Swami Shraddhananda का जीवन परिचय और कार्य

Swami Shraddhananda स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जिन्हें आर्यसमाज के प्रचारक के रूप में याद किया जाता है. इनका जन्म 2 फरवरी 1856 को पंजाब के जालन्धर में हुआ था. स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती के पिताजी उस समय की अंग्रेजी पुलिस के सिपाही रहे थे. इसी कारण पिता के तबादले के चलते उनका बचपन कही स्थानों पर गुजरा. बचपन में सरस्वती को उनके दोस्त वृहस्पति नाम से बुलाया करते थे. स्वामी दयानन्द सरस्वती के सम्पर्क में आने पर यह उनके जीवन से बहुत प्रभावित हुए तथा उनकी दीक्षा ले ली.Swami Shraddhananda

Swami Shraddhananda का जीवन परिचय और कार्य

Swami Shraddhananda के विचारो से कार्य सिद्धांतो तथा व्यवहारों से प्रभावित श्रद्धानन्द ने आर्य समाज के विकास के लिए कार्य करने शुरू कर दिया. वे आर्य समाज के आंदोलन के सामाजिक आदर्शो का प्रचार करने लगे. उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त अंधविशवास और बुराइयों जैसे अंध विश्वास, जाति-प्रथा, छुआछूत तथा मूर्ति पूजा आदि के प्रबल विरोध आदि सामाजिक परिवर्तन के सूत्रधार बने.

1902 में Swami Shraddhananda ने देश के परम्परागत शिक्षा पद्दति के अनुरूप नए रूप में हरिद्वार में  एक आंतरिक विश्वविद्यालय ”गुरुकुल कागड़ी ” की स्थापना की. उन्होंने जालन्धर में एक महिला कॉलेज की स्थापना की  तथा दिल्ली में एक सामाजिक एकता व समरसता लाने के लिए दलित उद्धार सभा की स्थापना की.

उन्होंने एक साप्ताहिक पत्रिका सत्य धर्म प्रचारक का सम्पादन किया ताकि स्वामी दयानंद सरस्वती के विचारों व चिन्तनों से सारे देश के लोगों लाभान्वित हो सके. इसके पश्चात Swami Shraddhananda जी आर्य समाज संगठन की ओर से स्थापित शुद्धि सभा के अध्यक्ष भी चुने गये. ताकि जोर जबरदस्ती से चल रहे हिन्दू से मुस्लिम तथा इसाई धर्म में हो रहे स्थान्तरण को रोका जा सके.

वर्ष 1919 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में स्वागत समिति के अध्यक्ष नियुक्त किये गये थे. 1922 में इन्होने सत्याग्रह में भाग लिया. 23 दिसंबर 1926 को एक मुस्लिम कट्टरपंथी ने इस महान समाज सुधारक Swami Shraddhananda की हत्या कर दी थी.

13 अप्रैल 1917 के दिन से सन्यास ग्रहण के बाद श्रद्धानंद जी दलितोद्धार आर्य समाज द्वारा शुरू किये गये शुद्धि आंदोलन के अलावा भारत में हिन्दू मुस्लिम एकता समन्वय के लिए हमेशा कार्यरत रहे. हिन्दू धर्म में सुधारात्मक सोच तथा इनके योगदान को स्मरण करते हुए स्वामी श्रद्धानंद जी को हिन्दू पुरोधा भी कहा जाता है.

उन्होंने न केवल आध्यात्मिक रूप से भारत को मजबूत करने का प्रयत्न किया बल्कि हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने की न केवल समर्थन किया करते थे. बल्कि स्वामी श्रद्धानन्द ही वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार-प्रचार किया तथा इसे आम लोगों की भाषा बनाने का यत्न किया था.

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