र करवाने में कामयाबी अर्जित की.

भारतीय संविधान और सामाजिक न्याय (Social Justice And Indian Constitution)

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संविधान निर्माताओं ने सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु संविधान के उचित व्यवस्था करना उनकी महत्वपूर्ण प्राथमिकताओं में से एक थी. डॉ राजेन्द्र प्रसाद और डॉ भीमराव अम्बेडकर भविष्य के भारतीय कल्याणकारी प्रजातंत्र की स्थापना के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना सबसे महत्वपूर्ण मानते थे.

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय का उल्लेख अपने आप में सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने का महत्वपूर्ण दर्शन हैं. हमारा संविधान मात्र उदारवादी नहीं है बल्कि यह सामाजिक न्याय से जुड़ा हैं. इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए संविधान में अनेक प्रावधान किये गये हैं.

समानता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में शामिल किया गया हैं. संविधान निर्माताओं का मानना था कि मात्र समानता के अधिकार से सदियों से सत्याचार सह रहे वर्गों की स्थिति में सुधार लाना संभव नहीं हैं. इसलिए उनकी आर्थिक स्थिति सुधारने व उनके हितों की रक्षा के लिए अनुसूचित जाति व जनजाति को सरकारी नौकरियों में तथा विधायिका में आरक्षण भी प्रदान किया गया हैं.

संविधान में यह भलिभांति समझ लिया गया है कि सच्चे लोकतंत्र के लिए मानवता की ही आवश्यकता नहीं है बल्कि न्याय की भी आवश्यकता हैं क्योंकि न्याय के बिना समानता और स्वतंत्रता के आदर्श बिलकुल निस्सार हो जाते हैं. संविधान के भाग चार के अंतर्गत अनुच्छेद 38 में न्याय के इस आदर्श का विशेष रूप से उल्लेख किया गया हैं.

इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की जिसमें सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्रमाणित करे, भरसक कार्यसाधन के रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की उन्नति का प्रयास करेगा. इस अनुच्छेद के अनुसार भारतीय संविधान में न्याय के आदर्श को लोककल्याण के आदर्श से भिन्न माना गया हैं.

सामाजिक न्याय की प्रकृति (Nature Of Social Justice)

सामाजिक न्याय का अभिप्रायः यह है कि एक नागरिक दूसरे नागरिक के मध्य सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी प्रकार का भेद न माना जाए. और प्रत्येक व्यक्ति को विकास के पूर्ण अवसर सुलभ हो. सामाजिक न्याय की धारणा में एक निष्कर्ष यह निहित हैं कि व्यक्ति का किसी भी रूप में शोषण न हो और उसके व्यक्तित्व को एक पवित्र सामाजिक विभूति माना जाए.

किसी लक्ष्य की सिद्धि के लिए साधन मात्र नहीं सामाजिक न्याय की व्यवस्था में सुचारू और सुसंस्कृत जीवन के लिए आवश्यक परिस्थतियों का भाव निहित हैं और इस सन्दर्भ में समाज की राजनीतिक सत्ता से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने विधायी तथा कार्यकारी कार्यक्रमों द्वारा संतामूलक समाज की स्थापना का प्रयत्न करे.

भारतीय संविधान में सामाजिक न्याय के आदर्श को कई रूपों में स्वीकार किया गया हैं. संविधान के भाग 3 और भाग 4 में सामाजिक न्याय को प्राप्त करने के विविध उपायों की व्याख्या की गयी हैं. भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 में भारत के सभी नागरिकों को विधि के समक्ष समता और अधिनियमों के अंतर्गत समान सुरक्षा प्रदान की गई हैं.

और अनुच्छेद 15 में धर्म, मूलवंश जाति, लिंग या जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव व विभेद निषेध किया गया हैं. अनुच्छेद 16 के अंतर्गत राज्याधीन पदों पर नियुक्ति के सम्बन्ध में सभी नागरिकों को अवसर की समानता प्राप्त हैं. अनुच्छेद 17 के द्वारा अस्पर्शयता का कानूनी तौर पर अंत कर दिया गया हैं.

अनुच्छेद 23 के १ के अंतर्गत मानव के पण्य और बलात श्रम अथवा बेगार पर रोक लगा दी गई हैं. अनुच्छेद 24 कारखानों आदि में बच्चों से काम कराने पर रोक लगाता हैं. अनुच्छेद 29 और 30 शिक्षा और संस्कृति संबंधी अधिकार भी सामाजिक न्याय के सोपान हैं.

