पुरुषार्थ के प्रकार | Types Of Purushartha In Hindi

पुरुषार्थ के प्रकार | Types Of Purushartha In Hindi Four purusharthas hinduism: नमस्कार दोस्तों आज हम हिन्दू धर्म के चार पुरुषार्थों अर्थात पुरुषार्थ चतुष्टयं के बारे में जानकारी दे रहे हैं.

Types Of Purushartha In Hindi

Types Of Purushartha In Hindi
Purushartha Types Hindi

पुरुषार्थ के चार प्रकार बताएं गये है ये है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. इनका विस्तृत विवेचन इस प्रकार हैं.

धर्म– धर्म पुरुषार्थ का महत्वपूर्ण प्रकार हैं. धर्म व्यक्ति का मार्ग दर्शन करता हैं, वह व्यक्ति को विवेक और तर्क बुद्धि प्रदान करता हैं. धर्म वही है जिसे धारण किया जा सके, जिसके अनुकूल आचरण किया जा सके. पुरुषार्थ के रूप में धर्म के सामाजिक पक्ष पर जोर दिया गया हैं.

इसके सामाजिक पक्ष के अंतर्गत धर्म का तात्पर्य उन सभी कर्तव्यों के पालन से हैं जो व्यक्ति के साथ साथ समाज की प्रगति में भी योग देते हैं, धर्म का तात्पर्य सामान्य धर्म एवं स्वधर्म दोनों के पालन से हैं. यह एक ऐसा पुरुषार्थ है जो व्यक्ति को इस जीवन और पारलौकिक जीवन में सुंदर समन्वय स्थापित करने की ओर बढ़ाता हैं.

वह काम और अर्थ पुरुषार्थ को संयमित तथा नियंत्रित कर मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने के कर्म की ओर निर्देशित करता हैं. इस प्रकार धर्म का अर्थ कर्तव्यपालन से हैं. ऐसे सभी कर्तव्य जिनके पालन से उस व्यक्ति के स्वयं के व्यक्तित्व के विकास के साथ साथ समाज की प्रगति भी होती हैं, धर्म के अंतर्गत आते हैं.

यथा स्वयं के वर्ण धर्म का पालन, पंच महायज्ञों का पालन तथा माता पिता, देवी देवता, ऋषि मुनियों, अतिथियों और प्राणिमात्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वाह करना.

अर्थ- मनुष्य के शरीर के लिए भोजन, वस्त्र तथा अनेक अन्य भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती हैं. जिनकी पूर्ति के लिए व्यक्ति अर्थ का उपार्जन करता हैं. इस हेतु वह जो कुछ प्रयत्न करता है, वही अर्थरुपी पुरुषार्थ हैं. अर्थ को भारतीय जीवन दर्शन में बहुत महत्व दिया गया हैं. यह मोक्ष प्राप्ति की साधन है इसके द्वारा ही व्यक्ति अनेक सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करता हैं.

वैदिक साहित्य के आधार पर गोखले ने स्पष्ट किया है कि अर्थ के अंतर्गत वे सभी भौतिक वस्तुएं आ जाती है जो परिवार बसाने, गृहस्थी चलाने एवं विभिन्न धार्मिक दायित्वों को निभाने के लिए आवश्यक हैं.

महाभारत, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, पंचतन्त्र, स्मृतियों के सभी ग्रंथों में अर्थ के महत्व को स्वीकार किया गया हैं. स्मृतियों में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में अर्थ के पुरुषार्थ को प्राप्त किये बिना वानप्रस्थ या सन्यास आश्रम में प्रवेश करता है, उसे जीवन में मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती क्योंकि अर्थ प्राणी की रक्षा करता है.

उसे जीवन शक्ति और गति प्रदान करता है, जिससे प्राणी आगे चलकर पुनः जीव को जन्म देता हैं. इस प्रकार सृष्टि व समाज की निरन्तरता बनी रहती हैं. लेकिन अर्थ अपार शक्ति का स्वामी और अनियंत्रित होता है, अतः उसे संयमित और नियंत्रित करना आवश्यक हैं.

यह कार्य धर्म करता है. वह उचित अनुचित कार्य का भेद बताकर उचित कार्य करने का निर्देश देता है क्योंकि उचित कार्यों से कमाया हुआ धन ही सुख और संतोष में वृद्धि करता हैं. मोक्ष प्राप्ति के लिए व्यक्ति क उचित तरीके से अर्थ की प्राप्ति करना आवश्यक हैं. गृहस्थाश्रम में ही अर्थ अर्जन पर जोर दिया गया हैं और शेष तीन आश्रमों में व्यक्ति को अर्थ से पृथक रहने को कहा गया हैं.

काम– हिन्दू विचारकों ने काम को भी पुरुषार्थ का एक रूप माना हैं. काम का तात्पर्य सभी प्रकार की इच्छाओं व कामनाओं से हैं. संकुचित अर्थ में काम का तात्पर्य यौनिक प्रवृत्ति की संतुष्टि से है और व्यापक अर्थ में काम के अंतर्गत मानव की सभी प्रवृतियाँ, इच्छाएं, कामनाएं आ जाती हैं.

डॉ कापड़िया के अनुसार काम मानव के सहज स्वभाव एवं भावुक जीवन को व्यक्त करता है तथा उसकी काम भावना और सौन्दर्यप्रियता की वृद्धि की संतुष्टि की ओर संकेत करता हैं. कापड़िया के कथन के दो पक्ष हैं. एक पक्ष मानव की यौन संबंधी जीवन को व्यक्त करता है और दूसरा पक्ष उसके सौन्दर्यात्मक या भावुक जीवन को व्यक्त करता हैं.

जीवन के अस्तित्व के लिए काम आवश्यक है. उसकी यौन सम्बन्धी इच्छा स्वाभाविक हैं क्योंकि यह उसकी मूल प्रवृत्ति के अंतर्गत आती है. परन्तु यौन सुख ही सब कुछ नहीं. यौन सम्बन्धों के पीछे उत्तम संतानों के जन्म की प्रक्रिया है. लेकिन इसका अनियंत्रित उपयोग व्यक्ति को सर्वनाश की ओर ले जाता हैं.

धर्म के माध्यम से बुद्धि काम के उपभोग को दिशा प्रदान करती हैं. उसे संयमित और मर्यादित करती है जिससे मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके. काम सौन्दर्य और स्रजन की वृत्ति का बोधक हैं. व्यक्तित्व संतुलित विकास के लिए जीवन की संतुष्टि आवश्यक हैं. समाज और सृष्टि की निरन्तरता के लिए काम आवश्यक हैं.

मोक्ष– मोक्ष सर्वोच्च पुरुषार्थ है, यह साध्य है और धर्म, अर्थ और काम इसके साधन हैं. काम और अर्थ का संबंध जीव के बाह्य लौकिक परिवेश से हैं. इनसें भी काम का संबध जीव से है और अर्थ का जीव और जगत दोनों से हैं. इसलिए अर्थ काम से श्रेष्ठ है, अर्थ के अभाव में काम रुपी शक्ति कुंठित हो जाती हैं.

धर्म का संबध जीव एवं जगत के साथ साथ पारलौकिक तत्वों से भी हैं. इसलिए धर्म, काम और अर्थ दोनों से श्रेष्ठ हैं. धर्म के अभाव में अर्थ और काम दोनों अनियंत्रित एवं अमर्यादित होकर दिशाहीन हो जाते हैं, जो विनाश की ओर ले जाते हैं. धर्म इनको मर्यादित कर व्यक्ति को जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष की ओर बढ़ाता हैं.

मोक्ष सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि यह जैविक, लौकिक और पारलौकिक आधारों से परे है, यह आत्मा की अमरता है. इसको प्राप्त कर व्यक्ति जन्म मरण के बंधन से मुक्ति पाता हैं. इस प्रकार आत्मा का परमात्मा में विलीन होना, जन्म मरण की प्रक्रिया से मुक्ति पाना, ह्रदय की अज्ञानता का समाप्त होना जिसे तत्व ज्ञान की प्राप्ति भी कहा जाता है, आदि लक्षण मोक्ष के हैं.

मोक्ष प्राप्ति के साधन– मोक्ष प्राप्ति के तीन प्रकार के साधन बताए गये हैं.

  • कर्म मार्ग- जो व्यक्ति अपने स्वधर्म का ठीक प्रकार से पालन और धर्मानुकुल आचरण करता है, वही मोक्ष प्राप्त करता हैं.
  • ज्ञान मार्ग– मनुस्मृति में कहा गया है कि व्यक्ति आत्म ज्ञान के द्वारा ही जन्म मरण के बन्धनों से मुक्त होता है और मोक्ष का अधिकारी बनता हैं.
  • भक्ति मार्ग– इसके अंतर्गत व्यक्ति ईश्वर की सगुण उपासना करता हैं और ईश्वर के प्रति अपने को समर्पित कर देता हैं. इस प्रकार वह प्रेम और भक्ति के द्वारा ईश्वर को पाने का प्रयत्न करता हैं.

यह भी पढ़े

आशा करता हूँ दोस्तों Types Of Purushartha In Hindi का यह लेख आपकों पसंद आया होगा. पुरुषार्थ के प्रकार, चार प्रकार के पुरुषार्थों के नाम व वर्णन इस लेख में दी जानकारी आपकों पसंद आई हो तो अपने दोस्तों के साथ जरुर शेयर करे.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *