हिंदू आश्रम व्यवस्था के चार प्रकार – Types Of Ashram In Hindi

हिंदू आश्रम व्यवस्था के चार प्रकार – Types Of Ashram In Hindi: आश्रम व्यवस्था (ashrama system) हिन्दुओं के सामाजिक संगठन की मूलभूत आधार हैं. यह जीवन को समग्र रूप से जीने की व्यवस्था हैं. इस व्यवस्था में व्यक्ति को चार भिन्न Four Ashram अवस्थाओं, भिन्न भिन्न दायित्वों की पूर्ति हेतु भिन्न भिन्न कार्य करने होते हैं, जिससे वह अन्तः मोक्ष प्राप्त कर सके.

Types Of Ashram In Hindi

Types Of Ashram In Hindi

इस व्यवस्था में व्यक्ति को चार पुरुषार्थों को पूरा करने के लिए हिन्दू जीवन में चार विभिन्न आश्रमों की व्यवस्था की गई हैं चार आश्रम है ब्रह्मचर, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम. ये व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास की चार सीढियों तथा विश्राम स्थल हैं.

आश्रम व्यवस्था का दार्शनिक आधार– हिन्दू विचारकों के विचार दर्शन के अनुसार जीवन में कर्तव्यपरायणता, बौद्धिकता, धार्मिकता और आध्यात्मिकता का योग था. अतः उन्होंने समष्टि रूप से जीवन की व्याख्या की. उन्होंने जीवन का लक्ष्य आध्यात्मिक मार्ग का अनुसरण करते हुए मोक्ष की ओर प्रवृत्त होना माना हैं.

वस्तुतः पुरुषार्थ की अवधारणा आश्रम के माध्यम से की गई हैं. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के विभिन्न आश्रमों के सहयोग से मानी गई. उन्होंने जीवन की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए ज्ञान, कर्तव्य, त्याग और आध्यात्म के आधार पर मानव जीवन के ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास नामक चार आश्रमों में विभाजित किया हैं.

जिसका अंतिम लक्ष्य था मोक्ष की प्राप्ति. यह निश्चय ही मानसिक नैतिक अवस्था थी, जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी आयु के विभिन्न स्तरों से विभिन्न कर्मों तथा दायित्वों को सम्पन्न करता था तथा आगामी जीवन के सुखद होने की कामना करता था.

इस प्रकार आश्रम व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जो व्यक्ति के जीवन को विभिन्न स्तरों में विभाजित कर उसे भविष्य के लिए इस प्रकार तैयार करती है कि वह संसार में रहता हुआ काम और अर्थ को प्राप्त करता हैं. तथा उन्हें धर्म और मोक्ष की प्राप्ति का साधन मानते हुए जीवनयापन करता हैं.

इसमें जीवन को 25-25 वर्ष की आयु की चार अवस्थाओं में प्राथमिकता के आधार पर क्रमबद्ध और सुनियोजित ढंग से विभाजित किया गया हैं यथा 25 वर्ष की अवस्था तक ब्रह्मचर्य आश्रम में उसे ज्ञान, आज्ञाकारिता, आदर, सादा जीवन उच्च विचार आदि के सद्गुण सीखने पड़ते थे.

ब्रह्मचर्य के बाद वह गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता था और 50 वर्ष की आयु तक सांसारिक जीवन जीता था. वह संतानोत्पत्ति, संतानों व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को पूरा करता था. 50 वर्षः की अवस्था के बाद सांसारिक जीवन त्याग कर वन की राह लेता था, जिसे वानप्रस्थ आश्रम की संज्ञा दी गई.

इस आश्रम में वह आत्म निग्रही, तपस्वी एवं निरपराध जीवन बिताता था. 75 वर्ष की आयु के बाद वह सन्यास आश्रम में प्रवेश करता था और इसी जीवन में वह जीवन के अंतिम लक्ष्य, मोक्ष प्राप्त करने का प्रयत्न करता था.

आश्रमों के प्रकार या आश्रमों का विभाजन- Types Of Ashram

आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत व्यक्ति की आयु को सौ वर्ष मानकर चला गया है क्योंकि वेद में पुरुष की आयु 100 वर्ष मानी गई हैं, 100 वर्ष के सम्पूर्ण जीवन को चार बराबर के भागों में विभाजित किया गया है और इन जीवन खंडो को ही चार आश्रमों का नाम दिया गया है ये है- ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम, इसका वर्णन इस प्रकार हैं.

ब्रह्मचर्य आश्रम – Brahmacharya Ashram

यह आश्रम साधारणतः 25 वर्ष की आयु तक माना गया है. यह विधा और शक्ति की साधना का आश्रम है. इसमें एक व्यक्ति ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए विभिन्न विधाओं में निपुणता प्राप्त करने का प्रयत्न करता हैं. ब्रह्मचर्य आश्रम का आयोजन और महत्व विशेष रूप से द्विजों के लिए हैं.

सर्वप्रथम इस आश्रम में प्रवेश के लिए उपनयन संस्कार किया जाता हैं. उपनयन संस्कार के पूर्ण होने पर द्विज इस आश्रम में प्रवेश करता है जिसकी आयु सामान्यतः 8 से 16 वर्ष की होती हैं.

ब्रह्मचर्य का अर्थ है महान आत्माओं के मार्ग का अनुसरण करना, प्रायः ब्रह्मचर्य का अर्थ यौन संयम से ही लिया जाता है, लेकिन यह इसका बहुत संकुचित अर्थ है, ब्रह्मचर्य का आशय सभी प्रकार के संयमों जैसे अनुशासन, कर्तव्यपरायणता, नैतिकता, आचरण की शुद्धता आदि के साथ वेदों के अध्ययन से हैं.

इसके लिए व्यक्ति को संसारिक जीवन एवं आकर्षण से दूर रहते हुए कठिन साधना की आवश्यकता होती हैं. जो प्रायः घर या बस्ती से दूर गुरु के आश्रम में गुरु की देख रेख में रहकर ही अधिक अच्छे ढंग से प्राप्त की जाती हैं. गुरु के आश्रम में ज्ञान और शक्ति की साधना के साथ साथ अनुशासन, आत्म नियंत्रण, समानता व सहयोग की शिक्षा भी मिलती हैं.

गुरु के आश्रम में इसकी प्राप्ति के लिए उसे एक विशेष प्रकार की दिनचर्या बितानी होती है. इस दिनचर्या का निर्धारण मनीषियों ने इस प्रकार किया था कि ब्रह्मचारी का शारीरिक मानसिक और बौद्धिक विकास ठीक प्रकार से हो सकें. इस प्रकार स्पष्ट है. ब्रह्मचर्य आश्रम व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास का प्रथम चरण हैं.

गृहस्थ आश्रम – Hindu grihastha ashram

ब्रह्मचर्य आश्रम में अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात विवाह संस्कार सम्पन्न होने पर व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है, सामान्यत 25 वर्ष की आयु तक व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दृष्टि से इतना समर्थ हो जाता है कि वह अपने जीवन में अर्थ, काम और धर्म की उचित साधना कर अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों का निर्वाह कर सके.

जीवन का यही 25 से 50 वर्ष का भाग गृहस्थाश्रम कहलाता हैं. सामान्यतः समावर्तन संस्कार के पश्चात ही ब्रह्मचर्य की समाप्ति और गृहस्थाश्रम का प्रारम्भ हो जाता है किन्तु अधिक स्पष्ट रूप में विवाह के साथ पारिवारिक जीवन से गृहस्थाश्रम का प्रारम्भ होता हैं.

गृहस्थाश्रम में व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने अनुकूल गुण की पत्नी के साथ धर्मानुकूल जीवन व्यतीत करते हुए सन्तान उत्पन्न करें, उस संतान का पालन पोषण करे पंच महायज्ञ करे तथा माता पिता अतिथि और ऋषियों का आदर करे. गृहस्थाश्रम के सारे दायित्वों को यज्ञ, दान और तप के अंतर्गत सम्मिलित किया गया हैं.

अन्य तीनो आश्रमवासियों को उचित व्यवस्था करे. वह देवता, ब्राह्मण, गुरु एवं विद्वान् जनों का पूजन करें, पवित्रता, सरलता तथा अहिंसा का आचरण करे.