संविधान ने नागरिकों का कुछ अवस्थाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार स्वीकार किया हैं. अनुच्छेद 41 व अनुच्छेद 42 में संविधान ने राज्यों को यह उत्तरदायित्व सौपा है कि वह काम की यथोचित और मानवोचित दशाओं को सुनिश्चित करने के लिए तथा प्रसूति सहायता के लिए उपबन्ध करेगा.

अनुच्छेद 43 तथा 44 व 45,47 के तहत भारत में सामाजिक न्याय की स्थापना में सहायक सिद्ध होंगे, ऐसी संविधान निर्माताओं को आशा थी. संविधान अधिनियम 2002 द्वारा भारत के संविधान में अतः स्थापित अनुच्छेद २१ क सामाजिक न्याय को स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं.

इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्य कानून द्वारा निर्धारित करेगा कि ६ से १४ वर्ष तक की आयु समूह के सभी बच्चे मौलिक अधिकार के रूप में निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्राप्त करेगे. अनुच्छेद 4 अगस्त 2009 को संसद द्वारा अधिनियमित हुआ एवं 1 अप्रैल 2010 को लागू हुआ.

सामाजिक न्याय की व्यवहारिक स्थिति

संविधान में दर्जनों व्यवस्थाओं के उपरान्त आज भी भारत का सामाजिक रूप से पिछड़ा वर्ग विशेषतः ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाला सुविधाविहीन वर्ग अन्यायपूर्ण जीवन जीने को अभिशप्त हैं. सामाजिक न्याय की स्थापना व उसके विस्तार के लिए संविधान में की गयी हैं.

आरक्षण की व्यवस्था का राजनीतीकरण व चुनावीकरण कर दिया गया हैं. पिछले 70 वर्षों में तथाकथित सामाजिक रूप से पिछड़ी जातियों में एक ऐसे नयें कुलीन वर्ग का जन्म हुआ हैं जिसने आरक्षण की व्यवस्था का बार बार लाभ उठाकर पिछड़ी जातियों में अपने लिए अलग अलग स्थान सुनिश्चित कर लिया हैं.

एक ही घर व परिवार के लोगों को बार बार लाभ मिलने से वास्तविक हकदार सामाजिक न्याय से अभी भी कोसो दूर हैं. सवैधानिक समता के नियमों का ज्ञान नगरों और कस्बों के श्रेणी विशेष के अग्रणी शिक्षित लोगों के दायरे तक ही सीमित रह गई. गाँवों के कुछ सक्षम व शिक्षित लोग ही लाभ उठा सके हैं.

मुख्य धारा से दूर व सामाजिक रूप से अलग अलग रहने वाले आदिवासी जनजातियों व निराश्रित वचित अनुसूचित जातियां अभी भी इन सुविधाओं का आशिंक लाभ ही ले पाई हैं. भारत की दलीय राजनीति ने वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देकर सामाजिक न्याय को विक्षिप्त कर दिया हैं.

कानूनों के क्रियान्वयन के उपरान्त भी वंचित को दी जाने वाली सुविधाएं समताधारी न होकर दया, सहानुभूति व करुणा का बीज बन जाती हैं. जो हमारे लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हैं,

समीक्षा-

सामाजिक न्याय के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है कि सह्रदयता से वंचित वर्ग का सामाजिक उत्थान हो. वास्तव में तभी भेदभाव से परे सामाजिक न्याय के सिद्धांत का सुफल प्राप्त हो सकेगा. सामाजिक ध्रुवीकरण, जातिवाद व वोट बैंक की राजनीति सामाजिक न्याय के मौलिक सिद्धांतों के पूर्णतया विपरीत हैं.

सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग को केवल आरक्षण देने भर से सामाजिक न्याय की स्थापना नहीं होती हैं. इस वर्ग के मानसिक एवन शैक्षणिक विकास के सतत व सार्थक प्रयास ही उन्हें संकीर्ण सामाजिक क्रियाकलापों से मुक्त रख सकेगे. अतएवं सामाजिक न्याय के लिए वंचित वर्ग का सामाजिक उत्थान व मानसिक विकास आवश्यक हैं.

यह भी पढ़े-

आशा करता हूँ दोस्तों आपकों Social justice Meaning In Hindi का यह लेख अच्छा लगा होगा. यदि आपकों सामाजिक न्याय का अर्थ क्या है से जुडी जानकारी पसंद आई हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करे. इससे जुड़ा आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो कमेंट कर जरुर बताएं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *