Speech On Peace In Hindi | युद्ध और शांति पर भाषण

Speech On Peace In Hindi: इन्सान के पास दुनियां के समस्त साधन धन सम्पति होने के बावजूद वह शांति की तलाश में लगा रहता हैं. व्यक्ति अपने जीवन में शांति के लिए कई सारे उद्यम करता है यद्पि उसके हर कार्य के पीछे शांति एवं सुख की कामना जुड़ी होती हैं, शांति का अर्थ चुप रहने से नही है बल्कि सच्चा सुख ही शांति का आधार है दोनों का चोली दामन का साथ है जहाँ शांति है सुख भी वही बसता हैं.

आज हम युद्ध और शांति पर भाषण निबन्ध (Speech On Peace, Peace Speech) बच्चों के लिए यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं. वे परीक्षा के लिहाज से या युद्ध एवं शांति के विषय पर बोलने के लिए इस स्पीच का उपयोग कर सकते हैं.

Speech On Peace In Hindi | युद्ध और शांति पर भाषण Speech On Peace In Hindi | युद्ध और शांति पर भाषण

मनुष्य को स्वभाव कर्म व गुणों के आधार पर शांत प्रकृति वाला प्राणी माना जाता है. यदपि प्रत्येक मनुष्य के ह्रदय के भीतरी भाग में कहीं न कहीं एक हिंसक प्राणी छिपा रहता है. परन्तु मनुष्य यह भरसक प्रयास करता है कि वह भीतर का हिंसक प्राणी किसी तरह भी जागे नही.

यदि किसी कारणवश वह जाग पड़ता है तो वह तरह तरह की संघर्षात्मक क्रिया प्रिक्रियाओं तथा प्रतिक्रियाओं का जन्म होने लगता है, तब उनके घर्षण तथा प्रत्याघर्षण से युद्धों की ज्वाला धधक उठती है. इस प्रकार के युद्ध यदि व्यक्ति या व्यक्तियों के मध्य होते है तो वे गुटीय या साम्प्रदायिक झगड़े कहलाते है परन्तु इस प्रकार के युद्ध दो देशों के मध्य हो जाते है तो वे कहलाते है युद्ध.

सामान्य जीवन जीने के लिए तथा स्वाभाविक गति से प्रगति एवं विकास करने के लिये शांति का बना रहना अत्यंत आवश्यक होता है. देश में संस्कृति एवं साहित्य तथा अन्य उपयोगी कलाएं तभी विकास पा सकती है जब चारो ओर शांत वातावरण हो. देश के व्यापार में उन्नति एवं आर्थिक विकास भी शांत वातावरण में ही संभव हो पाता है.

सहस्त्र वर्षों के अथक प्रयत्न साधन से ज्ञान विज्ञान साहित्य कला आदि का किया गया विकास युद्ध के एक ही झटके में मटियामेट हो जाता हैं.युद्ध के इस विकराल रूप को देखकर तथा इसके परिणामों से परिचित होने के कारण मनुष्य सदैव से इसका विरोध करता रहा है. युद्ध न होने देने के लिए मानव ने सदैव से प्रयत्न किये है. महाभारत का युद्ध होने से पहले श्रीकृष्ण भगवान स्वयं शांति दूत बनकर कौरव सभा में गये थे. 

आधुनिक युग में भी प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद लीग ऑफ नेशंस जैसी संस्था का गठन किया गया. परन्तु मानव की युद्ध पिपासा भला शांत हुई क्या अर्थात फिर दूसरा विश्वयुद्ध शुरू हुआ. इसके बाद शांति की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ (UNO) जैसी संस्था का गठन हुआ, फिर भी युद्ध कभी रोके नहीं जा सकें.

एक सत्य यह भी है कि कई बार शान्ति चाहते हुए भी राष्ट्रों को अपनी सार्वभौमिकता, स्वतंत्रता और स्वाभिमान की रक्षा के लिए युद्ध लड़ने पड़ते हैं. जैसे द्वापर युग में पांडवों को, त्रेतायुग में श्रीराम को तथा आज के युग में भारत को लड़ने पड़े हैं. परन्तु यह तो निश्चित ही है कि किसी भी स्थिति में युद्ध अच्छी बात नही है. इसके दुष्परिणाम पराजित एवं विजेता दोनों को भुगतने पड़ते हैं. अतः मानव का प्रयत्न सदैव बना रहना चाहिए कि युद्ध न हो तथा शांति बनी रहे.

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