वीर अमरसिंह राठौड़ का इतिहास | Veer Amar Singh Rathore History Hindi

वीर अमरसिंह राठौड़ का इतिहास | Veer Amar Singh Rathore History Hindi: राजस्थान के एक अन्य सपूत जिसने मुगल शासक शाहजहाँ को उसके दरबार में जाकर चुनौती दी. वह वीर अमरसिंह राठौड़ राजस्थान में शौर्य, स्वाभिमान एवं त्याग का प्रतीक माना जाता हैं. अमरसिंह का जन्म 12 दिसंबर 1613 ई में हुआ था.

ये वीर अमरसिंह राठौड़ जोधपुर के महाराजा गजसिंह का ज्येष्ठ पुत्र था. उसकी शिक्षा दीक्षा उत्तराधिकारी राजकुमार के रूप में हुई. वह कुशाग्र बुद्धि, चंचल स्वाभाव एवं स्वाभिमान से परिपूर्ण था. अतः अमरसिंह की कीर्ति चारों ओर फ़ैल गई. उसकों महाराजा गजसिंह का स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था. किन्तु गजसिंह की उपपत्नी अनारा के षड्यंत्र के कारण अमरसिंह राठौड़ को राजगद्दी न देकर कनिष्ठ पुत्र जसवन्तसिंह को मारवाड़ का शासक बनाया गया.

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अमर सिंह राठौड़ की जीवन कथा – amar singh rathore biography in hindi

जोधपुर के शासक गजसिंह के बड़े पुत्र अमरसिंह राठौड़ का जन्म 1613 ई में हुआ. उद्दंड एवं पराक्रमी स्वभाव के कारण पिता गजसिंह इससे नाराज रहता था. अतः वह 1633 ई में मुगल बादशाह शाहजहाँ की सेवा में चला गया. शाहजहाँ ने उसे ढाई हजार जात व डेढ़ हजार सवार के मनसब के साथ ही राव का खिताब दिया.

1635 में अमरसिंह नागौर बहुत और अलाय के परगने जागीर में मिले. 1640-41 में पंजाब के विद्रोह का दमन करने पर मुगल सम्राट ने उसका मनसब बढ़ाकर चार हजार जात और तीन हजार सवार कर दिया.

1642 ई में जाखनियाँ गाँव को लेकर बीकानेर के शासक कर्णसिंह और अमरसिंह के मध्य युद्ध हुआ. जो मतीरे की राड़ के नाम से प्रसिद्ध हैं. प्रारम्भ में अमरसिंह विजयी हुआ, मगर दूसरे युद्ध में नागौर को बीकानेर से पराजित होना पड़ा. मुगल दरबार में अमरसिंह के सम्मान के कारण अन्य सरदार इसे नीचा दिखाने की ताक में रहते थे.

25 जुलाई 1644 को मीरबक्षी सलावत खां के गँवार कह देने पर अमरसिंह ने शाही दरबार में उसकी हत्या कर दी. मगर उसी समय अर्जुन गौड़ व उनके साथियों ने धोखे से वार कर अमरसिंह को मार दिया. वीरवर अमरसिंह अपनी वीरता के कारण मारवाड़ में आज भी लोक नाट्यों के माध्यम से जीवित हैं.

अमरसिंह राठौड़ और शाहजहाँ

मुगल शासक शाहजहाँ ने जसवंतसिंह को मारवाड़ के शासक की मान्यता दे दी. अमरसिंह ने इस निर्णय का प्रतिकार नही किया. पिता के समय में ही अमरसिंह मुगल बादशाह की सेवा में आ गया था. इस घटना के बाद शाहजहाँ ने अमरसिंह को उच्च मनसब, राव की पद्वी और नागौर का परगना दिया.

अमरसिंह नागौर की प्रशासनिक व्यवस्था को सुद्रढ़ कर पुनः शाहजहाँ के दरबार में चला गया. अमरसिंह की सूझ बुझ और योग्यता से शाहजहाँ परिचित था. अतः अनेक कठिन अभियानों में वह अमरसिंह को भेजता था. उसे जुझारसिंह बुंदेला, राजा जगतसिंह कागड़, ईरान के शाह सफी, शाह भौसले के विरुद्ध और कंधार के अभियानों पर भेजा गया. अमरसिंह स्वयं स्वाभिमानी था तथा स्वाभिमानी व्यक्तियों का विशेष ध्यान रखता था.

अमरसिंह और शाहजहाँ के बिच विवाद

केसरीसिंह जोधा को बादशाह की आज्ञा के कारण अटक पार जाना था, किन्तु जब आदेश पालना में हिचकिचाहट बताई तो उसका मनसब जब्त कर लिया, इसकी सूचना जब अमरसिंह को हुई तो वह केसरीसिंह से मिलने गया और बादशाह की नाराजगी की परवाह किए बगैर उसने 30 हजार का पट्टा तथा नागौर की सुरक्षा का उत्तरदायित्व उनको सौपा.

इस प्रकार अमरसिंह ने जोधा के सम्मान की रक्षा की. अपने स्वाभिमान पर भी अमरसिंह ने कभी आंच नही आने दी. कतिपय घटनाओं के कारण अमरसिंह ने मुगल कोष में जमा कराएं जाने वाले कर को देने से स्पष्ट रूप से मना कर दिया, राज्य की ओर से बार बार मांग होने पर भी उसनें अपने निश्चय में कोई परिवर्तन नही किया.

अमरसिंह विरोधी मनसबदारों को उसके विरुद्ध बादशाह के कान भरने का अच्छा अवसर मिला. इसमें सुलावत खान भी था. इसका प्रभाव बादशाह पर भी पड़ा. उसने एक दिन अमरसिंह को कटु वचन सुनाएं. अमरसिंह का स्वाभिमान जाग उठा और क्रोध से उसके नेत्र लाल हो गये. वह बादशाह की ओर बढ़ा.

वीर अमरसिंह राठौड़ की मृत्यु

जब सलावत खां ने अपशब्द कहते हुए उसे आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया तो उसे अमरसिंह के हाथों मौत का शिकार होना पड़ा. भयग्रस्त बादशाह बादशाह अपनी जान बचा पाया. मुगल दरबार में अमरसिंह जब अकेला था, मुगल मनसबदार द्वारा धोखे से मार दिया गया.

इस घटना से भले ही अमरसिंह की मृत्यु हो गई किन्तु आदर्शों के प्रति उसका समपर्ण आज भी हमे प्रेरणा देता हैं. रचनाधर्मियों ने उसके स्वाभिमान और त्याग से आकर्षित होकर अनेक प्रेरणादायक काव्यों की रचना की. (Veer Amar Singh Rathore History Hindi)

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