गृहस्थ आश्रम का महत्व

  • एक गृहस्थ शेष आश्रमधारियों का पालन करता है इसीलिए इसे अन्य आश्रमों से श्रेष्ठ तथा कठिन आश्रम में कहा गया है मनु के अनुसार तीनों आश्रम के व्यक्ति गृहस्थ से ही ज्ञान और अन्न प्राप्त करते हैं इसीलिए गृहस्थाश्रम सबसे ज्येष्ठ या श्रेष्ठ हैं.
  • गृहस्थाश्रम की श्रेष्ठता का एक अन्य कारण है कि इस आश्रम में ही अर्थ और काम की पुरुषार्थ की पूर्ति की जाती हैं, अन्य आश्रमों में इनकी पूर्ति की व्यवस्था नहीं हैं.
  • गृहस्थ आश्रम में ही व्यक्ति सभी प्रकार के ऋणों से मुक्त होने के लिए पंच महायज्ञों की पूर्ति करता हैं.
  • गृहस्थाश्रम समाज के सामान्य कल्याण की दृष्टि से भी सर्वाधिक महत्व का हैं.

अतः स्पष्ट है कि गृहस्थाश्रम को विविध कारणों से शास्त्रकारों ने अन्य आश्रमों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ बताया हैं.

वानप्रस्थ आश्रम – vanaprastha Hindu ashrams

वानप्रस्थ का अर्थ वन की ओर प्रस्थान करना हैं अर्थात गृहस्थाश्रम व्यतीत करने के पश्चात जब व्यक्ति के बाल पक जाएँ, चेहरे पर झुर्रिया दिखाई पड़ने लगे. उसके पौत्र उत्पन्न हो जाए तब वह विषयों से रहित होकर वन का आश्रय ले. 50 वर्ष से 75 वर्ष तक की आयु वानप्रस्थ की आयु बताई गई हैं.

वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते समय व्यक्ति को अपने साथ कोई भी गृह सम्पति नहीं ले जानी चाहिए. उसे अपने साथ अग्निहोत्र तथा उसकी सामग्री लेकर ग्राम का त्याग करना चाहिए. जटा, दाड़ी, मूंछ और नख धारण करे. प्रातः सायं स्नान करे. कंद मूल, फल, शाक का सेवन करे तथा यज्ञ करे.

बस्तियों में केवल भिक्षा हेतु ही जाये, वर्षा के अतिरिक्त किसी काल में वानप्रस्थी को किसी ग्राम में एक से अधिक रात्रि के लिए विश्राम नहीं करना. वानप्रस्थी को साधारण आहार, उपवास तथा तप का अनुसरण करते हुए जितेन्द्रिय बनना चाहिए. गृहस्थाश्रम में पैदा हुए मोह माया से उसे तप और संयम से ही छुटकारा मिल सकता हैं.

उसे नित्य स्वाध्याय में लगा रहना चाहिए, सुख दुःख मान अपमान से विरक्ति होते हुए जन कल्याण से रत रहना चाहिए. वैयक्तिक शुद्धि, समाज कल्याण तथा व्यक्ति के मानसिक विकास की दृष्टि से यह आश्रम महत्वपूर्ण हैं.

संन्यास आश्रम – Sannyasi Ashram

सन्यास आश्रम जीवन का चतुर्थ भाग हैं और जीवन का अंतिम पड़ाव है. मनु के अनुसार अपनी आयु के तीसरे भाग को को वन में व्यतीत करके चौथे भाग में सभी विषयासक्तियों को त्याग कर द्विज को सन्यास धारण करना चाहिए. सन्यासी से आशय उस व्यक्ति से हैं जिसने सभी इच्छाओं व विषय वासनाओं का पूर्णतः न्यास या त्याग कर दिया हो.

वह सांसारिकता से दूर समस्त मानव जाति व जीवों के कल्याण की सोचता हैं. सभी राग द्वेषों से मुक्त हो जाता हैं. वह दिन में एक बार ही भिक्षा ग्रहण करता हैं. सभी आश्रमों का पालन करने के पश्चात ही व्यक्ति को संन्यासश्रम में प्रवेश करना चाहिए.

इस आश्रम में संन्यासी के लिए एक ही पुरुषार्थ प्राप्त करना शेष रहता और वह है मोक्ष. संन्यासी स्थायी रूप से एक स्थान पर नहीं रहता. वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमता रहता हैं तथा लोगों को उपदेश देता रहता हैं. संन्यासी का जीवन अत्यंत तपस्या तथा कठोरता का था.

यह भी पढ़े

आशा करता हूँ फ्रेड्स यहाँ दिया गया Essay on Ashrama System in India in Hindi का यह जानकारी आपकों पसंद आया होगा, यदि आपकों इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पसंद आई हो तो प्लीज इसे अपने दोस्तों के साथ सोशल मिडिया पर जरुर शेयर करें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *