वैदिक सभ्यता का इतिहास | Vedic Period In Hindi

vedic history, Vedic Period In Hindi: सिन्धु सरस्वती सभ्यता के अवसान के बाद भारत में वैदिक सभ्यता का उदय हुआ. विद्वानों ने इस वैदिक सभ्यता का विकास करने वाले जन समुदाय को आर्य कहकर पुकारा है. तथा इन आर्यों को ही वैदिक सभ्यता का संस्थापक व प्रसारक बताया गया है. vedic period in hindi में सभ्यता के जन्म से पतन तक लोगों के जीवन एवं परम्पराओं के बारे में विवरण.

वैदिक सभ्यता का इतिहास | History of Vedic Civilization Period In HindiHistory of Vedic Civilization

कतिपय विद्वानों ने यह भी माना है कि ये आर्य भारत से बाहर से यथा उतरी ध्रुव, मध्य एशिया तिब्बत या यूरोप से आये, लेकिन वर्तमान पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह सिद्ध हो गया है कि वैदिक सभ्यता सिन्धु सरस्वती की निरन्तरता में ही विकसित हुई, इस वैदिक सभ्यता का वर्णन वैदिक साहित्य में विस्तार से आता है.

आर्य कौन थे और भारत में कब आए (Who was Arya and when came to India)

वस्तुत आर्य किसी जाति का बोध कराने वाला शब्द नही है. यह तो गुणवाचक शब्द है जिसका अर्थ उतम, श्रेष्ठ, अच्छे आचरण करने वाले अर्थात सुसंस्कृत व्यक्ति है.

शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति समाज द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करते हुए समुचित व्यवस्था करता हो, विचार व वाणी में शुद्धता व पवित्रता रखता हो, ऐसें अच्छे आचरण वाले व्यक्ति को आर्य कहा जाता है.

वैदिक सभ्यता के जनक भारत के ही ऐसे सुसंस्कृत लोग थे ये वो लोग थे अथवा व मानव समुदाय था. जिसने तत्कालीन व्यवस्था व संस्कृति के उपयोगी पक्षों को अपनाकर अपने उन्नत रहन सहन को विकसित किया.

इस जन समूह को यदि आर्य शब्द का सम्बोधन दिया जाता है तो यह वास्तविक तथ्य उद्घाटित होता है. एक तथ्य यह भी है कि सिन्धु सरस्वती सभ्यता का अवसान भले ही हो गया हो, किन्तु इस सभ्यता में अच्छाईयाँ सिंधु सरस्वती नदी क्षेत्र से बाहर भी प्रभावी थी, उन अच्छाईयों का ही विकास आगे चलकर वैदिक सभ्यता (Vedic civilization) के रूप में हुआ.

वैदिक साहित्य का इतिहास (History of Vedic literature)

आर्य विद्वानों ने जिस साहित्य की रचना की वह वैदिक साहित्य के नाम से विख्यात है. भारत में विकसित होने वाली वैदिक सभ्यता की जानकारी कराने वाले स्रोतों में प्रमुख स्थान वैदिक साहित्य का है. वेद, ब्राह्मण, उपनिषद, आरण्यक, षट वेदांग आदि वैदिक साहित्य के प्रमुख ग्रन्थ है.

वेद चार है ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद. इस साहित्य के माध्यम से तत्कालीन वैदिक सभ्यता की विशेषताएं इस प्रकार थी.

वैदिक सभ्यता की विशेषताएं (Features of Vedic Civilization)

  • राजनीतिक संगठन (political organization)

वैदिक काल के राजनीतिक जीवन का आधार परिवार थे. कई परिवारों से मिलकर ग्राम बनते थे. कई ग्रामों का समूह का समूह जन होता था. जन के नेता को गोप रक्षक या राजन कहते थे. राजन का निर्वाचन प्रजा करती थी, शासन का सर्वोच्च अधिकारी राजन होता था.

समिति, सभा व मन्त्रणा (मंत्रीपरिषद) नामक जनतान्त्रिक संस्थाएँ राज्य कार्य में राजन का सहयोग करती थी. कालान्तर में सहज जनतंत्र वाले राजनितिक संगठन के स्थान पर भारत का समाज राजतंत्रतात्मक राजनैतिक संगठन की ओर अग्रसर हुआ और भारत में कई जनपद राज्य स्थापित हो गये.

ऐसे जनपद में कुरु, पांचाल, गांधार, कैकेय, मन्द्र, काशी, कलिंग, अंग, मगध, लिच्छवी, मल, अवन्ति, कौशल, शिवि आदि प्रमुख जनपद थे.

  • वैदिक सभ्यता का सामाजिक जीवन (The social life of the Vedic civilization)

वर्ण व्यवस्था– वैदिक काल में समाज में वर्ण व्यवस्था प्रचलित थी. वर्ण चार माने गये है-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र. यह वर्ण व्यवस्था जन्म आधारित न होकर कर्म आधारित थी. जिसमे व्यक्ति की योग्यता व कार्य से उसका वर्ण निर्धारित होता था. इस तरह वर्ण व्यवस्था का प्रारम्भिक स्वरूप अच्छा था वह कर्म और श्रम के सिद्धांत पर आधारित था.

परिवार– समाज की मूल इकाई परिवार थी, इस काल में संयुक्त परिवार की प्रथा थी, परिवार में सबसे बड़ा पुरुष परिवार का मुखिया होता था. उसे गृहपति कहा जाता था. वैदिक समाज में स्त्री का बहुत सम्मान था.

पर्दा प्रथा का प्रचलन नही था, विवाह एक अनुबंध न होकर धार्मिक संस्कार था. विवाह परिपक्व अवस्था में ही होता था. पुत्र की भांति पुत्री को भी उच्च शिक्षा का अधिकार था. स्त्री शिक्षा को समुचित सम्मान दिया जाता था. वैदिक साहित्य में ऐसी स्त्रियों का उल्लेख मिलता है, जो ज्ञान और विद्या के लिए प्रसिद्ध थी. गार्गी, मैत्रेयी, गंधर्वगृहीता आदि विदुषी महिलाएं इसी काल में हुई.

आश्रम और संस्कार व्यवस्था (Ashram and rite system)– वैदिक काल में सामाजिक संचालन के लिए आश्रम व्यवस्था प्रचलित थी. मनुष्य की आदर्श आयु 100 वर्ष की मानकर जीवन को चार कालों ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और संन्यास आश्रम में विभाजित किया गया था.

वैदिक काल के 16 संस्कार (16 rites of Vedic times)

यह आश्रम व्यवस्था विश्व में जीवन प्रबंधन का अनुपम उदहारण था. जीवन के श्रेष्ट गुणों को पैदा करने के लिए वैदिक काल में 16 संस्कारो का विधान था, जिनमे पुंसवन संस्कार, अन्न प्रासन संस्कार, मुंडन संस्कार, नामकरण संस्कार, विद्यार्जन संस्कार, विवाह संस्कार आदि प्रमुख संस्कार थे. जो सामाजिक संस्कार पद्दति का कार्य करते थे.

वैदिक सभ्यता में लोगों का भोजन, वेशभूषा व मनोरंजन (Food, costumes and entertainment of people in the Vedic civilization)

वैदिक काल के लोग भोजन में गेहूं जो चावल उड़द, दही, दूध का विशेष प्रयोग करते थे. जहाँ तक वेशभूषा का सवाल है- सूती, ऊनी और रेशमी तीनों तरह के वस्त्रो का उपयोग किया जाता था. स्त्री व पुरुष दोनों आभूषन पहनते थे. आभूषणों में कर्ण फूल, कंठहार, कंगन आदि पहने जाते थे.

रथ दौड़, घुड़दौड़ शिकार व मल्लयुद्ध मनोरंजन के मुख्य साधन थे, संगीत व नृत्य लोकप्रिय थे. तथा प्रमुख वाद्ययंत्रो में वीणा, बांसुरी, शंख, झांझ व मृदग आदि प्रचलित थे.

वैदिक काल में लोगों का आर्थिक जीवन (The economic life of the people in the Vedic period)

वैदिक काल में आजीविका के मुख्य साधन थे- कृषि, पशुपालन, घरेलू, उद्योग धंधे, व्यापार एवं वाणिज्य. खेती का काम हल बैल से किया जाता था. गाय, हाथी, घोड़ा, भैस, बकरी, भेड़ बकरी व गधा घरेलू पशु थे. गाय को पवित्र व आर्थिक सम्रद्धि का केंद्र मानते थे. गायों की संख्या उन्नति का पैमाना था.

उद्योग धंधों में लकड़ी, धातु वस्त्र व चमड़े के काम प्रमुख थे. ऋग्वेद में भिषक नाम से चिकित्सक का भी उल्लेख मिलता है. व्यापार का माध्यम वस्तुओं का लेन देन था. गाय को मूल्य की इकाई माना जाता था. ऋग्वेद में निष्क नामक सोने के सिक्के के संकेत मिलते है.

यह न केवल उन्नत धातु के विज्ञान की जानकारी का प्रमाण है अपितु यह आधुनिक मुद्रा व्यवस्था का प्रारम्भिक संकेत भी है. दूर देशों व भारत के बिच जल व थल दोनों मार्गों से व्यापार होता था. वस्त्र उद्योग काफी उन्नत था. वस्त्रों से व्यापार होने के प्रमाण भी उपलब्ध है.

वैदिक काल का धार्मिक जीवन (Religious life of Vedic period)

वैदिक युग के निवासी मूलतः प्रकृति के उपासक थे. और विभिन्न देवीय शक्तियों की उपासना करते थे. जिन प्राकृतिक शक्तियों से उन्हें जीवन से शक्ति व प्रेरणा प्राप्त होती थी.

उनको उन्होंने अपने देवता के रूप में स्वीकार कर लिया था. इनमें इंद्र, सूर्य, अग्नि, वायु, उषा व वरुण प्रमुख थे. प्रार्थना, स्तुति व यज्ञों द्वारा वे देवताओं को प्रसन्न करते थे. उनका धार्मिक जीवन सरल व आडम्बर से रहित था. वैदिक काल के अंत में उपनिषदों ने ज्ञान का मार्ग प्रतिपादित किया था.

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